ठोस समाधान नहीं निकला इसलिए RCEP से पीछे हटा भारत

नई दिल्‍ली। एशिया के 16 प्रमुख देशों के साथ सबसे बड़े व्यापारिक समझौते RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप ) से भारत पीछे हट गया है।
दरअसल, भारत ने इस समझौते से पहले कई मुद्दे और चिंताएं सामने रखी थीं पर उसका ठोस समाधान नहीं निकला। भारत की पहली और सबसे बड़ी चिंता तो यही है कि चीन समेत इन देशों के साथ पहले से ही बड़ा व्यापार घाटा है। इस समझौते के बाद आयात और ज्यादा बढ़ने की स्थिति में भारतीय उद्योगों और किसानों के हित प्रभावित हो सकते थे। आइए समझते हैं कि भारत की दूसरी चिंताएं क्या हैं, और आगे क्या संभावनाएं बनती हैं।
आपको बता दें कि RCEP में आसियान के 10 सदस्य देशों के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत और न्यू जीलैंड शामिल हैं। इन देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और ग्लोबल जीडीपी में इनका 30 प्रतिशत योगदान है। ऐसे में इस समझौते को सबसे बड़ी डील कहा जा रहा है।
पहले समझिए RCEP क्यों
1-RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) की कोशिश दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार ब्लॉक स्थापित करने की है, जिसमें 16 देश होंगे।
2-भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यू जीलैंड 2012 से इस पर बातचीत कर रहे हैं।
3-चर्चा के मुख्य बिंदुओं में 90% सामानों पर आयात शुल्क घटाया जाना या खत्म करना है। चीन के मामले में भारत 80% सामान पर आयात शुल्क शून्य करने के पक्ष में था।
4-इसके अलावा सर्विस, ट्रेड, निवेश बढ़ाना और वीजा नियमों को आसान बनाने पर विचार किया जा रहा था।
भारत ने क्यों बनाई दूरी, 5 बड़े कारण
1. पहले से व्यापार घाटा, और बढ़ने की आशंका
भारत का चीन समेत इन देशों से आयात पहले ही काफी ज्यादा है और निर्यात बेहद कम। ऐसे में आशंका इस बात की है कि इस डील पर हस्ताक्षर करने से चीन से आयात काफी बढ़ जाएगा, जिसमें अन्य RCEP देशों के जरिए सामान की री-रूटिंग शामिल होगी। इससे भारत के हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी। वित्त वर्ष 2019 में भारत का RCEP देशों के साथ व्यापार घाटा 105 अरब डॉलर है। इसमें से 54 अरब डॉलर का घाटा तो सिर्फ चीन के साथ है।
उधर, इस समझौते का भारत में राजनीतिक विरोध भी हो रहा था। भारत में उद्योग और डेयरी फार्मर्स इस व्यापार समझौते का विरोध कर रहे थे। ऐसी आशंकाएं जताई गई थीं कि समझौते में भारत के शामिल होने से चीन से यहां मैन्युफैक्चर्ड गुड्स और न्यू जीलैंड से डेयरी प्रॉडक्ट्स की डंपिंग होगी, जिससे घरेलू हितों को नुकसान पहुंचेगा। यह भी कहा जा रहा था कि समझौते में भारत के शामिल होने से ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी धक्का लगेगा।
2. बेस इयर पर भी भारत की आपत्ति
दूसरे देश 2014 के आधार वर्ष को बदलने के पक्ष में नहीं हैं, जिससे लेटेस्ट व्यापार शुल्क रिफ्लेक्ट हो सके। हालांकि भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी।
3. संरक्षण के मानक नहीं
आयात में बेतहाशा वृद्धि को चेक करने के लिए संरक्षण के कोई मानक नहीं हैं। इससे घरेलू हितों को नुकसान पहुंचेगा, मेक इन इंडिया पर असर पड़ेगा। भारत ने इसको लेकर अपनी चिंता पहले ही जता दी थी पर उसका संतोषजनक समाधान नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में कहा, ‘अभी समझौते का जो स्वरूप है वह RCEP के सर्वसम्मत सिद्धांतों और मूल भावना से मेल नहीं खाता।’
4. नॉन-टैरिफ बैरियर्स पर चिंताएं
नॉन-टैरिफ बैरियर्स पर कोई विश्वसनीय प्रतिबद्धता नहीं है। भारत ने आयात शुल्क बढ़ने की स्थिति में सुरक्षा की गारंटी मांगी थी पर उस पर ध्यान नहीं दिया गया। बाजार की पहुंच को लेकर कोई मजबूत भरोसा नहीं मिलना भी बड़ी वजह है।
5. सेवाओं पर ध्यान नहीं
इस डील में सेवाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया जबकि भारत ने इस पर काफी जोर दिया था।
PM ने कहा, नहीं मिला संतोषजनक समाधान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकॉक में RCEP सम्मेलन में अपने भाषण में कहा, ‘इस समझौते में भारत की चिंताओं और उसकी तरफ से उठाए गए मुद्दों का संतोषजनक समाधान पेश नहीं किया गया है। ऐसे में भारत का RCEP में शामिल होना संभव नहीं है।’
2020 में समझौते पर शुरू होगा काम
RCEP के संयुक्त बयान में कहा गया कि 15 देश 2020 में इस समझौते के लिए औपचारिक स्तर पर काम शुरू करेंगे। इस बीच, उन मसलों को भी सुलझाने की कोशिश होगी, जिनकी तरफ भारत ने ध्यान दिलाया है। बैंकॉक से सोमवार देर शाम जारी बयान में कहा गया, ‘समझौते पर भारत का रुख इन मसलों के संतोषजनक समाधान से तय होगा।’
आगे क्या? भारत के नजरिए से समझिए
RCEP सम्मेलन के बाद बैंकॉक में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) विजय ठाकुर सिंह ने कहा, ‘भारत ने RCEP समझौते का हिस्सा नहीं बनने के अपने निर्णय की जानकारी दे दी है। अभी जो स्थिति है, उसमें समझौते का हिस्सा नहीं बनना ही सही फैसला है।’ व्यापार मामलों के एक विशेषज्ञ ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर बताया, ‘इस फैसले से भारत के पास अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर विवादित मसलों को सुलझाने की गुंजाइश बन गई है। अब गेंद अन्य देशों के पाले में है। अगर वे हमारी आशंकाएं दूर नहीं कर पाते तो हम इस समझौते का हिस्सा नहीं बनेंगे।’
-एजेंसियां

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