पुलिस की बिगड़ी छवि और Public में डर

Public में पुलिस के प्रति इतना आक्रोश और डर इसलिए है कि पुलिस वाले अपराधियों के साथ गलबहिया में रहते हैं, निरपराधियों या छोटे-मोटे अपराधियों को फांसते हैं

ब्रिटिशकाल के किशोर, युवा यानी आजादी के बाद के अधेड़, बुजुर्गों का अनुभव सिद्ध कथन अकसर बातों में आ जाता है कि अंग्रेजों के शासन में एक कांस्टेबल से पूरा गांव डरता था लेकिन आज आजादी के बाद पूरी पुलिस फोर्स को एक मोहल्ला पानी पिला देता है।
इसकी वजहों में प्रमुख रूप से भ्रष्टाचार है जो कि ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर तक सभी विभागों में फैला है। इसी कारण अपराध बढ़ते जा रहे हैं। इन अपराधों को बढ़ावा देने के जिम्मेदार अपरोक्ष रूप से नेता और खुद पुलिस भी जिम्मेदार है।

इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि जितने थाने-पुलिस उससे दोगुना अपराध। पहले जिन मोहल्लों में अपराध नहीं होते थे, कम होते थे वहां अगर कोई पुलिस चौकी या थाना स्थापित हुआ कि अपराधों के प्रतिशत में भी इजाफा होने लगा। पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए होती है लेकिन जो पुलिस खुद ही असुरक्षित हो वो जनता की सुरक्षा कैसे कर सकती है। क्योंकि पुलिस की असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण भी भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार की बदौलत ही आज अपराधी पुलिस से नहीं डरते और भ्रष्टाचार की बदौलत ही पुलिस निरपराधियों को फंसाती है।

बेरोजगारी दिन-ब-दिन सुरसा की मानिन्द है। ऐसे में किसी सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी भी कम से 50 हजार से 1 लाख तक में मिलती है। फिर पुलिस विभाग की बात अलग है। कई पुलिस कर्मी ऐसे होंगे जिन्होंने अपना मकान,खेत, जमा पूंजी तक गिरवी या बेचकर नौकरी पाई होगी। अब इस पूंजी की वापसी के लिए उन्हें नेताओं से और अपराधियों से तो मिलकर चलना होगा। किसी न किसी तरह से ऊपरी कमाई तो करना होगी। अपराध भले ही होते रहें, जेब तो गरम करना होगी।
इंडियन फिल्म में सन्नी देओल ने एक जगह पुलिस की मीटिंग वाले दृश्य में कहा है कि जनता पुलिस से क्यों डरती है। सही कहा है और पुलिस वाले भी ये फिल्म देखते होंगे तो पता नहीं क्या सोचते होंगे।

वसूली का धंधा
गुंडे बदमाशों द्वारा की जाने वाली वसूली का धंधा आजकल पुलिस वाले करने लगे हैं, ऐसा जनता का मानना है। ये वसूली डायरेक्ट नहीं की जाती है। मुहल्ले में अपराधियों को अपराधियों को पकड़ाने का कहा जाता है। एक मोहल्ले में दो अपराधी हैं तो दोनों एक-दूसरे को पकड़ाने की फिराक में रहते हैं और दोनों से फायदा पुलिस उठाती है।

त्योहारी तैयारी
दशहरा दीवाली आने वाली है। अन्य सरकारी विभागों की भांति पुलिस विभाग में भी त्योहारी तैयारी होगी। किस धारा में कितनों को धरना है। कितनी ऊपरी कमाई करना है, अपरोक्ष टारगेट ऊपर से नीचे तक आ जाएगा। दादा-पहलवानों, दो नंबर वालों आदि को पहले ही सूचित कर दिया जाएगा भेंट-पूजा के लिए।

नकली गवाह और सबूत
अगर किसी को तगड़ा ही फांसना है तो पुलिस के पास गवाह और सबूत तैयार रहते हैं। ये नकली गवाह और सबूत कोर्ट में पेश कर दिए जाते हैं। कानूनी दांवपेंचों में इन्‍हीं सबूतों की बदौलत कभी-कभी छोटा अपराधी भी बड़ी तगड़ी का शिकार हो जाता है।

अगर कोई आम नागरिक सब्जी का काटने का चाकू भी बाजार से खरीदकर घर ले जाए तो उसे दस बार सोचना पड़ेगा लेकिन गुंडे बदमाशों के पास चाकू छोड़िए रिवाल्वर या कट्टे तक आराम से रखे रहते हैं और ये भाई लोग भी पुलिस वालों के साथ हथियार लिए हुए चाय-नाश्ता करते हैं, जनता का ऐसा मानना है।

आक्रोश इसलिए
Public में पुलिस के प्रति इतना आक्रोश और डर इसलिए है कि पुलिस वाले अपराधियों के साथ गलबहिया में रहते हैं। निरपराधियों या छोटे-मोटे अपराधियों को फांसते हैं। बड़े गुंडे बदमाशों की नेताओं से पहचान रिश्तेदारी पुलिस वालों को ईमानदारी से काम कैसे करने दे? ट्रांसफर या सीआर बिगड़ने का डर और फिर भ्रष्‍टाचार के रास्‍ते पाई पुलिस की नौकरी केवल सरकारी तनख्वाह के लिए क्यों करें? इस नौकरी के लिए तो घर खेत कुआ सब बेच दिया। अब जनता की सेवा करेंगे तो सरकारी तनख्वाह में तो एक मकान भी ढंग से नहीं बन सकता। पुलिस वाले भी ऊपरी कमाई के लिए मजबूर हैं। चूंकि जनता इन सब बातों से अनुभूत है। इन सब बातों का जनता को कड़वा अनुभव है।

नोट: चूंकि ये सब Public का अनुभव है, अपवाद स्वरूप कुछ गलत भी हो सकता है, मगर असंभव है।

-अनिल शर्मा

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