नाबालिग बीवी से शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म नहीं मानने वाला कानून निरस्त करने की याचिका पर फैसला सुरक्षित

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बीवी से शारीरिक संबंध बनाने को दुष्कर्म नहीं मानने वाले कानून को निरस्त करने संबंधी याचिका पर बुधवार को फैसला सुरक्षित रख लिया है।
न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठन इंडिपेंडेंट थॉट और केंद्र सरकार की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
केंद्र सरकार ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद (दो) को बनाये रखने की वकालत की है जबकि याचिकाकर्ता ने इस अपवाद को समाप्त करने तथा उसे बाल विवाह विरोधी कानून, 2006 तथा बाल यौन शोषण संरक्षण कानून (पोक्सो), 2012 के अनुकूल करने का अनुरोध कोर्ट से किया है।
सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार का जवाब
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उसे पता है कि 15-18 वर्ष के बीच की महिला के साथ यौन संबंध बनाना रेप है, लेकिन विवाह की संस्था को बचाने के लिए इसे रेप नहीं माना गया है। सरकार ने कहा कि सामाजिक हकीकत यही है कि रोकथाम के कानून के बावजूद 15-18 वर्ष के बीच की लड़कियों का विवाह होता है। इसे रोका नहीं जा सकता इसलिए संसद ने आईपीसी धारा 375 के अपवाद 2 को समाप्त नहीं किया है। अपवाद कहता है 15-18 वर्ष के बीच की लड़की साथ संबंध उस अवस्था में रेप नहीं होंगे, यदि वह शादीशुदा है।
क्या है हिंदू मैरिज एक्ट में प्रवाधान
हिंदू मैरिज एक्ट में 18 वर्ष से कम लड़की का विवाह वायडेबल (अमान्य करने योग्य) होता है लेकिन यह विवाह यदि संपन्न हो गया तो उसे वैध माना जाता है। यदि ऐसे विवाह अमान्य कर दिए गए तो उससे पैदा हुए बच्चों का समाज में क्या होगा इसलिए बेहतर है कि कोर्ट इस मामले में दखल न दे। इससे पहले पीठ ने कहा हम ऐसा आदेश नहीं देना चाहते, जिसका पालन न किया जा सके। आदेश भाषण देने के लिए नहीं होते।
मुस्लिम विवाहों पर असर
धारा 375 के अपवाद को खत्म करने से मुस्लिमों में होने वाले विवाह भी खतरे में पड़ जाएंगे क्योंकि पर्सनल ला में 15 वर्ष की लड़की का विवाह जायज है। सरकार इस मुद्दे पर बुधवार को बहस करेगी।
याचिकाकर्ताओं की आपत्ति
याचिककार्ताओं का कहना है कि रेप कानून का अपवाद अवयस्क महिला के साथ दुष्कर्म की इजाजत देता है। इसके कारण लाखों महिलाएं कानूनी दुष्कर्म झेल रही है। यह अमानवीय है। कई देशों जैसे नेपाल, इजरायल, डेनमार्क, स्वीडन, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, घाना, न्यूजीलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, कनाडा, आयरलैंड तथा यूरोपीय संघ के कई देशों में इस अपवाद को कानून या न्यायिक आदेशों से समाप्त किया जा चुका है।
-एजेंसी