वीर सावरकर: स्वतन्त्रता आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति के सेनानी

आज वीर सावरकर की पुण्यत‍िथ‍ि है, ये भारत के उन शूरवीरों में से एक हैं जिनके नाम से अंग्रेज हुकूमत भी घबराती थी। उनकी लिखी किताबों को कुछ देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था।

विनायक दामोदर सावरकर या वीर सावरकर भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति के सेनानी थे। इसके अलावा उनकी पहचान एक क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, वकील, कवि और नाटककार, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता के रूप में भी होती है। भारत में हिंदुत्‍व की राजनीति का झंडा बुलंद करने वालों में वो हमेशा शीर्ष पर रहे हैं। उनके द्वारा लिखे गए 1857 की क्रांति के इतिहास से ब्रिटिश शासन बुरी तरह से हिल गई थी। इसका नाम ‘The Indian War of Independence-1957 था।

उन्होंने ही धर्म परिवर्तन कर चुके हिंदुओं की वापसी के लिए कई तरह के आंदोलन और प्रयास किए थे। सावरकर के तर्कों के आगे विरोधियों को टिक पाना मुश्किल होता था। सावरकर की निडरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वे सभी धर्मों शामिल रुढ़िवादी परंपराओं के घोर विरोधी थे। वे खुलेआम इन कुरीतियों का विरोध करते थे। यही वजह थी कि वे कई बार धर्म के ठेकेदारों के दुश्‍मन भी बन जाते थे।

सावरकर का जन्म महाराष्ट्र में नासिक के निकट भागुर गांव में 28 मई 1883 को हुआ था। उनकी माता जी का नाम राधाबाई तथा पिता जी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। जब वे केवल 9 वर्ष के थे तभी हैजे से उनकी उनकी मां का निधन हो गया। इसके सात वर्ष बाद उनके पिता का भी निधन हो गया। सावरकर के बड़े भाई गणेश ने ही उनका पालन-पोषण किया था। बापू की हत्या में सावरकर पर सहयोगी होने का आरोप लगा था, जो सिद्ध नहीं हो सका। 26 फरवरी 1966 उन्‍होंने अंतिम सांस ली थी।

बेहद कम लोग जानते हैं कि भारत के राष्ट्रध्वज में सफेद पट्टी के बीच मौजूद चक्र को लगाने का सुझाव सबसे पहले वीर सावरकर ने ही दिया था। इसको राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने तुरंत मान भी लिया था।

सावरकर ने ही सबसे पहले भारत की पूर्ण आजादी को स्‍वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्‍य बनाया और घोषित किया।

सावरकर को फ्रांस में राजनीतिक बंदी बनाया गया था और इसके खिलाफ मामला हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में
पहुंचा था। इस तरह का ये पहला मामला था।

वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया। नजरबंदी खत्‍म होते ही उन्‍होंने देश में फैली कई तरह की कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाया था। इसके लिए उन्‍होंने कई किमी की यात्रा की और लोगों से बातचीत भी की।

सावरकर को जब अंडमान की जेल में एकांत कारावास की सजा हुई तो उन्‍होंने वहां की कोठरी की दीवारों पर कील और कोयले से पूरी दीवार पर कविता लिख डाली थीं। यहां पर लिखी गईं करीब 10 हजार पक्तियों को उन्‍होंने जेल से छूटने के बाद दोबारा लिखा था।

आजादी के आंदोलन के चलते उन्‍हें अंग्रेजों के राज में 2-2 बार आजीवन कारावास की सजा मिली थी। उन्‍होंने हर बार सजा को पूरा किया और फिर से पहले की तरह आंदोलन में सक्रिय हो गए।

सावरकर की कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को प्रकाशन से पहले ही कुछ देशों ने प्रतिबंधित कर दिया था।
बेहद कम लोग जानते हैं कि अंग्रेज सरकार ने उन्‍हें मिली स्‍नातक की डिग्री को इसलिए वापस ले लिया था क्‍योंकि उन्‍होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था।

वीर सावरकर ने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय विद्यार्थी थे।

वीर सावरकर ने ही सबसे पहले विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी। इसके बाद में ये आंदोलन पूरे देश में फैल गया था।

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