पुण्यतिथि विशेष: दुनियावी एहसास के जीवंत आईना थे साहिर

साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म 8 मार्च 1921 को लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। साहिर लुधियानवी का इंतकाल 25 अक्टूबर 1980 को हुआ। हालांकि इनके पिता बहुत धनी थे पर माता-पिता में अलगाव होने के कारण उन्हें माता के साथ रहना पड़ा और गरीबी में गुज़र करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के ख़ालसा हाई स्कूल में हुई। सन् 1939 में जब वे गवर्मेंट कालेज के विद्यार्थी थे तब अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा। कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए मशहूर हो गए थे और अमृता इनकी प्रशंसक बनी लेकिन अमृता के घर वालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब। बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया। जीविका चलाने के लिये उन्होंने तरह तरह की छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं।
साहिर लुधियानवी की असीम शख्सियत को उनके कलम की नोक के एक तोहफे पर समेटना कुछ ऐसा होगा कि जैसे आसमां को एक डिब्बे में बंद करने की जद्दोजेहद। पर जैसे आसमान का सिमटा हुआ अक्स भी उसके फैलाव पर असमंजस पैदा करता है, वैसे ही साहिर का एक गीत, उनकी एक नज़्म, उनकी शख्सियत की रूमानियत, उसकी व्यवहारिकता, उनकी हंसी, उनके रंज और उनके व्यक्तिगत गुरूर को एक ही झटके में बयां कर देता है। साहिर दुनियावी एहसास के जीते जागते आईना थे। 08 मार्च, 1921 की पैदाइश, साहिर लुधियानवी का असल नाम था, अब्दुल हयी। एक कठिन पिता और एक जुझारू और ममतामयी माँ के बीच झूलते, साहिर के कठिन बचपन ने जो कुछ देखा, जो कुछ समझा, उन एहसासों ने उनके ख्वाबों, उनकी कलम, उनकी रूह और उनके इश्क पर जबरदस्त असर डाला। आजा़दी के परवाने बन कर, हिन्दुस्तानियों के दिलों की कड़वाहट को कागज़ पर उतारने वाले साहिर ने, देश के बंटवारे और इश्क ओ रूमानियत के कई पहलुओं को तीर की तरह इस्तेमाल कर, लोगों के एहसासों पर सीधा-सीधा वार किया। और यह वार कविता और शायरी की दुनिया से लेकर फिल्मी गीतों के उनके सफर तक यूं ही धारदार बना रहा।
साहिर के गीत इश्क की ज़िद को खूबसूरती से तराशते हैं
साहिर के लिखे अनगिनत फिल्मी गीतों की गिनती में, सन् 1963 में आयी एक फिल्म थी, ताजमहल। इसमें बीना राय और प्रदीप कुमार ने मुख्य भूमिकायें अदा की थी। संगीत था, रोशन का और गीतकार थे साहिर लुधियानवी। इस फिल्म के गीतों में, साहिर ने, शाहजा़दा खुर्रम ओर अर्जुमन बानो की प्रेम कहानी को बेहद खूबसूरती से शायरी और कविता में उतारा है। बात चाहे, ’’जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं’’ की हो, जिसमें इश्क में सरोबार एक दिल अपनी महबूबा के अक्स में उसकी मौजूदगी तलाशता है; ’’पाँव छू लेने दो’’ जैसे गीत की, जहाँ नायक अपनी महबूबा की शर्म और अपने इज़हार की बयानगी को रंवा करता है या फिर बात ’’जो वादा किया वो निभाना पडे़गा’’, जैसी बेहतरीन नज़्म की हो, जिसमें इश्क की रूहानी गहरायी, इश्क की ज़िद को खूबसूरती से तराशती है।
साहिर, उन बेहतरीन शायरों में से रहे, जिनके लिखे अधिकतर कलाम, जज्बात की एक लौ नहीं, बल्कि पूरा फानूस जला देते थे। उनकी लिखावट में जहां पहाड़ का ठहराव था, वहीं पानी जैसी तरलता भी। पढ़ने वाला पाठक, या सुनने वाला श्रोता, उनके शब्दों की अलख में वही धुनी रमा सकता है, जैसी उसकी आत्मा की ख्वाहिश हो।
-एजेंसियां

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