पुण्‍यतिथि विशेष: बाल साहित्य के मनीषी डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे

हिंदी के प्रतिष्‍ठित बाल साहित्‍यकार और संपादक डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे की आज पुण्‍यतिथि है। 9 मार्च 1938 को मध्‍य प्रदेश के नागोद में जन्मे डॉ. देवसरे का निधन 14 नवंबर 2013 के दिन गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
कविता, कहानी, नाटक, आलोचना आदि विधाओं में उनकी लगभग 300 पुस्‍तकें प्रकाशित हैं। वे बच्‍चों की लोकप्रिय पत्रिका पराग के लगभग 10 वर्ष संपादक भी रहे।
हरिकृष्‍ण देवसरे का नाम हिंदी साहित्य के अग्रणी लेखकों में था और बच्चों के लिए रचित उनके साहित्य को विशेष रूप से पसंद किया गया। बच्चों के लिए लेखन के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2011 में साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 300 से अधिक पुस्तकें लिख चुके देवसरे को बाल साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान (2001) और हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान (2004) सहित कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया। कहा जाता है कि देवसरे देश के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बाल साहित्य में डाक्टरेट की उपाधि हासिल की थी।
डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे की मुख्य रचनाएँ हैं– डाकू का बेटा, आल्‍हा-ऊदल, शोहराब-रुस्‍तम, महात्‍मा गांधी,
भगत सिंह, मील के पहले पत्‍थर, प्रथम दीपस्‍तंभ, दूसरे ग्रहों के गुप्‍तचर, मंगलग्रह में राजू, उड़ती तश्‍तरियाँ, आओ चंदा के देश चलें, स्‍वान यात्रा, लावेनी, घना जंगल डॉट काम, खेल बच्‍चे का, आओ चंदा के देश चलें, गिरना स्‍काइलैब का।
बच्चों को मायावी फंतासी के दुष्चक्र से निकालने के लिए डॉ. देवसरे ने न सिर्फ ‘पराग‘ के माध्यम से रचनाकारों को प्रेरित किया, वरन स्वयं भी वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न साहित्य की रचना करके साहित्यकारों के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
उन्होंने 1984 से 1991 तक के ‘पराग‘ के सम्पादन के दौरान बाल साहित्य में राजा-रानी और परीकथाओं की प्रासंगिकता पर तर्कपूर्ण ढंग से सवाल उठाए और बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास पर बल दिया। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने बाल साहित्य की जो सेवा की है, वह अतुलनीय है।
डॉ. देवसरे की गिनती साहित्य के उन मनीषियों में होती है, जिनकी नसों में बाल साहित्य जुनून की तरह दौड़ता रहा। अपने इसी जुनून के कारण ही वे आकाशवाणी के सहायक निदेशक जैसे पद का परित्याग करके ‘पराग‘ पत्रिका के संपादक का पद स्वीकारने का साहस जुटा सके।
पुरस्कार-उपाधि– साहित्य अकादमी बाल साहित्य लाइफटाइम पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बाल साहित्य सम्मान, कीर्ति सम्मान (2001) और हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान (2004)।
देवसरे जैसा साहित्यकार सदियों में एक बार ही जन्म लेता है। भौतिक रूप में वे भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका स्नेहिल आशीष हम सबके दिलों को महका रहा है। और शायद यह कहना कोई अतिश्‍योक्ति न होगी कि जब तक इस धरती पर बच्चे रहेंगे, बच्चों का साहित्य रहेगा, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य के आकाश में ध्रुव तारे की भांति जगमगाते रहेंगे।
-Legend News

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