भारत के लिए एक जैसा सोचते हैं- डेविड फ्रॉली, कोएनराड एल्स्ट, फ्रांस्वा गोतिए और तारेक फतेह

Ganga Aarti
भारत के लिए एक जैसा सोचते हैं- डेविड फ्रॉली, कोएनराड एल्स्ट, फ्रांस्वा गोतिए और तारेक फतेह

नई दिल्‍ली। भारत के लिए एक जैसा सोचते हैं- डेविड फ्रॉली, कोएनराड एल्स्ट, फ्रांस्वा गोतिए और तारेक फतेह। जी हां,उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के साथ बीजेपी देश में और मजबूत हुई तो हिंदुत्व के इन विदेशी पैरोकारों ने भी इसकी जमकर सराहना की। डेविड फ्रॉली, कोएनराड एल्स्ट जैसे विद्वान, पत्रकार फ्रांस्वा गोतिए और पाकिस्तान में जन्मे कनाडाई तारेक फतेह उन विदेशी लोगों में शामिल हैं जो गोरक्षा, तीन तलाक और राम मंदिर जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी राय जाहिर करते रहे हैं। वामपंथी और उदारवादी विमर्श के बीच वह हिंदुत्व के बड़े समर्थक बनकर उभरे हैं जो सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हैं।

डेविड फ्रॉली

‘भारत में एक नए राम राज्य का धीरे-धीरे, पर स्थिरता से उदय हो रहा है। सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद में एक बार फिर धर्म की चर्चा हो रही है।’ वैदिक शिक्षक और पद्म भूषण से नवाजे गए डॉ डेविड फ्रॉली ने हाल ही में अपने एक ट्वीट में यह बात कही। उन्हें पंडित वामदेव शास्त्री के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने ट्विटर पर यह लिखा कि किस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ मिलकर एक शक्तिशाली योग शक्ति लेकर आए हैं जो उत्तर प्रदेश को बदलकर रख देगा और एक नए युग की शरुआत होगी। उनकी राय के मुताबिक, भारत हमेशा से नेहरूवादी दृष्टिकोण में बंधा रहा और कांग्रेस की सरकारों ने देश की योग, धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं की अनदेखी कर सिर्फ अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति की।

यह बताते हुए कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि अब भारत धार्मिक परंपराओं की राह पर चल पड़ा है, अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ वैदिक सायेंसज के संस्थापक डेविड फ्रॉली ने कहा, ‘मुझे लगता है कि नेहरूवादी दृष्टिकोण और 2014 तक की कांग्रेस सरकारों की नाकामी का इसमें बड़ा योगदान है। उन्होंने भारत की धार्मिक विरासत का महत्व कम करने की कोशिश की जिससे लोगों का सरकार पर से भरोसा खत्म हो गया। दूसरी तरफ, मोदी सरकार ने देश में और साथ ही विदेश नीति के मुद्दे के एक रूप में योग और भारत के अन्य धार्मिक मूल्यों को महत्व दिया है। इस तरह की कर्म योग वाली राजनीति का स्वागत हो रहा है।’

फ्रांस्वा गोतिए

फ्रांस के पत्रकार फ्रांस्वा गोतिए भी पीएम नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ करते हैं। हाल ही में गोतिए ने दावा किया था कि फ्रांस के भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने अपने भविष्यवाणियों में मोदी का ही जिक्र किया था। मोदी से अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए वह कहते हैं, ‘जब मैं मोदी ने मिलने उनके ऑफिस गया तो वहां सिर्फ वे लोग थे जो काम के सिलसिले में आए थे। इस बात से मैं काफी प्रभावित हुआ। मैंने पाया कि मोदी को पर्यावरण से बहुत प्रेम है, वह गुजरात को देश का सबसे हरा भरा राज्य बनाना चाहते हैं और साथ ही निवेशकों के लिए सबसे श्रेष्ठ राज्य भी। इसके बाद मैंने अपने लेखों में उनकी प्रशंसा करनी शुरू कर दी।’ गोतिए का हिंदुत्व के प्रति झुकाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल में लिखे गए अपने एक ब्लॉग में उन्होंने हिंदुओं के 50 दुश्मनों की पहचान की है जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, आमिर खान, शाहरुख खान और पोप का नाम भी शामिल किया है।

कोएनराड एल्स्ट

बेल्जियम के विद्वान कोएनराड एल्स्ट भी अपने उस अध्ययन की वजह से हिंदुत्व के समर्थकों के चहेते बने हुए हैं जिसमें दावा किया गया है कि अयोध्या में जिस जरह बाबरी मस्जिद थी, वहां पहले मंदिर था।

तारेक फतेह

इस विदेशी क्लब में सबसे ताजा एंट्री हुई है पाकिस्तान में जन्मे कनाडाई तारेक फतेह की जो इस्लाम पर आधारित एक विवादित टीवी शो को होस्ट करते हैं। फतेह खुद को पाकिस्तान में जन्मा भारतीय बताते हैं जिसके पूर्वज हिंदू थे। वह सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने औरंगजेब रोड का नाम बदलने का समर्थन किया और ऐक्टर सैफ अली खान और करीना कपूर द्वारा अपने बेटे का नाम तैमूर रखे जाने को भी गलत बताया। साथ ही बीफ खाने का भी वह खुलकर विरोध करते हैं।

सोशल मीडिया पर लोकप्रिय

ऐसे वक्त में जब सोशल मीडिया संचार और प्रचार का एक अहम हथियार बन चुका है, फ्रॉली और फतेह जैसे लोग काफी लोकप्रिय हो गए हैं। ट्विटर पर फतेह के 28, 000 फॉलोअर्स हैं जबकि फ्रॉली के 33, 000, गोतिए को 29,000 लोग फॉलो करते हैं। उनके ब्लॉग और लेख बड़े पैमाने पर पढ़े और शेयर किए जाते हैं।

विरोध करने वाले भी बहुत

हालांकि ऐसा नहीं है कि हर कोई इन्हें पसंद ही करता है। उन्हें नापसंद करने वालों और उनका विरोध करने वाले लोगों की भी कमी नहीं। पौराणिक विशेषज्ञ देवदत्त पटनायक फ्रॉली और एल्स्ट जैसे विद्वानों की लोकप्रियता की वजह बताते हुए कहा हैं, ‘यह हिंदुओं की उस भावना के चलते हुआ है जिसके तहत वह अपने बारे में अच्छा सुनना और महसूस करना चाहते हैं और विदेशियों के मुंह से यह तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगेगा।’ दूसरी तरफ एस इरफान हबीब जैसे कुछ इतिहासकार तो इन लोगों की पहचान पर ही सवाल खड़े करते हैं। वह उन्हें हिंदुत्व से जोड़कर नहीं देखते। वह कहते हैं कि इन विदेशियों को ‘वैधता’ ‘राज्य द्वारा प्रायोजित राष्ट्रवाद’ की वजह से मिली है, न कि अपने काम की वजह से।

– एजेंसी

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