कोरोना: आपदा के दौरान की चुनौत‍ियों के बाद का जीवन

कोरोना महामारी से बचने के लिए कहा जा सकता है कि मजबूरी में लॉकडाउन जैसी सख्ती सरकार को बरतनी पड़ी वगरना इस महामारी से मरने वालों की संख्या लाखों करोड़ों में होती। हालांकि इस तरह की सख्ती से आम जनमानस को काफी कुछ नुकसान हुआ है और हो रहा है, वहीं इस मौके का फायदा उठाने वालों ने भी मौका नहीं छोड़ा है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि इस महामारी की खबर विगत वर्ष दिसम्बर 2019 के उत्तरार्ध में ही लग गई थी, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लेकर विदेशी आवागमन प्रतिबंधित नहीं किया गया। अगर शुरू में ही विदेशी आवागमन पर प्रतिबंध लगता तो हालात कुछ तो सम्भले होते। आम धारणा के हिसाब से कोरोना वायरस की महामारी संकट से ज्यादा त्रासदी लोगों ने तालाबंदी बनाम लाकडाउन से भुगती है। नाइंसाफी बेरोजगारों और गरीबों के साथ ज्यादा हुई जिसे मोदी सरकार के मीडिया ने अपनी व्यावसायिकता के मद्देनजर दर पेश नहीं किया। लाकडाउन के दौरान मोदी सरकार ने किरायेदारों का किराया माफ करने या कम करने और किस्तों में लेने का मकान मालिकों से निवेदन किया था, लेकिन ऐसे बहुत कम मकान मालिक होंगे। निजी कंपनियों या अन्य निजी संस्थाओं में लाकडाउन के दौरान गैर हाजिर रहने वाले कर्मियों को वेतन/अर्धवेतन की सुविधा का मालिकों से मोदी सरकार ने निवेदन किया था। लेकिन यहां भी ऐसा नहीं हुआ, गिनती की ही कंपनियों, कारखानों, उद्योग-धंधों ने कर्मचारियों को पूरा या आधा वेतन लाकडाउन की गैर हाजिरी में मिला। यहां तक कि जनता की समस्याओं को उठाने वाले मीडिया जगत की कई संस्थाओं ने अपने कई कर्मचारियों को सड़क पर ला दिया। (अपवाद केवल गिनती का हो सकता है।) राशन भी बंटा और मीडिया जगत में फोटो भी छपे, परन्तु इसका आवंटन वाकई जरूरतमंदों में किया गया? यहां भी यह देखने में आया कि कुछ लोगों को बांटने की रस्म अदा कर अपनों का भला कर दिया गया। पुलिस की सख्ती इतनी थी कि घर से बाहर निकलने की भी कोई जरूरतमंद गरीब सोच नहीं सकता था। इसके अलावा आम धारणा के मुताबिक कई केसेस किडनी निकाले जाने के भी सामने आए हैं।
मजदूर/बेरोजगार/दिहाड़ी मजबूर
लॉकडाउन की वजह से मजदूरों को बहुत नुकसान हुआ है, जो रोजमर्रा के काम से अपने घर का पेट पालते थे। आज उनके लिए एक वक्त की रोटी भी बहुत मुश्किल हो गई। कई मजदूर ऐसे हैं, जो भूखे पेट ही सो रहे हैं। अगर लॉकडाउन का सबसे ज्यादा नुकसान किसी को हुआ है तो वह है मजदूर, जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। एक और मजे की बात मप्र और उन राज्यों के विषय में यह कि जहां भी उपचुनाव या निकाय आदि चुनाव इस संक्रमण काल में हुए। कोरोना केसेस का प्रतिशत बहुत कम था। लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त हुए कोरोना प्रभावितों की संख्या में डेढ़ से दोगुना इजाफा हो गया। 12 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं और उद्योग-व्यापार ठप्प है। देश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 21.7 प्रतिशत से बढ़ कर 40 प्रतिशत से ऊपर तक होने की संभावनाएं हैं। आमधारणा के मुताबिक अकेले मप्र राज्य में ही लाकडाउन की वजह से आबादी के लगभग 70 से 85 प्रतिशत मजदूर हिस्से के सामने आज दो रोटी का सवाल खड़ा हो गया। कई निजी संस्थाओं, कारखानों आदि में छोटे या निम्न श्रेणी लगभग 50 से 55 प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई है।
लॉकडाउन की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान हुआ है। कारखानों को बंद रखने के कारण भारी नुकसान वहन करना पड़ रहा है, वहीं व्यापार भी पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है। लोगों की नौकरियां चली गई हैं जिसकी वजह से बेरोजगारी की समस्या भी उत्पन्न हो गई है। लॉकडाउन की वजह से देश आर्थिक रूप से कमजोर पड़ रहा है।
मानसिक आघात
दिन-रात सिर्फ कोरोना से संबधित खबरें लोगों को मानसिक रूप से परेशान कर रही हैं, जो उन्हें नकारात्मक कर रही हैं। पूरे दिन घर पर रहने और शारीरिक व्यायाम न होने से लोग खुद को स्वस्थ भी महसूस नहीं कर पा रहे हैं। बच्चे भी पूरे दिन घर पर रहकर चिड़चिड़ापन महसूस करने लगे हैं, क्योंकि वे बाहर खेलने हेतु अपने दोस्तों के साथ मिलने में असमर्थ हैं। कोरोना वायरस की खबरें लोगों को परेशान कर रही हैं जिससे कई लोग डिप्रेशन जैसी समस्या से भी जूझ रहे हैं।
सोशल डिस्टेसिंग
हालांकि सरकार ने इस महामारी के कारण थोड़ी बहुत सख्ती भी की है। इस महामारी के प्रकोप से लाखों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और इससे बचने का सिर्फ एक ही रास्ता है और वो है सोशल डिस्टेंसिग यानी कि सामाजिक दूरी। यह संक्रमण एक से दूसरे इंसान तक बहुत तेजी से फैलता है जिसके कारण भारत सरकार ने लॉकडाउन को ही इससे बचने के लिए आवश्यक कहा है। लेकिन जनता अगर खुद समझदारी दिखाए तो लाकडाउन जैसी नौबत ही नहीं आए. मगर ऐसा असंभव लगता है।
घर में रहने का मौका
लॉकडाउन के दौरान बच्चों को अपने माता-पिता के साथ समय बिताने का मौका मिल रहा है, वहीं जो लोग खाना बनाने के शौकीन हैं, वो यूट्यूब के माध्यम से खाना बनाना भी सीख रहे। पुराने सीरियलों का दौर वापस आ गया है जिसका मजा लोग अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर ले रहे हैं और अपनी पुरानी यादों को वापस से जी रहे हैं। बच्चों के साथ वीडियो गेम्स, कैरम जैसे गृहखेल का बड़ों ने आनंद लिया। विद्यालयों में छुट्टी होने के कारण घर बैठकर शिक्षकों ने आॅनलाइन क्लासेज का सहारा लिया ताकि विद्यार्थियों की शिक्षा में कोई रुकावट न आए।
प्रदूषण में कमी
ये जरूर है कि लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में कमी हुई है। अगर लॉकडाउन से पहले की बात करें तो उस समय कारखानों से निकलने वाला कचरा जल में प्रवाहित कर दिया जाता था, गाड़ियों के रास्तों पर दौड़ने से ध्वनि और वायु प्रदूषण हो रहे थे लेकिन लॉकडाउन की वजह से इन सभी चीजों में कमी आई है और आज चिड़ियों की चहचहाहट हमारे आंगन में वापस से सुनाई दे रही है, जो कहीं खो-सी गई थी। नदियों का जल स्वच्छता की ओर अग्रसर हो रहा है।
सामाजिक पीड़ा
लाकडाउन लगाने के पीछे हालांकि मंशा लोगों के स्वास्थ्य की चिंता कही जा सकती है, लेकिन इसका विपरीत असर यह हुआ कि लाकडाउन की वजह से सामाजिक विषमता भी धीरे-धीरे पैदा होने लगी। किसी घर में कोरोना महामारी से मौत होने पर उस घर के आस-पड़ोसी ही नहीं बल्कि रिश्तेदार तक दूरिया बना बैठे।
राहत का दुरुपयोग
लाकडाउन के दौरान लोगों को घरों में रहने की चेतावनी के मद्देनजर जनमानस को रोजमर्रा की चीजें उपलब्ध कराने और गरीब लोगों और मजदूरों आदि को मुफ्त का राशन देने की जो परंपरा शुरू की गई उसका काफी अच्छा असर जरूर हुआ, लेकिन इसका फायदा भी (कुछ अपवादों को छोड़कर) राहत बांटने वालों ने उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राहत सामग्री में से कहीं चावल गायब थे, कहीं शकर, तो कहीं तेल। कहा जाता है कि सरकार की तरफ से जितनी भी राहत सामग्री गरीबों और मजदूरों के लिए भेजी गई थी, उसका लाभ उठाने वाले वास्तविक हितग्राही कम ही कहे जा सकते हैं।

– अनिल शर्मा

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