जैविक हथियारों की चर्चा को फिर केन्‍द्र में लाया कोरोना

दुनियाभर में एक लाख से अधिक लोगों की जान ले चुके कोरोना वायरस महासंकट को लेकर अटकलों का बाजार गरम है। वुहान शहर से फैले कोरोना वायरस को लेकर चीन पूरी दुनिया के निशाने पर आ गया है। चीन पर आरोप लग रहे हैं कि वह वुहान की लैब में चमगादड़ से जैव‍िक हथियार बना रहा था और गलती से वह फैल गया।
आइए जानते हैं कि क्‍या है जैविक हथियार और क्‍यूं यह पूरी दुनिया के लिए खतरनाक हैं?
जानें, क्‍या हैं व‍िनाशकारी जैविक हथियार
विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के मुताबिक जैव‍िक हथियार ऐसे सूक्ष्‍मजीवी जैसे वायरस, बैक्‍टीरिया, फंगी और अन्‍य हानिकारक तत्‍व हैं जिसे पैदा किया जाता है और जानबूझकर उसे फैलाया जाता है। इसका उद्देश्‍य इंसानों, पशुओं और पेड़-पौधों की हत्‍या करना या उनमें बीमारी पैदा करना होता है।
बॉयोलॉजिकल एजेंट जैसे एंथ्रेक्‍स, बोटूलिनम टॉक्सिन और प्‍लेग आदि किसी भी देश के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकते हैं। जैविक हथियार से बहुत कम समय में बहुत ज्‍यादा लोगों की मौत हो सकती है। इन हथियारों से किसी खास टारगेट या व्‍यापक जनसमुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।
बायो वेपन व्‍यापक विनाश के हथियार
जैविक हथियारों को व्‍यापक विनाश के हथियारों में गिना जाता है। पूरी दुनिया के देश बहुत तेजी से जैव‍िक हथियारों को बनाने पर काम कर रहे हैं। यही नहीं आतंकवादी समूह भी इसे हासिल करने की फिराक में हैं। इससे व‍िश्‍वभर में बायोटेररिस्‍ट अटैक का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी खतरे को देखते हुए एनपीटी तरह ही जैव हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण पर रोक लगाने के लिए बायोलॉजिकल ऐंड टॉक्सिन वेपंस कन्वेंशन (बीडब्ल्यूसी) भी 26 मार्च 1975 को संपन्न हुआ था। हालांकि जैव हथियार संधि का ईमानदारी से पालन सुनिश्चित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई।
ईसा पूर्व से हो रहा इनका इस्‍तेमाल
जैविक हथियारों का इस्‍तेमाल प्राचीन काल से ही किया जा रहा है। 400 ईसा पूर्व में साइबेरिया में पाए जाने वाले घुमंतू कबीले स्‍केथियन के तीरंदाज मरे हुए लोगों के खून में सने हुए तीरों का इस्‍तेमाल करते थे। फारसी, यूनान और रोमन साहित्‍य में इस बात के साक्ष्‍य हैं कि मरे हुए जानवरों को पीने के पानी के कुंओं में डाल दिया जाता था। इससे पानी संक्रमित हो जाता था और उसे पीते ही आसपास के लोग मर जाते थे। 190 ईसा पूर्व में यूरीमेडान की जंग में राजा हन्‍नीबाल ने अपने शत्रु के जहाजों पर जहरीले सांप फेंककर युद्ध में जीत हासिल की थी। 14वीं सदी में काफा शहर पर कब्‍जा करने की जंग के दौरान टटार सैनिकों ने प्‍लेग से संक्रमित लोगों के शव शहर के अंदर फेंक दिए ताकि वहां प्‍लेग फैल जाए। बाद में अंग्रेजों ने भी इसका इस्‍तेमाल किया।
आधुनिक समय में घातक हुए ‘बायो बम’
1900 के दशक में बॉयो वेपन बहुत घातक हो गए। माना जाता है कि प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने जैविक हथियार के रूप में एंथ्रेक्‍स, ग्लैन्डर्ज़ बैक्‍टीरिया, कालरा और गेहूं में लगने वाले एक फंगस का निर्माण किया। जर्मनी पर आरोप हैं कि उसने रूस के सेंट पिट्सबर्ग में प्‍लेग फैलाया। इसके बाद 1925 में 108 देशों ने जिनेवा प्रोटोकॉल पर हस्‍ताक्षर किया। इस संधि के बाद भी जापान ने द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान कैदियों पर एक सीक्रेट बॉयो वेपन का टेस्‍ट किया था। वर्ष 1942 में अमेरिका ने वॉर रीसर्च सर्विस को बनाया। इसके बाद अमेरिका लगातार बॉयो वेपन का टेस्‍ट करता रहा। ऐसे आरोप हैं कि ब्रिटेन ने वर्ष 1957 में बॉयोवेपन का इस्‍तेमाल किया था। चीन का आरोप है कि अमेरिका ने वर्ष 1961 में हॉन्‍गकांग में कालरा महामारी फैलाया था
भारत पर आतंकी कर सकते हैं हमला
दुनिया में जैसे-जैसे बॉयो वेपन बढ़ रहे हैं, उनके आतंकियों के हाथों में जाने का खतरा बढ़ता जा रहा है। पाकिस्‍तानी आतंकियों के हमले के शिकार रहे भारत पर जैविक हथियारों से हमले का और ज्‍यादा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आतंकी पाउडर और एरोसोल स्‍प्रे की मदद से किसी घातक वायरस को भारत में फैला सकते हैं। यही नहीं आतंकी पीने के पानी या खाने में मिलाकर लाखों को निशाना बना सकते हैं। प्‍लेन से हवा में छोड़ सकते हैं। ये वायरस बनाने में काफी आसान और सस्‍ते होते हैं। यह हमला कुछ उसी तरह से हो सकता है, जैसे युद्ध।
-एजेंसियां

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