संस्कृति यूनिवर्सिटी का राष्ट्रीय Plant Genetic संसाधन ब्यूरो से अनुबंध

Plant Genetic में अब कृषि एवं बायोटेक्नोलाजी के छात्र-छात्राओं के सपनों को लगेंगे पंख

मथुरा। कृषि एवं बायोटेक्नोलाजी के छात्र-छात्राओं के सपनों को नया आयाम देने के लिए संस्कृति यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय Plant Genetic संसाधन ब्यूरो से अनुबंध किया है। संस्कृति यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के बीच एमओयू साइन होने से कृषि एवं बायोटेक्नोलाजी में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को ट्रेनिंग और अनुसंधान कार्य में मदद मिलेगी। इस अनुबंध से अब एनबीपीजीआर के विश्वस्तरीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के व्याख्यानों से संस्कृति यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राएं लाभान्वित हो सकेंगे।

बुधवार, नौ जनवरी का दिन संस्कृति यूनिवर्सिटी के कृषि संकाय के छात्र-छात्राओं के लिए खुशियों भरा पैगाम साबित हुआ। संस्कृति यूनिवर्सिटी प्रबंधन अपने छात्र-छात्राओं को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से रूबरू कराने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी परिप्रेक्ष्य में बुधवार को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो और संस्कृति यूनिवर्सिटी के बीच एमओयू (अनुबंध) पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस अनुबंध के बाद अब संस्कृति यूनिवर्सिटी के कृषि एवं बायोटेक्नोलाजी के स्नातक और परास्नातक छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो जाकर वहां प्रशिक्षण और अनुसंधान कर सकेंगे। संस्कृति यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के बीच हुए अनुबंध पर निदेशक एनबीपीजीआर डा. कुलदीप सिंह और कुलपति डा. राणा सिंह ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर डा. शशी भल्ला, डा. सैयद कामरान अहमद, डा. सुनील चंद दुबे, डा. सुधीर अहलावत, डा. कविता गुप्ता, विवेक पूर्वार आदि उपस्थित थे।

भारत सरकार ने पादप आनुवंशिक संसाधनों के संकट से उबरने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो की स्थापना अगस्त, 1976 में नई दिल्ली में की थी। राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो का उद्देश्य पादप आनुवंशिक संसाधनों का विकास, खोज और सर्वेक्षण करना है। यह देश के वैज्ञानिकों से तालमेल रखकर देश के विभिन्न क्षेत्रों से पादप आनुवंशिक संसाधनों को एकत्र करता है। बहुत समय पहले जब इस विषय का वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं हुआ था तब भी अच्छे प्रकार के फूलों और फलों के उत्पादन के लिये बाग-बगीचों में यह कार्य सम्पन्न किया जाता था। दरअसल, कृत्रिम रीति से परागण कराकर नए पौधे प्राप्त करने की क्रिया को पादप प्रजनन कहते हैं। इस क्रिया का प्रयोग देश की आर्थिक उन्नति में बहुत ही सहायक है। इस क्रिया द्वारा कपास, तम्बाकू, गेहूँ, चावल, दलहन और दवाइयों में काम आने वाले ऐसे पौधों का पर्याप्त विकास किया गया है, जो हर वातावरण में अपने को ठीक रख सकें।

कुलाधिपति सचिन गुप्ता ने संस्कृति यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय पादप Genetic संसाधन ब्यूरो के बीच हुए अनुबंध को मील का पत्थर करार देते हुए कहा कि इससे युवा पीढ़ी कृषि की आधुनिक तकनीक से जहां परिचित होगी वहीं वह स्वयं भी अनुसंधान के क्षेत्र में रुचि लेते हुए कुछ नया करेगी। उप-कुलाधिपति राजेश गुप्ता का कहना है कि भारत कृषि प्रधान देश है, ऐसे में संस्कृति यूनिवर्सिटी युवा पीढ़ी को आधुनिक कृषि प्रणाली से परिचित कराकर देश के विकास में प्रमुख योगदान देना चाहती है। हमारा प्रयास है कि युवा कृषि को जीविकोपार्जन का जरिया मानते हुए इस क्षेत्र में अपना करियर बनाएं। कुलपति डा. राणा सिंह का कहना है कि संस्कृति यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के बीच जो अनुबंध हुआ है, इससे ब्रज मण्डल के छात्र-छात्राएं ही नहीं अन्य प्रदेशों के छात्र-छात्राएं भी कृषि अनुसंधान की तरफ अग्रसर होंगे। आज कृषि क्षेत्र को ऐसी युवा पीढ़ी की दरकार है जोकि बदलते मौसम के अनुरूप उन्नत बीज, उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर विश्व स्तरीय कृषि उत्पादन कर सकेंगे।

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