“PIDI” से ”प्रतिस्‍पर्धा” महंगी पड़ सकती है संजय ”निरुपम” को

सृष्‍टि में संभवत: कुत्ता ही एकमात्र ऐसा जीव होगा जो अपने श्रेष्‍ठतम गुण ”वफादारी” के लिए ”प्रख्‍यात” न होकर ”कुख्‍यात” है। वैसे इसमें कुत्ते का कोई दोष नहीं। दोष तो ”उन इंसानों” का है जिन्‍होंने वफादारी जैसे दुर्लभ गुण को अपने स्‍वार्थ में बदनाम कर दिया।

इंसान के अपने ”दुर-गुण” हैं। वह खुद को सृष्‍टि का सर्वश्रेष्‍ठ जीव कहता है किंतु इंसानियत उसे कदम-कदम पर सिखानी पड़ती है।

क्‍या आपने कुत्ते की कभी कोई ऐसी नस्‍ल देखी या सुनी है जिसमें स्‍वामीभक्‍ति का अभाव हो या फिर वह वफादारी जैसे मौलिक गुण से वंचित हो?

मेरा दावा है कि कुत्तों की ऐसी कोई नस्‍ल आपने कभी न तो देखी होगी और न उसके बारे में सुना होगा क्‍योंकि कुत्ता किसी भी नस्‍ल का हो, वह न सिर्फ मौलिक तौर पर भी कुत्‍ता ही होता है बल्‍कि पूर्ण रूप से ”कुत्तत्‍व” को प्राप्‍त होता है। किसी भी नस्‍ल के कुत्ते को ”कुत्तत्‍व” कभी पढ़ाया अथवा सिखाया नहीं जाता।

इसके ठीक उलट, इंसान की कोई नस्‍ल ऐसी नहीं पायी जाती जिसमें इंसानियत कूट-कूट कर भरी हो। जिसे इंसानियत कभी सिखानी न पड़ती हो।

हां, ये बात दीगर है कि भिन्‍न-भिन्‍न इंसानों में कहीं-कहीं इंसानियत की झलक यदा-कदा देखने या सुनने को मिल जाती है।

इंसानों की इसी फितरत के कारण कोर्ट-कचहरी तथा कानून-व्‍यवस्‍था कायम करने की जरूरत पड़ी होगी अन्‍यथा सृष्‍टि के दूसरे सभी जीव अपनी मौलिकता एवं प्राकृतिक नियमों में बंधे रहकर जीवन पूरा कर जाते हैं।

घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इस सबके बावजूद इंसान खुद को सभ्‍य व सर्वश्रेष्‍ठ कहता है और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली को ”जंगलराज” बताता है जबकि जंगल और जंगली जीव हर तरह से नियमबद्ध जीवन जीते हैं।

इस घोर कलियुग में भी जंगली जीव तभी किसी प्रकृत्ति प्रदत्त नियम का अतिक्रमण करते हैं जब इंसान उन्‍हें वैसा करने के लिए बाध्‍य करता है। इंसानों का उनके जीवन में हस्‍तक्षेप ही उन्‍हें अप्राकृतिक कृत्‍य करने को प्रोत्‍साहित करता है।

मशहूर शायर म़ंजर भोपाली का एक शेर है- 

इस नए ज़माने के आदमी अधूरे हैं,

सूरतें तो मिलती हैं, सीरतें नहीं मिलतीं।

 

अपने बल पे लड़ती है अपनी जंग हर पीढ़ी,

नाम से बुजुर्गों के अज्मतें नहीं मिलतीं।

बहरहाल, कल कांग्रेस के एक नेता संजय निरुपम ने कर्नाटक में येदियुरप्‍पा की सरकार गिर जाने के बाद इतना गिरा हुआ बयान दिया कि कुत्ते भी उनके बयान पर अपना मन मसोस कर रह गए होंगे।

कुत्तों को लगा होगा कि काश…हम भी कुत्तत्‍व से नीचे गिरकर संजय निरुपम को सबक सिखा सकते। काश…हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाने तथा मानहानि का दावा ठोकने के लिए कोई अदालत होती।

संजय निरुपम के अनुसार, ‘इस में देश में वफादारी का नया कीर्तिमान स्‍थापित किया है कर्नाटक के राज्‍यपाल वजुभाई वाला जी ने। अब शायद हिंदुस्‍तान का हर आदमी अपने कुत्ते का नाम वजुभाई वाला ही रखेगा क्‍योंकि इससे ज्‍यादा वफादार तो कोई नहीं हो सकता है। आप आरएसएस से आए हैं, मोदी जी के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी। सब ठीक है साहब, लेकिन आप संवैधानिक पद पर बैठे हैं। अगर आप कानून का पालन नहीं कर सकते हैं तो इस्‍तीफा दे दीजिए।’

हालांकि विवाद बढ़ने के बाद में उन्‍होंने अपने बयान पर ट्वीट करके सफाई दी और माफी मांगी। लेकिन कैसे, देखिए –

"Competition" with "PIDI" May be expensive for Sanjay 'Nirupam'
“PIDI” से ”प्रतिस्‍पर्धा” महंगी पड़ सकती है संजय ”निरुपम” को

 

संजय निरुपम ऐसा बयान देने से पहले अपने ”आका” के “PIDI” की ही भावनाओं का ख्‍याल रख लेते। निरुपम ने तो “PIDI” के भी विशेष अधिकार का हनन करके रख दिया। “PIDI” ने अपने और संजय निरुपम के ”आका” से इसकी शिकायत कर दी तो तय जानिए कि वह बिना ”स्‍वामी” के ”स्‍वामीभक्‍त” बनकर रह जाएंगे।

संजय निरुपम को शायद ही पता हो कि ”निरुपम” का अर्थ अतुलनीय, अद्वितीय और बेजोड़ होता है। निश्‍चित ही संजय ने अपने नाम के आगे लिखे विशेषण को सार्थक सिद्ध कर दिया। उन्‍होंने बेजोड़ स्‍वामीभक्‍ति का प्रदर्शन करते हुए “PIDI” को पीछे छोड़ने में कोई कसर नहीं रखी। “PIDI” को बुरा लगा हो तो “PIDI” जाने, किंतु संजय को इस बात का अफसोस अवश्‍य होगा कि इतनी ”निरुपम” स्‍वामीभक्ति दिखाने के बावजूद पार्टी अध्‍यक्ष से शाबाशी नहीं मिली।

कुछ कांग्रेसी तो यहां तक कह रह हैं कि संजय…तुम क्‍या समझ रहे थे…तुम्‍हारे “PIDI” नुमा बयान पर ”गब्‍बर” खुश होगा, शाबाशी देगा।

संजय को शायद यह नहीं पता कि कांग्रेस पार्टी में संजय और भी हैं, और हर संजय वक्‍त-वक्‍त पर “PIDI” को हराने की पूरी कोशिश करता है इसलिए नाम आगे ”निरुपम” लगा लेने से कोई अकेला ”निरुपम” नहीं हो सकता।

मणिशंकर अय्यर का नाम तो संजय निरुपम ने जरूर सुना होगा। वह उनसे पहली पीढ़ी के स्‍वामीभक्‍त हैं। सवामीभक्‍ति में “PIDI” से प्रतिपर्धा उन्‍हें अंतत: महंगी साबित हुई और आज दिखावे के लिए ही सही, किंतु निष्‍कासित कांग्रेसी नेता कहलाते हैं।

मणिशंकर अय्यर और संजय निरुपम जैसे नेता इस बात को भूल जाते हैं कि स्‍वामीभक्‍ति को लेकर प्रतिपर्धा “PIDI” को सख्‍त नापसंद है। हो भी क्‍यों न, “PIDI” का ”कुत्तत्‍व” किसी को उससे प्रतिपर्धा करने की इजाजत नहीं देता।

बेचारे संजय निरुपम कर्नाटक के राज्‍यपाल की तुलना कुत्ते से करने के चक्‍कर में जाने-अनजाने ही सही किंतु “PIDI” से प्रतिस्‍पर्धा कर बैठे और ऐसी कोई प्रतिपर्धा सीधे-सीधे “PIDI” की मानहानि के दायरे में आती है। यकीन न हो तो किसी कांग्रेसी वकील से पूछकर देख लो।

इसमें कोई शक नहीं कि संजय निरुपम ने दरबारी राजनीति का ककहरा शिवसेना के मुखपत्र ”सामना” के लिए संपादकीय लिखते-लिखते आत्‍मसात कर लिया होगा परंतु वह भूल बैठे कि कांग्रेसी कल्‍चर में “PIDI’s” को बाईपास करना इतना आसान कभी नहीं रहा।

नेहरु से लेकर इंदिरा तक के यहां राग दरबारी गाने वालों की लंबी फेहरिस्‍त रही है और इसीलिए नेहरू-गांधी एंड संस ने हर युग में अपनी सुविधा से अपने “PIDI” चुने हैं। वर्तमान गांधी को अपने “PIDI” से किसी की प्रतिपर्धा पसंद नहीं। पसंद होती तो मणिशंकर अय्यर आज भी कांग्रेस की ”साख” पर ”दृष्‍टिगोचर” होते।

संजय निरुपम की प्राॅब्‍लम यह भी है कि वह कांग्रेसी कल्‍चर की उपज नहीं हैं। वो शिवसेना के आगंन में फले-फूले हैं। उन्‍हें नहीं मालूम की जिस निर्णय के लिए वह कर्नाटक के राज्‍यपाल की वफादारी को बदनाम कर रहे हैं, वैसी वफादारी तो कांग्रेस के प्रथम सम्राट नेहरू जी के जमाने में ही शुरू हो गई थी।

संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण करने की कला प्रत्‍येक शासक ने कांग्रेस से ही सीखी है। कांग्रेस ऐसे कारनामे करने तथा कराने के लिए बहुत पहले से पहचानी जाती है।

अब यदि भाजपा उसी के ज्ञान को हथियार बनाकर उसके खिलाफ इस्‍तेमाल कर रही है तो संजय निरुपम “PIDI” के अधिकारों का ध्‍यान रखे बिना कैसे उसके ”हथियार” से मुकाबला कर सकते हैं।

संजय निरुपम को भली-भांति समझ लेना चाहिए वफादारी पर “PIDI” का पेटेंट है। निजी हित में “PIDI” के पेटेंट का दुरुपयोग करना, उसी तरह भारी पड़ सकता है जिस तरह ”मणिधारी” कांग्रेसी को भारी पड़ गया।

उनका भी दोष तो मात्र इतना था कि उन्‍होंने “PIDI” के पेटेंट का बेजा इस्‍तेमाल करते हुए कभी चाय वाले को सत्ता के शिखर पर बैठने की चुनौती दे डाली थी और ऐलान के साथ कहा था कि कोई चाय वाला कभी पीएम बन नहीं सकता।

फिर उसके बाद पाकिस्‍तानियों से कांग्रेस की सरकार बनवा देने का अनुरोध करते हुए पीएम को ”नीच” बता दिया। बस “PIDI” को लग गया बुरा, नतीजा सबके सामने है।

संजय निरुपम को “PIDI’s” के बारे में एक बात और जान लेनी चाहिए कि उन्‍हें ”सूखी हड्डी” अत्‍यंत प्रिय होती है। कहते हैं कि ”सूखी हड्डी” से रस निकालने के लालच में “PIDI’s” अपने मुंह को जख्‍मी कर बैठते हैं।

यह भी देखा गया है कि मुंह से खून बहने के बावजूद “PIDI’s” अपने मुंह से ”सूखी हड्डी” नहीं छोड़ते। इनफैक्‍ट उनके मुंह से उस हड्डी को निकालना करीब-करीब असंभव होता है।

बेहतर होगा कि संजय निरुपम इस कड़वी सच्‍चाई को समय रहते समझ लें अन्‍यथा “PIDI” उन्‍हें न घर का रहने देगा न घाट का।

गले में यह हड्डी फंस गई तो निगलना और उगलना, दोनों मुश्‍किल हो जाएगा।

“PIDI” के पास तो अपनी नाक पर रखी जाने वाली बिस्‍किट को लपक कर खा जाने का अवसर है किंतु तमाम लोगों के पास ऐसा भी कोई अवसर नहीं है क्‍योंकि “PIDI” शौक के लिए पाले जाते हैं, उन्‍हें सत्ता नहीं सौंपी जाती।

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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