कॉमन सिविल कोड सरकार के टॉप अजेंडे में, मुस्‍लिम असहमत

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद देशभर में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक आचार संहिता पर बहस फिर से छिड़ गई है।
एक तरफ बीजेपी, संघ और सरकार पहले से ही इसके पक्षधर रहे हैं तो वहीं मुस्लिम समुदाय इसका विरोध करता आया है। हाल ही में तीन तलाक और अनुच्छेद 370 पर सरकार द्वारा लिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद कॉमन सिविल कोड सरकार के बचे टॉप अजेंडे में माना जा रहा है लेकिन कई प्रमुख मुस्लिम संगठन अब भी इसके लिए तैयार नहीं हैं।
उधर, इस पर संसद में बहस की बात भी शुरू होने लगी है।
कोर्ट की टिप्पणी के एक दिन बाद कई मुस्लिम संगठनों के सदस्यों ने कॉमन सिविल कोड का विरोध किया है। उनका कहना है कि इतनी विविधताओं वाले देश में यह न तो व्यावहारिक है और न ही लागू करना संभव है। अलग-अलग पर्सनल लॉ और समुदायों यहां तक कि एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए संगठनों ने सवाल उठाए हैं।
विधि आयोग के बयान में क्या था?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे मुस्लिम संगठनों के सदस्यों ने पिछले साल 31 अगस्त को फैमिली लॉज पर विधि आयोग द्वारा जारी किए गए परामर्श पत्र का भी जिक्र किया। AIMPLB ने तब विधि आयोग के उस बयान का स्वागत किया था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) न तो जरूरी है और न ही इस समय वांछनीय है। AIMPLB ने तब अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि वह आयोग द्वारा सुझाए गए पर्सनल लॉ में बदलावों और सुधार के लिए तैयार नहीं है। उसने कहा था कि यह सब सोशल फ्रेमवर्क के जरिए ही हो सकेगा।
रहमानी बोले, इसे लागू करना व्यावहारिक नहीं
AIMPLB के महासचिव मौलाना सैयद वली रहमानी ने कहा, ‘यहां तक कि विधि आयोग भी अपने परामर्श पत्र में स्वीकार करता है कि UCC इस समय न तो जरूरी है और न ही वांछनीय। मेरा यह विचार है कि भारत में UCC लागू करना अव्यावहारिक है।’
एक साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद अब यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत पूरे देश में UCC लागू करने पर गंभीर न होने पर नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा कि 1956 में हिंदू लॉ आने के 63 साल बीत जाने के बाद भी कॉमन सिविल कोड की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए।
तर्क- विविधताएं इतनी, एक कोड कैसे?
AIMPLB के सदस्य कमाल फारूकी ने कहा, ‘पर्सनल लॉज में काफी विविधताएं हैं। कैसे एक यूनिफॉर्म सिविल कोड सब पर लागू किया जा सकता है। अगर सरकार इस समय संसद में अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए UCC लाती भी है तो इससे समस्याओं का पिटारा खुल जाएगा और इसे जमीन पर लागू करना संभव नहीं होगा।’ जमीयत उलेमा-ए-हिंद के वरिष्ठ पदाधिकारी नियाज अहमद फारूकी ने भी कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना असंभव है।
सदन में होगी कॉमन सिविल कोड की चर्चा
उधर, बीजेपी सांसद रीता बहुगुणा जोशी ने कहा है कि पार्टी का स्टैंड बिल्कुल स्पष्ट है। सभी चाहते थे कि राष्ट्र एक झंडे में एक संविधान के अंदर हो। उन्होंने कहा कि अब कॉमन सिविल कोड के विषय को सदन में आना चाहिए और वहां बहस कर फैसला लिया जाना चाहिए।
-एजेंसियां

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