तालिबान पर करीबी नजर: पीएम मोदी आज भी ले रहे हैं CCS की मीटिंग, कई बड़े चेहरे शामिल

नई दिल्‍ली। अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी भारत के लिए बड़ी चिंता की सबब है। भारत सरकार अफगानिस्तान के ताजा हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। वो वहां फंसे भारतीय नागरिकों के लिए समय-समय पर एडवाइजरी भी जारी कर रही है और उनकी जल्दी-से-जल्दी वापसी भी सुनिश्चित कर रही है।
साथ ही सरकार मौजूदा मुश्किलों और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के रास्तों पर मंथन कर रही है।
इसी क्रम में मंगलवार की बैठक के बाद बुधवार को भी सुरक्षा मामले पर मंत्रिमंडलीय समिति (CCS) की बैठक हुई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण समेत कई बड़े चेहरे शामिल हुए।
गौरतलब है कि भारत सरकार का मुखिया होने के नाते पीएम मोदी के कंधों पर देश को आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से निपटने की सबसे पहली जिम्मेदारी आती है। वो अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों के साथ-साथ विभिन्न एजेंसियों के प्रमुखों के साथ अफगानिस्तान के ताजा हालात के अनुकूल रणनीति में बदलाव करने या नई रणनीति बनाने का रास्ता चुनेंगे। वो अपनी पूरी टीम के सामने नई परिस्थिति के मुताबिक नया विजन पेश कर सकते हैं। सीसीएस के रूप में उनके पास देश के टॉप माइंड्स उपलब्ध हैं। पीएम अपने-अपने क्षेत्र के इन महारथियों को एक रास्ता दिखाते हैं ताकि अकाट्य रणनीति बनाई जा सके। पीएम मोदी पर हर किसी से इनपुट लेकर आखिर में अपना फैसला सुनाने की जिम्मेदारी है।
गुजरात कैडर के आईएएस प्रमोद कुमार मिश्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव हैं। उनकी काबिलियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पीएम मोदी के मन में उनके प्रति गुजरात में जगा भरोसा आज तक कायम है। ध्यान रहे कि पीके मिश्रा उस वक्त से मोदी के साथ हैं जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। मिश्रा ने गुजरात और केंद्र की सरकारों में कई अहम दायित्व संभाले हैं। प्रधान सचिव के तौर पर पीके मिश्रा प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रशासकीय प्रमुख होते हैं।
देश के रक्षा मंत्री के रूप में राजनाथ सिंह पर तालिबान की तरफ से पैदा हुए खतरों से निपटने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का तालिबान पर ठीक-ठाक नियंत्रण है, इसलिए पूरी आशंका है कि वो अपनी पहुंच और पकड़ का फायदा भारत के खिलाफ साजिश रचने की कोशिश करके उठाना चाहेगी। उधर, चीन ने भी तालिबान शासन को सबसे पहले मान्यता देकर उसे अपना मुरीद बना लिया है। ऐसे में तालिबान, पाकिस्तान और चीन की तिकड़ी की संभावित साजिशों को धता बताने के लिए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को कड़ी मशक्कत करनी होगी। सीसीएस के सदस्य के रूप में राजनाथ सिंह ने भी बेहद उच्चस्तरीय मीटिंग में हिस्सा लिया है।
भारत के ‘जेम्स बॉन्ड’ कहे जाने वाले अजित डोभाल वो शख्सियत हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर पाकिस्तान की सीमा में सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की रणनीति बनाई जिसे भारतीय सैनिकों ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल बतौर रॉ एजेंट पाकिस्तान में रह चुके हैं और पाकिस्तान की सरकार, वहां की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई की नब्ज समझते हैं। उन्हें पता है कि पाकिस्तान तालिबान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किस रूप में कर सकता है। डोभाल का सिद्धांत रहा है कि जहां से खतरा पैदा हुआ है, वहीं जाकर उसे खत्म कर दो। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के पीछे भी डोभाल ने इसी सिद्धांत को लागू किया था लेकिन तालिबान की बात कुछ और है। उसके कब्जे में एक पूरा देश आ चुका है और उसके शासन को अन्य देशों से धीरे-धीरे मान्यता मिलने लगी है। ऐसे में भारत को यह भी विचार करना होगा कि बदली हुई परिस्थितियों में भारत को तालिबान से कैसे निपटना चाहिए।
तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद भारत के अंदर भी उथल-पुथल मचने की आशंका जाहिर की जा रही है। भारत में मुस्लिमों की आबादी 22 करोड़ से भी ज्यादा है और ज्यादातर मुसलमान उसी देवबंदी परंपरा को मानते हैं जिसका अनुसरण तालिबान करता है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी के नेता शफिक-उर-रहमान बर्क हों या ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के सदस्य सज्जाद नोमानी, सभी तालिबान की काबुल फतह पर अपना सीना चौड़ा करते दिख रहे हैं। इस कारण देश के अंदर सामाजिक खाई बढ़ने ना पाए और यहां से तालिबान को अफगानिस्तान की सीमा तक ही समर्थन मिले, यह सुनिश्चित करने की बड़ी जिम्मेदारी बतौर गृह मंत्री अमित शाह की है। तालिबान समर्थकों के खिलाफ कार्यवाही और सामाजिक स्तर पर सद्भाव कायम रखने का संतुलित प्रयास ही भारत के सामने खड़े खतरे को कम या खत्म कर सकता है।
भारत सरकार में कैबिनेट सेक्रटरी का ओहदा काफी अहम होता है। कैबिनेट सेक्रटरी नौकरशाही का सर्वोच्च पद होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो चुनी गई सरकार का नियुक्त प्रतिरूप होता है मंत्रिमंडल सचिव। राजीव गौबा को यह पद एस. जयशंकर के विदेश मंत्री बनाए जाने के बाद दिया गया। बतौर कैबिनेट सेक्रटरी राजीव गौबा सीसीएस के फैसलों को जमीन पर उतारने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।
विदेश मंत्री के रूप में मोदी कैबिनेट की हिस्सा बनने से पहले जयशंकर विदेश सचिव, कैबिनेट सचिव और कई देशों में भारत के राजदूत की भूमिका निभा चुके हैं। मनमोहन सिंह सरकार के वक्त अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील में भी उनकी बड़ी भूमिका रही थी। जयशंकर चीन और अमेरिका के राजदूत भी रह चुके हैं। अफगानिस्तान में ग्रेट गेम के दूसरे अध्याय में चीन की भूमिका को देखते हुए जयशंकर का अनुभव काफी काम आने वाला है। बतौर विदेश मंत्री जयशंकर ने अब तक काफी सक्रियता दिखाई है। अफगानिस्तान में अचानक माहौल खराब होने के बाद भारतीय राजनयिकों और नागरिकों को वहां से निकालना मुश्किल हो रहा था तो जयशंकर ने तुरंत अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से संपर्क साध लिया और अमेरिकी सैनिकों ने काबुल एयरपोर्ट से भारतीयों के उड़ान भरने की व्यवस्था कर दी।
हर्षवर्धन श्रृंगला विदेश मंत्रालय से पहले अमेरिका में बतौर भारतीय राजदूत सेवा दे चुके हैं। काफी तेज-तर्रार माने जाने वाले भारतीय विदेश सेवा (IFS) के इस अधिकारी के पास अमेरिकी प्रशासन को करीब से परखने का भरपूर अनुभव है। चूंकि नए अफगानिस्तान को लेकर वैश्विक रणनीति में अमेरिका की प्रभावी भूमिका रहने वाली है, इसलिए भारत को भी इस सुपरपावर के साथ तालमेल बनाए रखना होगा। इस लिहाज से भी श्रृंगला अपना बड़ा योगदान दे सकते हैं। वैसे भी विदेश मंत्रालय के फैसलों को समय से जमीन पर उतारने का दारोमदार भी उन्हीं पर है।
-एजेंसियां

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