Civil society को मिली सफलता, जेवर एअरपोर्ट नहीं होगा ताज एअरपोर्ट

आगरा। Civil society की कानूनी लड़ाई को सफलता का ही नतीजा है कि जेवर में बनाये वाले एयरपोर्ट के लिये ‘ताज इंटरनेशनल एयरपोर्ट ‘ का नाम अब इस्‍तेमाल किया जाना अब बन्‍द हो गया है। दिल्‍ली में केन्‍द्र सरकार की क्‍लीयरैंस और उ प्र शासन की जैबर एयरपोर्ट प्रोजेक्‍ट को लेकर हुई नवीनतम बैठक में जैबर इंटरनेशनल एयरपोर्ट नाम का ही इस्‍तेमाल हुआ। जबकि पूर्व में बैठकों में ही नहीं पब्‍लिक प्‍लेटफार्मों तक से केन्‍द्रीय मंत्री जेबर के ग्रीनफील्‍ड प्रोजेक्‍ट को ताज इंटरनेशनल एयरपोर्ट नाम से ही संबोधित करते रहे थे। यही नही आगरा के राजनीतिज्ञ तथा ट्रेड लीडर्स तक जेबर एयपोर्ट प्रोजेक्‍ट को लेकर होने वाली चर्चाओं में ‘ताज इंटरनेशनल प्रोजेक्‍ट के हाथ से चले जाने की बात कहकर अफसोस जताते रहे थे।

यह करिश्‍मा एक दिन मे ही नहीं हुआ और न हीं इसके लिये किसी की नेक नीयति ही है, बल्‍कि इसके लिये सिविल सोसायटी आगरा के सोशल मीडिया, मल्‍टी मीडिया अभियान और उनके माध्‍यम से जनता का मुखरित सुर मुख्‍य कारण हैं।

यही नहीं इलहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की मुख्‍य न्‍यायधीश की अध्‍यक्षता वाली पीठ के समक्ष ‘जनहित याचिका ‘ के माध्‍यम से लडी जा रही वह कानूनी लडाई भी इसकी वजह है, जिसमें प्रदेश के एडवोकेट जनरल को जबाब देना है कि ताज महल आगरा में है, फिर क्‍यों उसके नाम पर 144 कि मी दूरी पर बनाये जाने वाले हवाई अडउे का नाम ‘ताज इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ रखा जा रहा है। यही नहीं इस जनहित याचिका के माध्‍यम से सिविल सोसायटी आगरा की ओर से यह भी जानने का प्रयास किया गया है कि जब जेबर में एयरपोर्ट नेशनल कैपीटल जोन की जरूरतों को पूरा करने के लिये बनाया बताया जा रहा है तो फिर ताजमहल का नाम क्‍यों घसीटा जा रहा है।

सिविल टर्मिनल आगरा के संबध में विचराधीन याचिका में जिन बिन्‍दुओं में सरकार को जबाब देना है उनमें विश्‍व वयापार संगठन ( डवूल टी ओ ) की वह अंतर्राट्रीय नीतिगत सहमति भी है जिसके तहत बौद्धिक और उत्‍पाद विशेष की स्‍थानीयता को खास महत्‍व दिया जाना स्‍वीकारा गया है, भारत इसके प्रति प्रतिबद्ध है। यही नहीं केन्‍द्र और राज्‍यों की सरकारें पेडा, बरफी , ताला , आदि न जाने किस किस के लिये स्‍थानीय महत्‍ता का कॅपेन चला रही है। वहीं दूसरी ओर इस ट्रीटी से आबद्धता का मामला कानूनी बाध्‍यता बनने की स्‍थति का होने के बाबजूद ताजमहल की लोकेशन को लेकर भ्रमित करने के कृत्‍य को अनदेखा किया जाता रहा । खैर जो भी हुआ ठीक ही हुआ । कम से कम ताजमहल की लोकेशन को लेकर ताजमहल देखने आने वाला टूरिस्‍ट महज भ्रम के कारण 144 कि मी दूर लैंड करने को बाध्‍य नहीं होगा वैसे अपनी मरजी से चाहे वह मुम्‍बई, पणजी, जयपुर या कलकत्‍ता कही भी उतरे और अपनी तरह से आगरा आये ( या न आये।) ।

विदेशियों तक ने ताजमहल की लोकेशन का महत्‍व नजर अंदाज नहीं किया

ताजमहल की लोकेशन की महत्‍ता को दूसरा विश्‍व युद्ध लडने आयीं मित्र देशों की एयरुोर्स भी नहीं कर सकी थी । 3डी एयरडिपो ग्रुप की यहां अवस्‍थापना थी। दसवीं एयरुोर्स के भाग के रूप में 10मार्च 1942 को यहां आयी और 6अप्रैल 1946 को आगरा में ही रही थी। इसके एम्‍बलमों में ताजमहल आंकित था।

रिपयर स्‍क्‍वार्डन यह 1942 से 1945 तक 3डी एयर डिपो गुप के भाग के रूप में तैनात रही।इसके एम्‍बलम में भी ताजमहल आंकित था। इसके अफसर और एयरमैन न तो टूरिस्‍ट थे और न हीं उनकी भारत के प्रति कोयी प्रतिबद्धता थी। वैसे भी भारत उस समय एक गुलाम देश था तथा ताजमहल को विश्‍वदाय स्‍मारक का दर्जा देने वाली यूनिस्‍को की मूल संस्‍था यू एन ओ का गठन दो साल बाद होना था।

(Emblem: Coat Of Arms Shield: Per fess nebuly or and azure, three billets in fess counter changed. Crest: On a wreath of the colors or and azure a representation of the Taj Mahal argent. Motto: That they shall fly again. Symbolism: The shield is gold and blue, the color of the Army Air Corps. The nebuly or horizontal division line is the heraldic symbol for clouds. The three billets are symbolic of the numerical designation of the organization. The crest refers to the service of the unit at Agra, India during World War-II.)

Civil society की पत्रकार वार्ता को संबोधित करने वालों में Civil society के सैकेट्री अनिल शर्मा व राजीव सक्सेना आदि शामिल थे।

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