Godar की सिनेमाई टिप्पणी है इमेज बुक

नई दिल्ली। Godar की फिल्म ‘इमेज बुक’ कला और सिनेमा की बेमिसाल जुगलबंदी है, जिसका दूसरा उदाहरण विश्व सिनेमा के इतिहास में नहीं मिलता। इसमें न कोई कहानी है न संवाद, न कोई अभिनेता। यह एक विलक्षण वीडियो आलेख है। वे दुनिया के अकेले फिल्मकार हैं, जिन पर सबसे ज्यादा लिखा गया है।

इकहत्तरवें कान फिल्म समारोह में फिल्म ‘इमेज बुक’ के लिए 88 साल के विश्व सिनेमा के मास्टर फिल्मकार ज्यां लुक गोदार को ‘स्पेशल पॉम डी ओर’ पुरस्कार से सम्मानित किया जाना विश्व सिनेमा के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है, क्योंकि पहली बार किसी को यह पुरस्कार दिया गया। तब जूरी की अध्यक्ष केट ब्लांशेट ने कहा था कि गोदार से फिल्मकारों की कई पीढ़ियां प्रभावित रही हैं।

Godar की फिल्म ‘इमेज बुक’ कला और सिनेमा की बेमिसाल जुगलबंदी है, जिसका दूसरा उदाहरण विश्व सिनेमा के इतिहास में नहीं मिलता। इसमें न कोई कहानी है न संवाद, न कोई अभिनेता. यह एक विलक्षण वीडियो आलेख है। कान के ग्रैंड थियेटर लूमियर में फिल्म के प्रदर्शन के दूसरे दिन उन्होंने अपने सिनेमैटोग्राफर फाबरिक अरानो के आइफोन पर प्रेस कांफ्रेंस में सवालों के जवाब दिये। कान के इतिहास में पहली बार ऐसी प्रेस कांफ्रेंस हुई।

गोदार 13 साल बाद प्रेस से मुखातिब हुए थे। गोदार ने घोषणा की- ‘जब तक उनके हाथ-पांव और आंखें सलामत हैं, वे फिल्में बनाते रहेंगे. यूरोप को रूस के बारे में नर्मी बरतनी चाहिए और अरब देशों के प्रति उदार नजरिया रखना चाहिए।’ उन्होंने सिनेमा के भविष्य के बारे में कहा कि ‘दस साल बाद सारे थियेटर मेरी फिल्में दिखायेंगे और गंभीर सिनेमा का लोकप्रिय दौर लौटेगा। सिनेमा की अपनी भाषा होती है. उसे किसी दूसरे के शब्दों की जरूरत नहीं।’ वे पिछले 70 सालों से सिनेमा में सक्रिय हैं और फ्रेंच न्यू वेव आंदोलन को शुरू करनेवालों में प्रमुख रहे हैं।

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े सदाबहार फिल्मकार गोदार हमेशा से हॉलीवुड और मुख्यधारा-सिनेमा के खिलाफ रहे हैं। वे दुनिया के अकेले फिल्मकार हैं, जिन पर सबसे ज्यादा लिखा गया है। उन्हें 2010 में लाइफटाइम अचीवमेंट का ऑनरेरी ऑस्कर सम्मान देने की घोषणा हुई, पर वे लेने नहीं गये। उन्होंने 1968 में छात्र आंदोलन के पक्ष में कान फिल्म समारोह को बंद करा दिया था। ‘इमेज बुक’ सिनेमा में उनकी इसी प्रतिरोधी चेतना की अभिव्यक्ति है और उनकी पिछली फिल्मों- सोशलिज्म (2010) और गुडबाय टू लैंग्वेज (2014)- का विस्तार है, जिनमें केवल दृश्यों के कोलाज हैं।

‘इमेज बुक’ में उन्होंने आज की दुनिया का दिल दहलानेवाला आईना दिखाया है। 50-60 के दशक की फिल्मों से लेकर न्यूजरील वीडियो तक, दुनियाभर में छपी खबरों के कोलाज और मानव सभ्यता पर मंडराते खतरों से जुड़े चित्र- ये सब हजारों कहानियां बयान कर रहे हैं। एक पूरा खंड उनके वीडियो महाकाव्य ‘सिनेमा का इतिहास’ से लिया गया है, जिसे बनाने में उन्होंने दस साल लगाये थे (1988-1998)। यह आज के संसार की क्लाईडोस्कोपिक यात्रा है, जो कई खंडों में चलती है- मसलन, वन रीमेक, सेंट पीटर्सबर्ग, अरब, युद्ध, औरतें, शब्द आदि। आइएसआइएस के वीडियो हैं, तो सामूहिक नरसंहार की क्लिपिंग भी। एक दृश्य में कुत्तों की तरह रेंगते नंगे स्त्री-पुरुष हैं (उत्तर कोरिया), तो औरतों की योनी में गोली मारते सैनिक हैं। एक जगह गोदार बताते हैं कि प्रेम के इजहार में सदियों से मर्द झूठ बोलते आ रहे हैं और यह कि हमारी सभ्यता तो साझा हत्याओं पर आधारित है।

कहानी के नाम पर वे एक कविता कहते हैं- ‘क्या आपको अभी तक याद है कि आपने अपने विचारों की ट्रेनिंग में कितनी उम्र लगा दी। अक्सर इसकी शुरुआत एक सपने से होती है. आश्चर्य होता है कि कैसे हमारे भीतर नीम अंधेरे में सघन रंग फूटते हैं। ये रंग धीमी नर्म आवाज में बड़ी बातें कह जाते हैं। इमेज और शब्द जैसे तूफानी रात में लिखे बुरे सपने, पश्चिम की नजर के नीचे एक खोया हुआ स्वर्ग। युद्ध यहां है?’ वे कहते हैं, ‘शब्द कभी भाषा नहीं हो सकते। जब भी हम खुद से बात करते हैं, तो किसी दूसरे के शब्द क्यों बोलने लगते हैं?’ इमेज बुक आज की दुनिया पर गोदार की एक बड़ी सिनेमाई टिप्पणी है।
– अजित राय, एनएसडी

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