चुनावी कविता: एक खेत में हुए इकट्ठे, साँप, नेवले, चूहे, मोर

एक खेत में हुए इकट्ठे,
साँप, नेवले, चूहे, मोर।
लोकतंत्र खतरे में है,
मचाते जोर जोर से शोर।।

कोई बनी “त्याग की देवी”,
जिसने “सत्ता का ज़हर” पिया।
दिल पर पत्थर रख “गेस्ट हाउस का
काण्ड” किसी ने माफ़ किया।।

माफ़ कीजिए.. कहते हैं वो,
लोकतंत्र के रक्षक हैं!
आपातकाल का दंश देश को,
देने वाले वो “तक्षक” हैं।।

मत समझो, वो झुके खड़े हैं,
आपके सत्कार में।
दर्द-ए-तशरीफ़ बयाँ कर दें,
आखिर कैसे दरबार में?

साभार: डी पी सिंह (फेसबुक)

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