दलाई लामा के बयान से चिढ़कर बोला चीन, नए लामा को मान्‍यता सरकार देगी

अगला लामा भारत से कोई हो सकता है। दलाई लामा के इस बयान पर चीन चिढ़ गया है। उसने कहा है कि नए लामा को उनकी सरकार से मान्यता लेनी होगी।
तिब्बत संकट के बीच दलाई लामा के एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। लामा की इस बात पर चीन को मिर्ची लग गई है कि उनका उत्तराधिकारी कोई भारतीय हो सकता है। भड़का चीन अब कह रहा है कि नए लामा को उनकी सरकार से मान्यता लेनी ही होगी। पूरे प्रकरण के बाद फिर चर्चा शुरू हो गई है कि मौजूदा लामा के बाद तिब्बत आंदोलन को कौन आगे बढ़ाएगा। चलिए इस मौके पर हम आपको 60 साल पुराने तिब्बत संकट से रूबरू करवाते हैं। साथ ही जानिए लामा चुके जाने की प्रक्रिया क्या होती है।
तिब्बती समुदाय के अनुसार लामा, ‘गुरु’ शब्द का मूल रूप ही है। एक ऐसा गुरु जो सभी का मार्गदर्शन करता है लेकिन यह गुरु कब और कैसे चुना जाएगा, इन नियमों का पालन आज भी किया जाता है।
तिब्बत संकट की शुरुआत होती है 1951 से। तब पहले से आजाद तिब्बत पर चीन ने हजारों सैनिकों को भेजकर कब्जा कर लिया था। चीनी कब्जे के बाद तेनजिन ग्यात्सो को 14वें दलाई लामा के तौर पर पद पर बैठाया गया। उन्हें 1937 में ही चुन लिया गया था। बता दें कि लामा चुने जाने की पूरी प्रक्रिया होती है। अगले लामा को खोजने में महीनों से सालों तक का वक्त लग सकता है। उस प्रक्रिया के बारे में आपको आगे बताएंगे। वापस लौटते हैं 1951 पर।
लामा से कहा, बिना गार्ड्स के अकेले आना
चीन का तिब्बत पर कब्जा होने से पहले से ही बौद्ध और चीन के बीच सब ठीक नहीं था। फिर दलाई लामा के सिंहासन पर विराजमान होने से चीन और परेशान हो गया। इस बीच चीन ने लामा को उनके यहां एक कार्यक्रम में आने का न्यौता दिया। साथ में कहा गया कि बिना किसी सुरक्षा गार्ड के आएं। इस पर तिब्बतियों को शंका होने लगी कि यह लामा को बंदी बनाने की चाल है। तब हजारों तिब्बतियों ने एकत्रित होकर लामा को वहां नहीं जाने दिया।
इसपर चीन और चिढ़ गया। फिर उसने गोलाबारी का आदेश दे दिया। चीनी सेना का मुख्य टारगेट लामा के किलो को गिराना था। तिब्बतियों की मानें तो कुछ दिन तक चले इस खूनी संघर्ष में चीनी आर्मी ने उनके हजारों लोगों को मार दिया था। तिब्बत में चीन द्वारा किए जा रहे अत्याचार से बाकी दुनिया बेखबर थी। पड़ोसी होने के नाते सिर्फ भारत की वहां राजनयिक पहुंच थी। इसी बीच मीडिया में भी अत्याचार से जुड़ी कुछ खबरें आई थीं।
सैनिक की वर्दी से दिया चकमा
तिब्बत में फैली अशांति के बीच 23 साल के लामा को छिपे-छिपे घूमना पड़ा। बताया जाता है कि लामा सैनिक की वर्दी पहनकर चीनी सैनिकों से बचकर भागने में कामयाब हुए थे। सबकुछ ठीक न होता देख लामा असम के रास्ते भारत आ गए। 31 मार्च 1951 को लामा भारत आए और पीएम जवाहर लाल नेहरू ने 3 अप्रैल को इसकी घोषणा कर दी। नेहरू ने लामा और उनके साथ आए लोगों को शरण देने के साथ हिमाचल के हिल स्टेशन धर्मशाला में रहने की इजाजत भी दी।
चीन मानता है खतरनाक अलगाववादी
धर्मशाला से दलाई लामा ने तिब्बत को आजाद करवाने के लिए पूरा कैंपेन चलाना शुरू कर दिया। इस बीच चीन और उनके बीच कई बार बातचीत के प्रयास हुए, लेकिन सब विफल। इसके बाद चीन ने लामा को खतरनाक अलगाववादी बताते हुए ब्लैकलिस्ट कर दिया। तब से अब तक विभिन्न जगहों पर तिब्बतियों द्वारा चीन द्वारा किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है।
दलाई लामा चुने जाने की प्रक्रिया
तिब्बती समुदाय के अनुसार लामा, ‘गुरु’ शब्द का मूल रूप है। एक ऐसा गुरु जो सभी का मार्गदर्शन करता है लेकिन यह गुरु कब और कैसे चुना जाएगा इसके अपने नियम हैं। वर्तमान में 14वें लामा गुरु के रूप में तेनजिन ग्यात्सो तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु हैं, वे निरंतर धर्म का प्रचार कर रहे हैं।
लामा गुरु अपने जीवनकाल के समाप्त होने से पहले तो कुछ ऐसे संकेत देते हैं जिनसे अगले लामा गुरु की खोज की जाती है। उनके शब्दों को समझते हुए उस नवजात की खोज की जाती है जिसे अगला लामा गुरु बनाया जाएगा।खोज की शुरुआत लामा के निधन के तुरंत बाद होती है। उन बच्चों की खोज की जाती है जिनकी जन्म लामा के देहांत के आसपास हुआ होता है। यह खोज कई बार दिनों में खत्म होने की बजाय सालों तक भी चलती है। तब तक किसी स्थाई विद्वान को लामा गुरु का काम संभालना होता है।
मौजूदा लामा द्वारा बताए गए लक्ष्ण एक से ज्यादा बच्चों में भी दिख सकते हैं। ऐसे में वक्त आने पर उनकी कठिन शारीरिक और मानसिक परीक्षाएं ली जाती हैं, जिसमें पूर्वलामा की व्यक्तिगत वस्तुओं की पहचान शामिल है।
कैसे चुना जाएगा यह अब तक साफ नहीं
पहले से निभाई जा रही परंपराओं को एक तरफ रख दें तो फिलहाल साफ नहीं है कि अगला लामा चुना कैसे जाएगा। दरअसल, चीन पुरानी किसी भी परंपरा को मानने से इंकार करता रहा है। वहीं मौजूदा लामा भी यह कह चुके हैं कि वह अपना उत्तराधिकारी अपने जीवनकाल में चुन सकते हैं या धर्मगुरुओं को यह काम सौंप सकते हैं।
अगर ऐसा हुए तो यह परंपरा से अलग होगा। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के मुताबिक, वर्तमान दलाई लामा पहले के दलाई लामाओं के ही अवतार हैं यानी कि उनका ही पुनर्जन्म हुआ है।
-एजेंसियां

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