चीन का पलटवार: कोरोना पर अमेरिकी लैब और वैज्ञानिकों को कठघरे में खड़ा किया, जांच की मांग

पिछले कई हफ्तों से चीन Ralph Baric की टीम और Fort Detrick Lab की जांच की मांग कर रहा है। चीन ने इस लैब पर वायरस लीक होने का आरोप लगाया है जहां इबोला, स्मॉलपॉक्स, SARS, MERS और कोरोना जैसे घातक वायरस रखे जाते हैं।
अमेरिका की साइंटिफिक जर्नल PNAS में अक्टूबर 2008 में वायरोलॉजिस्ट्स की एक टीम ने SARS जैसे कोरोना वायरस को बनाने की रिपोर्ट छापी।
चीन की शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक इस रिपोर्ट में नॉर्थ कैरलीना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राल्फ बैरिक ने लैब में इस वायरस को डिजाइन करने और पैदा करने की क्षमता का दावा किया। आज जब कोरोना वायरस की महामारी डेढ़ साल से दुनियाभर में कहर बरपा रही है, तो चीन ने अमेरिका की इस लैब और वैज्ञानिकों को कठघरे में खड़ा किया है।
दरअसल, दुनिया के कई देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने महामारी की शुरुआत से चीन पर वायरस फैलने और इसकी जानकारी दुनिया से छिपाने का आरोप लगाया है लेकिन अब चीन अमेरिका पर पलटवार करने में लगा है।
खुद दिया नहीं डेटा, अब जांच की मांग
चीन की ओर से पिछले कई हफ्तों में बैरिक की टीम और फोर्ट डेटरिक लैब की जांच की मांग की जा रही है। चीन ने इस लैब पर वायरस लीक होने का आरोप लगाया है जहां इबोला, स्मॉलपॉक्स, SARS, MERS और कोरोना जैसे घातक वायरस रखे जाते हैं। खुद अपना डेटा छिपाकर रखने वाले चीन के सरकारी मीडिया ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ-साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन से कहा है कि कोविड-19 फैलने में अमेरिका की इस लैब की भूमिका का सच भी सामने लाया जाए। चीन के प्रोपेगैंडा अखबार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक लाखों लोग ने ऑनलाइन याचिका साइन की है और जांच की मांग की है। अखबार का कहना है कि इसमें चीन के लोगों के साथ-साथ अब दुनियाभर के लोग शामिल हैं।
वायरस पर चल रही थी रिसर्च
पीपल्स डेली चाइना ने भी मांग की है कि अमेरिका WHO को अपने यहां जांच करने दे ताकि यह पता चले कि कोरोना वायरस रिसर्च में बना है या बन सकता है। अखबार का दावा है कि अमेरिका दुनिया में कोरोना वायरस स्टडी सबसे ज्यादा प्रैक्टिस और स्पॉन्सर किया जाता है। इसमें बारिक की टीम को मुख्य बताया गया है जो वायरस को मॉडिफाई कर सकती है और बना सकती है। शिन्हुआ के मुताबिक 1983 से बारिक ने 400 पेपर छापे हैं और इनमें से 268 पेपर कोरोना वायरस पर हैं। चीन का कहना है कि बारिक की रिसर्च और डेटरिक लैब के कारण ही सबसे पहले वायरस से इन्फेक्शन के केस सामने आए थे।
बंद क्यों किया लैब का काम?
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने अमेरिका से जुलाई 2019 में विस्कॉनसिन में फेफड़ों से जुड़ी बीमारी और सर्दियों में फ्लू के मरीजों पर डेटा जारी करने की मांग की है। झाओ का कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि इनमें से कितने लोगों को असल में कोविड-19 था। ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक उसी साल अमेरिका के CDC ने डेटरिक लैब से काम बंद करने को कहा था। झाओ ने मांग की है कि 2019 में वुहान मिलिट्री वर्ल्ड गेम्स में आए सैनिकों का डेटा भी जारी किया जाए। झाओ का आरोप है कि ऐसे रिसर्च में अमेरिका सबसे ज्यादा फंड करता है और अब वुहान लैब से वायरस लीक होने की कहानी गढ़ रहा है। इसके लिए वैज्ञानिकों पर दबाव डाल रहा है और मुखर वैज्ञानिकों को धमका रहा है जो ‘आतंकवाद’ है।
-एजेंसियां

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