छत्तीसगढ़ की हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति का इस्‍तीफा

रायपुर। छत्तीसगढ़ की हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. सुखपाल सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
लॉ यूनिवर्सिटी के आठ सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने कुलपति के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाते हुए उनपर ‘अविश्वास’ जताया था और पिछले सात दिनों से छात्र-छात्राएं आंदोलन कर रहे थे.
इन आंदोलनकारियों ने सोमवार से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरु कर दी थी. इसके बाद सोमवार की शाम को ही कुलपति के इस्तीफ़े की बात सामने आई.
डॉ. सुखपाल सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “इतने अपमान के बाद इस पद पर रहने का कोई मतलब नहीं है इसलिए मैंने यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफ़ा दे दिया है.”
क्यों हो रहा था विरोध
डॉ. सुखपाल सिंह को 5 मार्च 2011 को रायपुर के हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त किया गया था. ये नियुक्ति पांच साल या 65 वर्ष तक की आयु के लिए की गई थी.
इसके बाद 6 सितंबर 2014 को नियम में बदलाव कर उनकी सेवा अवधि में विस्तार कर दिया गया. नए नियम के तहत ये नियुक्ति पांच साल या 70 वर्ष तक की आयु के लिए की गई थी.
इसे सेवावृद्धि के ख़िलाफ़ यूनिवर्सिटी के ही सहायक प्राध्यापक डॉ. अविनाश सामल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसे हाईकोर्ट की एकल पीठ ने तो खारिज कर दिया लेकिन इसी साल 27 अगस्त को हाईकोर्ट की युगल पीठ ने डॉ. सुखपाल सिंह की सेवावृद्धि के आदेश को रद्द कर दिया.
इस बीच 27 अगस्त से ही यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्राओं की यौन प्रताड़ना और आर्थिक भ्रष्टाचार समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर अनिश्चितकालीन प्रदर्शन शुरू कर दिया.
पिंजरा तोड़ो अभियान
‘पिंजरा तोड़ो’ नाम से शुरू किए गए इस आंदोलन में इन विद्यार्थियों की मांग थी कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों को 24 घंटे कैंपस के भीतर कहीं भी आने-जाने की छूट मिले. इसके अलावा यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी भी 24 घंटे खुली रखी जाए. साथ ही यूनिवर्सिटी की कार्य परिषद की बैठकों की कार्रवाई सार्वजनिक की जाए.
इस दौरान 60 से अधिक लड़कियों ने अपने साथ यौन प्रताड़ना की शिकायत करते हुए मांग की कि जिन शिक्षकों पर आरोप लगे हैं, उन्हें जांच पूरी होने तक निलंबित रखा जाए.
इस आंदोलन को देश भर से समर्थन मिला और दस दिनों तक चले आंदोलन के बाद अंततः प्रभारी कुलपति रविशंकर शर्मा ने इन मांगों पर कार्रवाई भी शुरू की. रात तीन बजे तक यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी और रात सवा तीन बजे तक हॉस्टल खुले रखने की शुरुआत भी कर दी गई.
यौन प्रताड़ना, आर्थिक भ्रष्टाचार, बजट, कार्य परिषद के फ़ैसले जैसे कई मुद्दों पर यूनिवर्सिटी ने तत्काल जांच और कार्यवाही के निर्देश दिए.
कुछ मामलों में जांच के लिए कमेटी भी बनाई गई.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
इन प्रदर्शन और कार्रवाइयों के बीच ही 20 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सुखपाल सिंह की सेवावृद्धि को रद्द करने के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी.
24 सितंबर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुलाधिपति ने फिर से डॉ. सुखपाल सिंह की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया. लेकिन अगले दिन जब डॉ. सुखपाल सिंह यूनिवर्सिटी पहुंचे तो विद्यार्थियों ने फिर से उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.
स्टूडेंट्स बार एसोसिएशन के आकांश जैन कहते हैं, “डॉ. सुखपाल सिंह ने अपने कार्यकाल में लगातार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, सारी शिकायतों की अनसुनी की, लड़कियों के साथ यौन प्रताड़ना को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आख़िर उनके रहते हम यूनिवर्सिटी में बेहतर शैक्षणिक वातावरण की कल्पना भी कैसे कर सकते थे?”
25 सितंबर को आंदोलनकारी छात्रों ने कुलपति के ख़िलाफ़ 800 हस्ताक्षरों के साथ उन्हें ‘अविश्वास प्रस्ताव’ सौंपा और 48 घंटों के भीतर कुलपति पद से इस्तीफ़ा देने की मांग की. इसके बाद छात्रों ने 28 सितंबर को कुलपति के तौर पर डॉ. सुखपाल सिंह को मान्यता देने से इनकार करते हुए, कुलपति को ही एक और पत्र सौंपा.
इसके बाद शाम होते-होते कुलपति डॉ. सुखपाल सिंह के इस्तीफ़े की ख़बर आ गई.
स्टूडेंट्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष स्नेहल रंजन शुक्ला कहते हैं, “तमाम तरह के गंभीर आरोपों से घिरे कुलपति के ख़िलाफ़ हमारे पास भूख हड़ताल अंतिम रास्ता था, हमने तय किया था कि भूख हड़ताल तब तक जारी रहेगी, जब तक कुलपति इस्तीफ़ा नहीं दे देते. आज हमारी लॉ यूनिवर्सिटी आज़ाद हो गई है. ”
-BBC

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