चार कविताऐं: सिम्त जज़्बातों को कभी न कभी बगावत मिलनी चाहिए

किसी की भी निगाह में मैं अब खुदा नहीं रहा
अब तो मुझे भी गुनाह की इजाज़त मिलनी चाहिए

उम्र की दहलीज पर वो अब भी एक बच्ची है
उसकी हरकतों को कुछ नई सी शरारत मिलनी चाहिए

आवाम कब तक यूँ ही कठपुतली सी तमाशा देखेगी
सिम्त जज़्बातों को कभी न कभी बगावत मिलनी चाहिए

बहुत देर पोशीदा रही मेरे ख़्वाबों की रंगीन ताबीरें
मेरी निगाहों को भी तस्वीरे-हुश्न कयामत मिलनी चाहिए

तुम्हारे हाथों में सौप दी हैं हम सबने अपनी तकदीरें
हर हाल में हमें मुल्क की सूरत सलामत मिलनी चाहिए

मसला क्यों न कोई भी हो मंदिर या मस्जिद का
इंसानों के दिल में हर घड़ी ज़िन्दा मोहब्बत मिलनी चाहिए

2………………………

उसने चूड़ी,बिंदी,कंगन,जेवर,पाजेब सब पहन लिए
और फिर बेपर्दा महफ़िल में आ गयी , गज़ब किया

सत्ता,मद,अहंकार, विलासिता सब तुमको माफ़ है
तुम ने सर से कफ़न तक माँग लिया, गज़ब किया

माँ रोती रही और बाप बेहोश हो गया विदाई पर
और बेटा फिर भी लौट कर नहीं आया,गज़ब किया

पुराने खत, कुछ वक़्त और महकते फूल ज़िंदा हैं
पर उसने मेरा ही क़त्ल सरेआम किया,गज़ब किया

जश्न में बहुत शोर था, बहुत जोर था तुम्हारे नाम का
पर तुमने फिर भी मेरा ही शेर सुनाया , गज़ब किया

3………………..

मैं धर्म की दलील देकर इन्सान को झुठला नहीं सकता
मुझको तमीज है मजहब की भी और इंसानियत की भी

ज़मीर भी गर बिकता है तो अब बेच आना प्रजातंत्र का
मुझको समझ है सरकार की भी और व्यापार की भी

जो मेरा है मुझे वही चाहिए ना कि तुम्हारी कोई भीख
मुझे फर्क पता है उपकार की भी और अधिकार की भी

वोटों की बिसात पर प्यादों के जैसे इंसां ना उछाले जाएँ
मुझको मालूम है परिभाषा स्वीकार और तिरस्कार की भी

अपने दिल को पालो ऐसे की खून की जगह ख़ुशी बहे
उसमें हो थोड़ी जगह मंदिर की भी और मज़ार की भी

4…………………..

मुझको मुझसे ही मिले इक ज़माना हो गया
अपनी पहचान भी अब तो फसाना हो गया

जो वक़्त पसंद थे मेरी तबियत और मिज़ाज़ को
वो हर लम्हा,बीते लम्हों के साथ पुराना हो गया

कमाता कम था फिर भी कितना शुकून था मुझे
बेशरम ख्वाहिशों का ख्वामखाह निशाना हो गया

नींद कम आती है और वो भी किश्तों में ही
ख़्वाबों का भी बन्द मुझमें आना-जाना हो गया

क्यों और कैसे करूँ किसी और से मैं शिकायत
शौक मेरी ज़ुबाँ को जब दर्द का तराना हो गया.

salil-saroj
salil-saroj

 

-सलिल सरोज

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