मात्र 3 कहानियां लिखकर कथा साहित्य में अमर हो गए गुलेरी

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ऐसे अकेले कथा लेखक थे जिन्होंने मात्र 3 कहानियां लिखकर कथा साहित्य को नई दिशा और आयाम प्रदान किये । गुलेरी जी की ‘उसने कहा था’ कहानी आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में । अगर गुलेरी जी का नाम हटाकर इसे आज भी किसी पत्र-पत्रिका में छाप दिया जाए तो आज की परिवर्तित कहानी की टेकनीक में सहज फिट हो जाएगी । यही इस कहानी की अमरता का एक खास गुण है ।

‘सुखमय जीवन’ व ‘बुद्धू का काँटा’ और ‘उसने कहा था’ के अतिरिक्त नए शोधकार्यों के प्रकाश में आने के फलस्वरूप वे एक उत्कृष्ट कोटि के निबंध लेखक, प्रखर समा लोचक, उद्भट भाषाशास्त्री, निर्भीक पत्रकार एवं सफल कवि सिद्ध होते हैं । यह स्वयं में चौंकाने वाला विषय है कि आजकल कई विद्वान गुलेरी जी के कतिपय निबंधों को कहानियों का नाम देकर उन्हें पत्र-पत्रिकाओं में छापकर गुलेरी जी को नहीं स्वयं स्थापित होने का दंभ भर रहे हैं जो अच्छा नहीं है ।

अपने ऐसे कथात्मक पुट के लिए निबंधों को गुलेरी जी ने कभी कहीं भी कहानी नहीं कहा है । उन्होंने अपने समय में उन्हें निबंध विधा में रखकर छापा है, टिप्पणियों के रूप में लिखा है । यही नहीं गुलेरी जी की कहानी ‘बुद्धू का काँटा’ को पनघट नाम देकर व्यर्थ उछाला गया । यहीं इस प्रक्रिया व नाटक का अंत नहीं हुआ और ‘उसने कहा था’ कहानी के रफ ड्राफ्ट कुछ अंश को ‘हीरे का हीरा’ को नई कहानी तथा ‘धर्मपरायण रीछ’ को कहानी की संज्ञा देकर इधर-उधर छपवा डाला गया ।

गुलेरी जी के पूर्वज मूलतः गुलेर जिला कांगड़ा से थे । इनके पिता पंडित शिवराम आजीविका से बंधे जयपुर चले गए । शिवराम शास्त्री जी के यहाँ गुलेरी जी का जन्म 7 जुलाई, 1883 ई. को हुआ था । अपनी माता श्रीमती लक्ष्मी के प्रति गुलेरी जी सदैव श्रद्धावनत रहे । गुलेरी जी का संस्कृत, पाली, प्राकृत, हिंदी, बांग्ला, अंगरेज़ी, लैटिन और फ्रैंच आदि भाषाओं पर अच्छा खासा तथा एक समान अधिकार था । जब गुलेरी जी दस वर्ष के ही थे कि इन्होंने एक बार संस्कृत में भाषण देकर भारत धर्म महामंडल के विद्वानों को आश्चर्य चकित कर दिया था । पंडित कीर्तिधर शर्मा गुलेरी का यहाँ तक कहना था कि वे पाँच वर्ष में अंगरेज़ी की टैलीग्राम अच्छी तरह पढ़ लेते थे । इन्होंने सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की । बी.ए. की परीक्षा में सर्वप्रथम रहे । सन् 1904 ई. में गुलेरी जी मेयो कॉलेज अजमेर में अध्यापकी करने लगे । अध्यापक के रूप में उनका बड़ा मान-सम्मान था । अपने शिष्यों में वे लोकप्रिय तो थे ही इसके साथ अनुशासन और नियमों का वे सख्ती से अनुपालन करते थे । उनकी आसाधारण योग्यता से प्रभावित होकर पंडित मदनमोहन मालवीय ने उन्हें बनारस बुला भेजा और हिंदु विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद दिलाया ।

जयपुर के राजपण्डित के कुल में जन्म लेनेवाले गुलेरी जी का राजवंशों से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा। वे पहले खेतड़ी नरेश जयसिंह के और फिर जयपुर राज्य के सामन्त-पुत्रों के अजमेर के मेयो कॉलेज में अध्ययन के दौरान उनके अभिभावक रहे। सन् 1916 में उन्होंने मेयो कॉलेज में ही संस्कृत विभाग के अध्यक्ष का पद सँभाला। सन् 1920 में पं॰ मदन मोहन मालवीय के प्रबंध आग्रह के कारण उन्होंने बनारस आकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्यविद्या विभाग के प्राचार्य और फिर 1922 में प्राचीन इतिहास और धर्म से सम्बद्ध मनीन्द्र चन्द्र नन्दी पीठ के प्रोफेसर का कार्यभार भी ग्रहण किया।

इस बीच परिवार में अनेक दुखद घटनाओं के आघात भी उन्हें झेलने पड़े। सन् 1922 में 12 सितम्बर को पीलिया के बाद तेज ज्वर से मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में उनका देहावसान हो गया।

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