Karl Marx की दो सौ वीं जयंती पर बदलाव का आव्‍हान

Karl Marx का जन्म 5 मई सन् 1818 को जर्मनी में हुआ और मृत्यु 14 मार्च सन् 1883 को इंग्लैन्ड में हुई।

कार्ल मार्क्स ने पूरी ज़िंदगी मानव समाज के इतिहास, संस्कृति, राजनीति और अर्थशास्त्र जैसे विषयों का गहन अध्ययन किया और यह बताया कि-

१) मानव समाज का विकास भी कुछ वैसे ही वैज्ञानिक नियमों के आधार पर होता है जैसे नियम दुनिया की अन्य तमाम कुदरती प्रक्रियाओं में समझने को मिलते हैं, जैसे- बीज से पेड़ बनने की प्रक्रिया, पानी से भाप बनने की प्रक्रिया आदि।

२) अपनी खोज और सिद्धांतों के पक्ष में कार्ल मार्क्स ने मानव सभ्यता के विकास के तमाम चरणों तक पहुँचने और आगे बढ़ने की प्रक्रिया को ऐतिहासिक उदाहरणों से सिद्ध किया।

३) उन्होंने बताया कि मानव समाज एक लंबे समय तक बहुत धीमी गति से, मगर लगातार बदलता रहता है (इस प्रक्रिया को evolution कहते हैं) और फिर एक खास स्तर पर पहुँच कर बेहद कम समय में बेहद तेज़ी से इतने बड़े राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक बदलाव होते हैं कि लोगों का जीवन जीने का तरीका और खुद के व समाज के प्रति नज़रिया बिल्कुल ही बदल जाता है (इस प्रक्रिया को revolution यानि क्रांति कहा जाता है)।

४) मार्क्स ने बताया कि क्रांति के बाद का समाज हमेशा ही कई मायनों में पहले के समाज से कई गुना उन्नत और विकसित होता है।

५) उन्होंने बताया कि कैसे मनुष्य पहले कबीलाई समाज बना कर रहता था (जिसे आदिम साम्यवादी युग कहा जाता है), फिर दास युग आया, फिर सामंती समाज बना, फिर पूँजीवाद आ गया और आगे के चरणों में समाजवाद और फिर साम्यवाद का दौर होगा।

६) समाजवाद को मार्क्स ने एक ऐसी व्यवस्था के तौर पर समझाया कि जिसमें निजी सम्पत्ति की ताकत के बूते अपना दबदबा बनाना किसी के लिए भी लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि संपत्ति पर निजी मालिकाने को लगभग समाप्त कर दिया जाता है और संसाधनों व तकनीक के सार्वजनीकरण के ज़रिए समाज के हर सदस्य के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, इलाज और न्याय जैसी सभी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सहित तकनीक की पहुँच भी समान रुप से संभव बनाई जाती है। समाजवादी व्यवस्था में हर मनुष्य को उसकी मेहनत का पूरा मेहनताना मिलता है।

७) साम्यवाद को कार्ल मार्क्स ने एक ऐसी व्यवस्था के बतौर समझाया कि जो पूरे विश्व को एक परिवार बना देगी और तब देशों के बीच न बॉर्डर रहेंगे, न फौज, न युद्ध। कि जब हर व्यक्ति को उसकी ज़रुरत के हिसाब से चीज़ें उपलब्ध हो सकेंगी, कि जब पूरी दुनिया के लोग एक साथ शांति से रह कर पूरी मानव जाति के हित में काम करेंगे।

कार्ल मार्क्स ने यह भी बताया कि क्रांति की परिस्थितियाँ यूँ ही बैठे-बिठाए नहीं बनतीं बल्कि किसी भी व्यवस्था के तहत जिन लोगों का शोषण सबसे ज़्यादा होता है, वे ही आखिरकार एकजुट हो कर और बदलाव की अभूतपूर्व चेतना से लैस हो कर शोषण के खिलाफ ऐसा युद्ध छेड़ देते हैं जिसके परिणामस्वरुप क्रांति संभव हो कर मानव समाज के विकास का अगला चरण शुरु होता है।

इसीलिए मार्क्स ने पूँजीवादी व्यवस्था में शोषण की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे औद्योगिक मज़दूरों की चेतना को न केवल दर्जनों किताबों, सैंकड़ों लेखों व वक्तव्यों के ज़रिए जाग्रत किया बल्कि मज़दूरों का अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

हालाँकि घोर गरीबी और अथक मेहनत के कारण उन का देहांत महज़ 65 वर्ष की उम्र में ही हो गया, मगर पहले 1871 में पेरिस में शोषित-पीढ़ित जनता ने सत्ता का तख्ता पलट कर 72 दिन तक चले “पेरिस कम्यून” नामक समाजवादी प्रयोग से यह साबित किया कि मार्क्स के सिद्धांतों के अनुसार मानव समाज सदियों से चल रही शोषण की परंपरा से मुक्ति पा सकता है और फिर 1917 में रुस के मजदूरों ने समाजवादी व्यवस्था को वास्तविकता में उतार कर करीब सत्तर साल तक दुनिया में अपना परचम लहरा कर उन आलोचकों का मुँह बंद किया जो कहते थे कि मार्क्स के सिद्धांत कोरे किताबी हैं और व्यवहारिक नहीं हैं!

इसके बाद चीन और क्यूबा सहित दुनिया के तमाम हिस्सों में बड़ी तेज़ी से क्रांतिकारी बदलाव होने लगे और एक समय ऐसा आया जब आधी से ज़्यादा धरती कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों को अपना कर शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए छोटी-बड़ी सफलताएँ हासिल करने लगी।

कार्ल मार्क्स ने बताया था क्रांति के ज़रिए समाजवाद और साम्यवाद के रास्ते पर चलने के लिए एक क्रांतिकारी पार्टी की ज़रुरत होती है। इस पार्टी को कार्ल मार्क्स ने नाम दिया “कम्युनिस्ट पार्टी”! समय के साथ-साथ पूरी दुनिया के लगभग हर देश में एक या एक से अधिक कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हुई और कई देशों में उनकी सरकार बनी।

मार्क्सवादी सिद्धांतों पर चलने वाले लोग हमेशा सामूहिक विकास, मानवता, समानता व स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत रहते हैं मगर इसके ठीक उलट इस दुनिया में जो लोग अब तक सदियों से ताकत में रहे हैं, जो दूसरों का माल मार कर आराम से रहना चाहते हैं, जो मज़दूरों की मेहनत को लूट कर अय्याशी करते रहना चाहते हैं या जो अपने मालिकों की बात को ही सच मान कर गुलामी में लगे रहते हैं, वे मार्क्सवाद और कम्युनिस्टों को अपना दुश्मन मानते हैं।

ऐसे ही अय्याश और शोषणकारी राजा-महाराजाओं, बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक पूँजीपतियों, धर्म की आड़ में अरबों-खरबों का धंधा करने वाले पादरियो-पंडितों-मुल्लों आदि ने पूरी ताकत लगा कर सोवियत रुस का विघटन करवाया और फिर पूरी दुनिया में चल रहे कम्युनिस्ट आंदोलनों को कमज़ोर करने का काम किया।

मगर, जैसा कि कार्ल मार्क्स ने बताया था कि एक तरफ तो संपत्ति के बड़े-बड़े मालिकों के बीच लंबे समय तक एकता नहीं रह सकती क्योंकि निजी मुनाफ़ा कमाने की होड़ में वे एक-दूसरे के विरोधी बनते रहते हैं। और दूसरी तरफ, समानता और स्वतंत्रता के दीवाने मज़दूर और उनके साथी भी ज़्यादा समय तक कारखानों और दफ़्तरों में चुपचाप ज़ुल्म सहते हुए काम नहीं कर सकते क्योंकि पूँजीपतियों का लालच उनकी दिन की नींद और रातों का चैन छीनता रहता है, इसलिए मज़दूरों और मालिकों के बीच, शोषकों और शोषितों के बीच संघर्ष लगातार नए-नए रुप ले कर तीखा होता ही रहता है और इसीलिए क्रांति हर हाल में हो कर ही रहती है।

तो भले ही मार्क्सवाद के आलोचक और कम्युनिस्टों के विरोधी कितने ही दावे कर लें कि मार्क्सवाद फेल हो गया और कम्युनिस्ट पूरी दुनिया में से खत्म हो गए, मगर एक तरफ तो चीन, क्यूबा, लाओस, उत्तरी कोरिया, और वियतनाम में आज भी कम्युनिस्ट पार्टियों की सत्ता है; भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बाँग्लादेश, श्रीलंका, अमेरिका, इंग्लैन्ड, स्पेन, रुस, पुर्तगाल, फिलीपीन्स, नीदरलैन्ड, नामीबिया, ईराक, ईरान, जर्मनी, फ्राँस, ऑस्ट्रेलिया, इक्वाडोर, ग्रीस, पुर्तगाल, साउथ अफ्रीका, सीरिया और वेनेजुएला सहित करीब सौ से भी अधिक देशों में सैंकड़ों कम्युनिस्ट पार्टियों के करोड़ों सदस्य व समर्थक बदली हुई दुनिया में और भी बेहतर रुप में समाजवादी क्रांति की अपनी मंज़िल की तरफ लगातार बढ़ रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर पूँजीवादी व्यवस्था बार-बार आर्थिक मंदी के जाल में उलझती चली जा रही है और इस मंदी से उबरने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियाँ और उनकी सरकारें सरकारी भर्तियों में कटौती कर, कर्मचारियों की तनख्वाह कम कर, उनके काम के घंटे बढ़ा कर, मँहगाई बढ़ा कर, टैक्स का बोझ लाद कर और नोटबंदी जैसे अजीब-अजीब उपाय अपना कर जनता की जेब लूट रही हैं और उनका जीना मुश्किल कर रही हैं।

कार्ल मार्क्स की दो सौ वीं जयंती पर हम इस संसार में इस समय चल रही हलचलों को देख कर यह सहज ही समझ सकते हैं कि मार्क्स के सिद्धांत सही साबित हो रहे हैं और हमारे आसपास हमें मानव समाज के अगले चरण पर पहुँचाने वाली क्रांति की आहट साफ सुनाई पड़ रही है।

आइए हम सब मिल कर इस बदलाव की तैयारियों में जुट जाएँ!

– सौरभ इंसान

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