केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, वैक्सीन पॉलिसी न्यायसंगत है इसलिए इसमें दखल की कोई जरूरत नहीं

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्र से वैक्सीन पॉलिसी को लेकर दोबारा विचार करने को कहा गया था जिस पर अब सरकार ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि वैक्सीन पॉलिसी न्यायसंगत है और इसमें उच्चतम न्यायालय के दखल की कोई जरूरत नहीं है।
वैक्सीन पॉलिसी को लेकर कही ये बात
केंद्र सरकार ने अपनी वैक्सीनेशन पॉलिसी का बचाव करते हुए कहा है कि बड़े जनहित में ये फैसला कार्यपालिका पर छोड़ दें। इसमें किसी प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। केंद्र की ओर से यह भी कहा गया है कि एक्सपर्ट और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही वैक्सीन पॉलिसी बनाई गई है। केंद्र सरकार ने कहा है कि जो नीति बनाई गई है वो संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के जनादेश के अनुरूप ही है। काफी विचार विमर्श के बाद वैक्सीन की पॉलिसी तैयार की गई है। विश्वास कीजिए हम पर इस पर कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
जवाब में कहा गया है कि इस समय कोरोना वैक्सीनेशन का काम चल रहा है। सरकार का फोकस वैक्सीन के प्रोडक्शन और इसकी उपलब्धता को लेकर है। केंद्र सरकार की ओर इसकी कीमत को लेकर कहा गया है कि वैक्सीन उत्पादकों से बात करने के बाद ही कीमत तय की गई है। राज्य सरकारों को समान दर पर वैक्सीन मिलेगी।
ऑर्टिकल 21 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
पिछले दिनों सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वो अपनी वैक्सीन नीति पर फिर से विचार करे। कोर्ट ने कहा था कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि इससे संविधान के आर्टिकल 21 के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार को क्षति पहुंचती है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया था कि कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच वैक्सीनेशन बहुत जरूरी है। वैक्सीन के दाम को लेकर केंद्र सरकार क्या कर रही है। यह आपातकाल नहीं तो क्या है। कोर्ट में सुनवाई के दौरान राजस्थान, बंगाल की ओर वैक्सीन के अलग- अलग दाम पर आपत्ति जताई गई थी जिस पर कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि दाम अलग-अलग क्यों है।
पिछले दिनों दिल्ली हाई कोर्ट ने भी आर्टिकल 21 का हवाला देते हुए कहा था कि दिल्ली को लोग जो कोरोना संक्रमित हैं उन्हें इलाज की सुविधाएं दिल्ली सरकार मुहैया कराए। संविधान का आर्टिकल 21 लोगों को जीने का अधिकार देता है जिससे हर व्यक्ति आजादी से जी सके।
यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक को जीवन जीने और उसकी निजी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है। इसमें कोई अन्य व्यक्ति या संस्था किसी व्यक्ति के इस अधिकार का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो पीड़ित व्यक्ति को सीधे सुप्रीम कोर्ट तक जाने का अधिकार होता है। इस आर्टिकल के अन्तर्गत स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य की सावधानी का अधिकार वैसा ही होता है जैसे जीवन जीने का अधिकार।
-एजेंसियां

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