क्‍या आप बता सकते हैं कि पांच हजार साल बाद भी क्‍यों कायम है यह ”यक्ष प्रश्‍न” ?

महाभारत के अनुसार यक्ष द्वारा पांडवों से पूछे गए प्रश्‍नों में अंतिम प्रश्‍न था-
दिने दिने हि भूतानि प्रविशन्ति यमालयम्।
शेषास्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।
अर्थात : प्रतिदिन ही अनेक प्राणियों को यम के घर जाते हुए देखकर भी शेष प्राणी अनन्त काल तक पृथ्‍वी पर रहने की इच्छा करते हैं। क्या इससे बड़ा कोई आश्चर्य है?
इस प्रश्‍न का उत्तर न दे पाने के कारण पांच पांडवों में से चार यानि भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव काल के गाल में समा गए किंतु जब उन्‍हें ढूंढ़ने पहुंचे पांचवें और सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्‍ठिर से यक्ष ने यही प्रश्‍न दोहराया तो युधिष्‍ठिर का उत्तर था-
हे यक्ष, आपके प्रश्‍न का उत्तर तो प्रश्‍न में ही निहित है।
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
अर्थात: प्रतिदिन ही अनेक प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, शेष प्राणी अनन्त काल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है!
सर्वविदित है कि धर्मराज युधिष्‍ठिर के उत्तर से प्रसन्‍न होकर यक्ष ने न केवल चारों मृत पांडवों को पुनर्जीवित किया बल्‍कि उन्‍हें सरोवर का जल पीने की अनुमति भी प्रदान की।
यक्ष द्वारा पांडवों से पूछे गए यह प्रश्‍न ही ”यक्ष प्रश्‍न” कहलाते हैं और अब वह एक कहावत का रूप ले चुके हैं। आधुनिक युग में भी जब कोई ऐसी समस्या सामने होती है जिसका समाधान नहीं होता तो उसे यक्ष-प्रश्‍न की संज्ञा दे दी जाती है।
हजारों साल बीत गए, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, चिठ्ठी भेजकर अपनों की कुशल-क्षेम लेने वाले लोगों को भी सोशल मीडिया ने हाईटेक बना डाला। फेसबुक, टि्वटर जैसे माध्‍यमों पर तो जैसे ”ज्ञान की गंगा” बह निकली।
चौबीसों घंटे इनके माध्‍यम से वांछित और अवांछित ज्ञान परोसा जाने लगा किंतु यक्ष का अंतिम प्रश्‍न आज भी कायम है।
कल फिरोजाबाद के सिरसागंज में एक हादसे ने 11 लोगों की जान पलक झपकते ले ली। देशभर में हर रोज अनगिनत सड़क हादसे होते हैं और उनमें इतने लोग जान गंवा देते हैं जितने कि दूसरे अन्‍य सभी कारणों को मिलाकर भी नहीं गंवाते। अनगिनत लोग जिंदगीभर के लिए अपाहिज होकर अपने परिजनों पर बोझ बन जाते हैं, बावजूद इसके कोई सुधरने को तैयार नहीं। या यूं कहें कि किसी को मौत अथवा मौत से भी बदतर जिंदगी हो जाने का डर नहीं। जैसे हर व्‍यक्‍ति जान देने और जान लेने पर आमादा है।
दुपहिया वाहनों पर तीन से कम लोगों का चलना तो गुजरे जमाने की बात बन ही चुकी है, अब तो दो पहियों पर चार और पांच-पांच लोग तक मौत को दावत देते देखे जा सकते हैं। इनमें औरतें, बच्‍चे, बूढ़े सब शामिल होते हैं किंतु किसी को किसी की चिंता नहीं।
तीन सवारियां बैठाने के लिए अधिकृत थ्री व्‍हीलर में सात-आठ सवारियों का लदा होना किसी को आश्‍चर्यचकित नहीं करता क्‍योंकि यह आम बात है। और तो और सरकारी बसों के अंदर भी लोगों को इस तरह ठूंसकर ले जाया जाता है जैसे सरकार ने ही बस के चालक व परिचालक को इनकी अकाल मृत्‍यु का ठेका दे रखा हो। प्राइवेट डग्‍गेमार बसों की दशा का तो बयान करना ही मुश्‍किल है।
कृषि कार्य के लिए निर्मित ट्रैक्‍टर-ट्रॉलियां ईंटों से लेकर भूसा तक और इंसानों से लेकर भेड़-बकरियां तक ढोते देखी जा सकती हैं। भूसा और ईंटें ढोने वाली ट्रैक्‍टर-ट्रॉलियों के तो आगे सड़क को भी देख पाना आसान नहीं होता क्‍योंकि उनके लिए ओवरलोडिंग की भी कोई हद नहीं है। इनके अलावा ट्रक, डंपर, लोडर आदि सभी माल ढोने वाले वाहन चालक, निर्धारित क्षमता के तहत माल लेकर चलना अपनी तौहीन समझते हैं।
कहने को परिवहन विभाग के साथ-साथ पुलिस का एक बड़ा हिस्‍सा भी अपने दिन और रात सड़कों पर ही गुजारता है किंतु सड़क दुर्घटनाएं हैं कि बढ़ती ही जा रही हैं क्‍योंकि नियमों का पालन करना और करवाना जरूरी नहीं समझा जाता।
सड़क नापने निकला हर व्‍यक्‍ति यक्ष प्रश्‍न का उत्तर देने को आतुर है। वह बताना चाहता है कि सबसे बड़ा आश्‍चर्य क्‍या है। लोगों को हर दिन कुत्ते की मौत मरते देखकर भी वह न तो अपने साथ संभावित किसी दुर्घटना के बारे में सोचता है और न अपनी गलती से दूसरों की जान जोखिम में डालने से डरता है।
साइकिल सवार, मोटरसाइकिल या स्‍कूटर चालक से आगे निकलने की कोशिश में रहता है और थ्री व्‍हीलर चालक, कार से रेस लगाने का प्रयास करता है। ट्रक वाला बस से और बस वाला हवा से प्रतिस्‍पर्धा करने में लगा रहता है।
सरकार ने सुरक्षित और सुगम सफर के लिए एक्‍सप्रेस-वे बनवाए लेकिन वही एक्‍सप्रेस-वे आज मौत का कुंआ बने हुए हैं क्‍योंकि लगभग हर तीसरा वाहन चालक वहां अपनी बाजीगरी दिखाए बिना नहीं मानता। वह सड़क पर दौड़ने की जगह उड़ने की कोशिश करता है और इस कोशिश में कई बार खुद उड़ जाता है और कई बार दूसरों को भी अपने साथ उड़ा ले जाता है।
चूंकि सड़क दुर्घटनाओं के लिए बनाए गए नियम-कानून उस दौर के हैं जब चार पहिया तो क्‍या, दोपहिया वाहन रखना भी आसान नहीं था और अधिकांश वाहन गोरे शासकों पर ही हुआ करते थे इसलिए आज वो नियम-कानून निरर्थक हो चुके हैं।
फिरंगियों ने सड़क दुर्घटनाओं के मामले में निजी हित को तरजीह देते हुए इसके लिए कानून इतना मामूली बनाया था कि इससे कभी उनके सामने परेशानी खड़ी न हो किंतु आज स्‍वतंत्र भारत में भी वही कानून कायम है और इसीलिए उसका भरपूर दुरुपयोग देखा जा रहा है।
सड़क दुर्घटना के ज्‍यादातर मामलों में जिम्‍मेदार व्‍यक्‍ति को अदालत से खड़े-खड़े जमानत मिल जाती है और मृतक के परिजनों को मुआवजा भी बीमा कंपनी अदा करती है इसलिए कानून का किसी के अंदर कोई खौफ नहीं रहता। बहुत से लोग तो बिना किसी ठोस वजह के अपने वाहन की रफ्तार उसके स्‍पीडोमीटर से भी ऊपर ले जाने की कोशिश में लगे रहते हैं नतीजतन मौत हर पल सड़क पर मंडराती रहती है।
आज यदि धर्मराज युधिष्‍ठिर मौजूद होते तो उन्‍हें भी यह जानकर आश्‍चर्य होता कि नवधनाढ्यों को किस तरह अपने नाबालिग बच्‍चों के हाथ में दुपहिया वाहन का हैंडिल तथा चार पहिया वाहन का स्‍टेयरिंग थमाने की जल्‍दी रहती है। किस तरह शराब के नशे में धुत्त होकर आज की पीढ़ी के युवा अपनी और दूसरों की जिंदगी से खिलवाड़ करने का शौक रखते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यातायात को सुरक्षित और सुगम बनाने के लिए किए जा रहे सरकारी प्रयास नाकाफी हैं और सरकार का जितना ध्‍यान वाहनों से टैक्‍स वसूलने पर केंद्रित है, उतना सुविधाएं और सुरक्षा देने पर नहीं हैं लेकिन बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के लिए वाहन चालक भी कम जिम्‍मेदार नहीं हैं।
नि:संदेह सरकार को सड़कों की लंबाई-चौड़ाई बढ़ाने के साथ-साथ सुरक्षा व सुविधाएं बढ़ाने पर भी ध्‍यान देना चाहिए ताकि अकाल मौतों का आंकड़ा हर साल ऊपर जाने से रोका जा सके परंतु यह संभव तभी हो पाएगा जब सड़क पर वाहन लेकर निकलने वाला हर व्‍यक्‍ति अपने साथ-साथ दूसरे की भी जिंदगी को अमूल्‍य समझे और यह बात अपने जेहन में रखे कि हर दुर्घटना का खामियाजा उसके शिकार व्‍यक्‍ति के अतिरिक्‍त पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। कई बार तो इसकी अवधि इतनी लंबी हो जाती है कि संबंधित व्‍यक्‍ति या व्‍यक्‍तियों को खुद अपनी जिंदगी पहाड़ लगने लगती है।
तेजी से बढ़ती वाहनों की संख्‍या और उसके अनुपात में सिकुड़ती जा रही सड़कों को देखकर फिलहाल यही कहा जा सकता है कि सड़क यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए जहां सरकारी स्‍तर पर बहुत कुछ किया जाना चाहिए वहीं वाहन चालकों को भी यह ध्‍यान रखना चाहिए कि आखिर क्‍यों लगभग पांच हजार साल पहले यक्ष द्वारा धर्मराज युधिष्‍ठिर से पूछा गया अंतिम प्रश्‍न आज तक न सिर्फ वहीं का वहीं ठहरा हुआ है बल्‍कि कहावत बनकर सामने खड़ा है।
जिंदगी जितनी कीमती आपकी अपने लिए और अपनों के लिए है, उतनी ही कीमती दूसरों की उनके अपनों के लिए है। अपने और अपनों के अरमानों को और दूसरों के भी सपनों को पलक झपकते मिट्टी में मिला देने से बेहतर है कि जिंदगी को एंज्‍वाय किया जाए उसकी अपनी रफ्तार के साथ। ईश्‍वर की दी हुई किसी भी जिंदगी को इस तरह खत्‍म करने का अधिकार किसी के पास नहीं है, और इसीलिए हत्‍या के साथ-साथ आत्‍महत्‍या को भी एक बड़े पाप की श्रेणी में रखा गया है।
सड़क पर मनमाने तरीके से वाहन चलाना और दुर्घटना को न्‍यौता देना या तो आत्‍महत्‍या का कारण बनता है या फिर किसी की हत्‍या का। बेहतर होगा कि इससे बचा जाए और यातायात के लिए बने नियम-कानूनों की खामियों का लाभ उठाने की जगह उनका हरसंभव पालन किया जाए। यदि हर वाहन चालक दुर्घटना के बाद पैदा होने वाले हालातों पर विचार करके सतर्कता बनाए रखे तो अनेक जिंदगियों को सड़क पर दम तोड़ने से बचाया जा सकता है और बहुत से लोगों को अपाहिज बनने से भी रोका जा सकता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी