साधना करने से गर्भ की रक्षा होती है तथा सात्‍विक शिशु का जन्म होता है

चंडीगढ़। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के उपचार अनेक बार रोग के लक्षण कम करने तक सीमित होते हैं । अध्यात्मशास्त्र रोग की जड तक पहुंचकर उस रोगी का उपचार करता है । गर्भपात अथवा मृत शिशु का जन्म होने जैसी बडी घटनाआें का मूलभूत कारण आध्यात्मिक होता है । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की साधिका श्रीमती अनन्या सेठी और श्रीमती सुखमणि गुप्ता ने प्रतिपादित किया कि साधना करने से भावी माता आध्यात्मिक कारणों से उत्पन्न समस्याआें से गर्भ की रक्षा कर सकती है तथा अधिक सात्त्विक लिंगदेह अपने गर्भाशय में आकर्षित करती है ।

चंडीगढ़़ में 24.6.2018 को दुःख भंजन चाइल्ड एंड वेल्फेयर सोसाइटी ने क्रिएटिंग फ्यूचर (भविष्य निर्माण) नामक कार्यक्रम आयोजित किया था । वे उस कार्यक्रम में बोल रही थीं । उनके द्वारा प्रस्तुत उक्त सूत्र स्वास्थ्य का समग्र विचार और उसका गर्भधारणा और प्रसूति पर प्रभाव महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के प्रणेता परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी द्वारा लिखित शोधनिबंध से हैं । श्रीमती अनन्या सेठी और श्रीमती सुखमणि गुप्ता ने यह विषय प्रस्तुत करते समय पिप (पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी) और यूटीएस (यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) नामक आधुनिक वैज्ञानिक प्रभामंडल और ऊर्जा मापक उपकरण तथा सूक्ष्म ज्ञान के आधार पर किया गया आध्यात्मिक शोध विस्तार से प्रस्तुत किया । इस कार्यक्रम में अनेक प्राणिक हीलर, डॉक्टर, उद्योगपति और शिक्षा विशेषज्ञ उपस्थित थे ।

उन्होंने आगे कहा कि परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी को चिकित्साशास्त्र और मनोविकारों पर शोध का 25 वर्ष का अनुभव है तथा आध्यात्मिक शोध का 36 वर्षों से अधिक अनुभव है । उनके द्वारा किए हुए प्रदीर्घ आध्यात्मिक शोध के आधार पर उनके ध्यान में आया कि मनुष्य के जीवन की किसी भी समस्या का मूलभूत कारण शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक होता है । कुछ समस्याआें के पीछे ये तीनों कारण अल्प-अधिक मात्रा में हो सकते हैं । प्रारब्ध सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक कारण है । इन आध्यात्मिक कारणों से शारीरिक और मानसिक व्याधियां / समस्याएं उत्पन्न होती हैं । इसलिए समस्या के मूलभूत कारण के अनुसार उस स्तर पर उपचार होना आवश्यक है।

चिकित्सकीय समस्याएं, उनमें भी मनोविकार का मूलभूत कारण अनेक बार आध्यात्मिक होता है । उनके कुल उपचारों में आध्यात्मिक स्तर के उपचार भी अंतर्भूत करना आवश्यक है । इस दृष्टि से हम 3 स्तरों पर प्रयास कर सकते हैं । पहला आध्यात्मिक उपचार करना, दूसरा साधना करना और तीसरा जीवन में अधिकाधिक सात्त्विकता अंतर्भूत करना । साधना बलवर्धक टॉनिक के समान होती है । वह बलवर्धक टॉनिक अपनी आध्यात्मिक प्रतिकार क्षमता बढाता है, प्रारब्ध का क्षय करता है और आध्यात्मिक स्तर बढाता है । इसलिए जीवन के विविध उतार-चढावों में हमारा मन स्थिर रखकर दुःख भोगने की क्षमता बढाता है ।

हमारा जन्म जिस धर्म में हुआ है, उसके अनुसार बताया हुआ नामजप करना साधना के अंतर्गत करनेवाले प्रयासों में सर्वाधिक सरल है । हमारा अनुभव है कि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय यह नामजप वर्तमान काल में अत्यंत अनुकूल है ।

हमें अनेक बार पूछा जाता है कि क्या कोई स्त्री गर्भधारणा के समय अधिक उन्नत और सात्त्विक जीव अपने गर्भ में आकर्षित कर सकती है ? इसका उत्तर हां है; परंतु उसकी कुछ कसौटियां हैं । सबसे महत्त्वपूर्ण कसौटी है, भावी माता को प्रतिदिन 4-5 घंटे साधना करनी चाहिए । उसका आध्यात्मिक स्तर सामान्य व्यक्ति की (स्तर 20 प्रतिशत) तुलना में अधिक (स्तर 40 प्रतिशत से अधिक) होना चाहिए । ऐसी स्त्रियां उनके गर्भाशय में सात्त्विक जीव आकर्षित कर सकती हैं । यह अपनेआप होता है । उसके लिए अलग से प्रार्थना अथवा अन्य प्रयत्न आवश्यक नहीं होते ।

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