महामारी और लॉकडाउन से उपज रहा है ज्ञान, बदल रही हैं जीवन की धारणाएं

आज कैसी विचित्र विपत्ति से जूझ रही है मानव सभ्यता, पूर्व में कभी ऐसा संकट नहीं आया जब मनुष्य सुख-दुःख में भी साथ नहीं आ सकता। शांति की खोज में मंदिर-मस्ज़िद-चर्च-गुरुद्वारों का भी आश्रय नहीं ले सकता। प्रकृति का प्रकोप ऐसा क‍ि जीवन थम सा गया है, कोरोना से यदि जीवन रक्षा करनी है तो एकाकी जीवन में ही प्रसन्न रहने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। पहले कोई घर न आए तो रूठ जाते थे कि प्रेम में कुछ कमी रह गयी, और आज कोई प्रेम से मिलने आना चाहे तो लगता है दुश्मन है क्या। भय ने धारणाएं ही बदल दी हैं।

जिन सुविधाओं के लिए दिन रात एक कर दिए, वह बेमानी सी लगने लगी हैं। पहले समय का रोना था, अब समय कटे कैसे, यही असमंजस है। लगता है कलियुग में सतयुग का आगमन हो गया है। सात्विक और सीमित भोजन एवं संसाधन के अलावा जीवन में चाहिए क्या? ऐसे सुविचार निरन्तर इतने वेग से अंतर्मन को झकझोर रहे हैं कि स्वयं में ही त्यागमूर्ति का साक्षात्‍कार हो रहा है।

सेवक-ड्राइवर के बिना भी जीवन सम्भव है, गांवों से शहर गया और इक्कीस दिन भी बिना कमाए वहाँ रह नहीं सकता और मेरे गाँव में भले ही रुखी-सूखी है पर रोटी मिल जाएगी, यह ज्ञान भी अभी ही हुआ है।

ऐसी वीरानी और भय का वातावरण तो युद्धकाल में भी नहीं देखा, बम से भयानक तो छींक हो गयी है। कोई छींक/ खाँस दे तो लगता है क‍ि साक्षात कोरोना से सामना हो ही गया। भय हो भी क्यों नहीं, सावधानी ही कोरोना से बचाव का रास्ता है, वह भी ऐसे समय में जब कुछ नासमझ मूर्खों की टोली कोरोना टेस्ट कराने को भी तैयार नहीं हैं और छुपते-छुपाते घूम रहे हैं।

जिन स्थानों पर जाने का वीज़ा एक सुखद उपलब्धि होती थी, वहीं से लोग वापस भागने को गुहार लगा रहे हैं। रोमांस व परिधान के लिए प्रसिद्ध पेरिस और पूरा यूरोप श्मशान की तरह डरा रहा है। विश्व के कई देशों के हालत तो और भी भयावह हैं। राजा और प्रजा दोनों ही इस महामारी से त्रस्त और भयभीत हैं। कई देशों में तो जनता शासन से इतनी ख़फ़ा है क‍ि शासकों के समक्ष दोहरा संकट उत्पन्न हो गया है। उनको डर सता रहा है क‍ि यदि वह कोरोना से बच भी गए, तो भी कोरोना कहीं उनकी कुर्सी चट न कर जाए। विश्वभर के स्वयंभू कर्ताधर्ता याचक बने जान की सलामती मांग रहे हैं।

सत्य है हमारी समस्त प्रार्थनाएँ भय- लोभ-प्रलोभन से ही प्रकट होती हैं।
जो प्रयोजन की पूर्णता के साथ विस्मृत हो जाती है। स्वार्थवश किया गया प्रेम मिथ्या है तो कामना की सिद्धि के लिए प्रभु से प्रेम और भक्ति सच्ची कैसे हो सकती है, भले ही निष्काम भक्ति- सकाम भक्ति में हम अपने तर्क खोज लें।

प्रयोजन सांसारिक अथवा आध्यात्मिक हो सकता है पर हमारी प्रार्थना में सम्मिलित अवश्य है। काश हमारा प्रयोजन, देने का भाव होता क्योंकि भक्ति का आधार मात्र लेने का ही भाव तो नहीं हो सकता। इस जीवन में जो भी जीव मात्र और प्रकृति के सेवा में बन पड़े करना चाहिए, यही भक्ति-प्रार्थना की सार्थकता है।

एक चिंतक ने प्रसंग सुनाया कि एक नाव समुद्र में मध्य रात्रि में डूबने के कगार पर थी, तूफ़ान उसको स्थिर होने नहीं दे रहा था। भयभीत यात्रीगण प्राण रक्षा के लिए ईश्वर प्रार्थना, भोग दान आदि का संकल्प कर रहे थे। भोर होने वाली थी, तभी किसी को किनारे के दर्शन हुए, वो चिल्लाया, किनारा आ गया।

सभी प्रार्थना छोड़ भागे, लगे अपना अपना समान समेटने। उस समय किसी को परमात्मा का ध्यान नहीं था, प्रार्थना और संकल्प भी विस्मृत हो गए। स्मरण था तो अपने सामान और नाव में सवार प्रियजन का।

भय और शंका की इस घड़ी में कहीं हमारे अंदर उत्पन्न त्याग, सात्विकता, भक्ति, प्रेम, सतयुग का भाव आदि कहीं नाव के किनारे पहुँचने की प्रतीक्षा तो नहीं कर रहे। विचार करें हमने जीवन में जो भी प्राप्त किया वह इसी माँ रूपा पृथ्वी/प्रकृति से ही लिया है, जिससे लिया क्या उसकी कोई सेवा की? फिर कौन सा अधिकार और अभिमान।

प्रकृति आज अपनी तरुणाई पर है, मानवता भयभीत और स्तब्ध है। निश्चित ही मनुष्य प्रकृति को नष्ट नहीं कर सकता। हाँ, प्रकृति से खिलवाड़ कर हम स्वयं मानव जीवन को संकट में डाल रहे हैं। प्रकृति की रक्षा का भाव भ्रम मात्र है, वास्तव में हमें अपनी रक्षा को सचेत होना पड़ेगा। यदि हमें अपनी जीवन रक्षा करनी है और आने वाली पीढ़‍ियों को जीने योग्य वातावरण देना है, तो सचेत होकर प्रकृति के अनुरूप जीवन जीना होगा।

चिन्ता से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, समाधान सावधानीपूर्ण पुरुषार्थ से ही निकलेगा। कृतज्ञ भाव से स्वीकार करना ही होगा क‍ि प्रकृति ने हमें भूल सुधार के अनेक अवसर दिए हैं, विचारणीय यह है क‍ि प्रकृति के धैर्य की परीक्षा कब तक करेंगे? यह चिन्तन और प्रार्थना का समय है। यदि हमने प्रकृति और अपनी समृद्ध परंपराओं को समझ कर, उनके अनुरूप अपने जीवन को ढाल लिया तो शायद प्रकृति के ऋण से आंशिक मुक्त हो जाएँ और यही मानवता की सच्ची सेवा एवं मानव जीवन की सच्ची प्राप्ति होगी।

कपिल शर्मा , सचिव, श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, मथुरा

 

– कपिल शर्मा ,
सचिव,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

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