दुबई के वित्तीय ढांचों में खपाने के हथकंडे ढूढ़ रहे हैं काले धन वाले

black money holders are looking for cash-strapped in Dubai's financial structures
दुबई के वित्तीय ढांचों में खपाने के हथकंडे ढूढ़ रहे हैं काले धन वाले

जनवरी 2018 से पहले अपनी संपत्ति दुबई के वित्तीय ढांचों में खपाने के हथकंडे ढूढ़ रहे हैं काले धन वाले

काले धन वाले जनवरी 2018 से पहले अपनी संपत्ति दुबई के वित्तीय ढांचों में कहीं खपा देना चाहते हैं क्योंकि जनवरी 2018 से यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) अपने बैंकों में भारतीयों के अकाउंट्स के जानकारी भारत सरकार से साझा करने लगेगा।

अंग्रेजी अखबार इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार चूंकि यूएई के बैंक अब ज्यादा छानबीन करने लगे हैं, इसलिए अपने विदेशी बैंक अकाउंट की सूचना सरकार को नहीं देने वाले कई समृद्ध भारतीय टैक्स, जुर्माना और संभावित कार्रवाई से बचने के लिए ‘इंश्योरेंस रैपर्स’ की आड़ ले रहे हैं।

गौरतलब है कि कंपनियों के लिए अकाउंट्स खोलने के लिए दुबई के बैंक भारत की टैक्स आईडी, पासपोर्ट की कॉपियां और कभी-कभार इन कंपनियों में भारतीय शेयरहोल्डरों की मौजूदगी के प्रमाण मांगने लगे हैं। विदेशी मुद्रा विनियमों के विशेषज्ञ के मुताबिक, बैंक अकाउंट्स खोलने के लिए पहले के 3-4 दिन के मुकाबले एक महीने से भी ज्यादा का वक्त ले रहे हैं।

अघोषित आय को छिपाने की कार्यप्रणाली में आरबीआई से स्वीकृत उस उदार प्रेषण मार्ग (लिबरलाइज्ड रेमिटैंस रूट) का इस्तेमाल कर मौजूदा शेल कंपनियों के शेयर खरीदना शामिल है जिसमें भारतीयों को विदेश की संपत्ति और सिक्यॉरिटीज में सालाना 2,50,000 डॉलर (करीब 1.65 करोड़ रुपये) निवेश कर बाद में कंपनी के बैंक अकाउंट पर टैक्स छूट पाने की व्यवस्था है।

इकनॉमिक टाइम्स ने जिन तीन सीनियर फाइनैंस प्रफेशनल्स से बात की, उनके मुताबिक ऐसी कंपनियों के असली स्वामित्व को छिपाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा नॉमिनी डायरेक्टरों का इस्तेमाल किए जाते हैं। उन्होंने बताया, ‘मान लीजिए कोई 1,00,000 डॉलर (करीब 66 लाख रुपये) के प्रेषण से एक कंपनी खरीद रहा है। बाद में वह स्विटजरलैंड और न्यू जर्सी जैसी जगहों से दुबई की कंपनी में बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर देता है।’

एक विश्लेषक ने बताया, ‘अब अगर उसके पास ऐसी किसी कंपनी के 90 प्रतिशत शेयर हैं तो भारत का आयकर विभाग उससे सवाल करेगा तो वह फंस सकता है क्योंकि उसे यूएई की अथॉरिटीज से सूचनाएं मिल जाएंगी। लेकिन, अगर उसके पास कंपनी के सिर्फ 10 प्रतिशत शेयर हैं और कंपनी के बोर्ड में कोई पद नहीं ले रखा है तो आपका पैसा बिजनस हुई आमदनी का है जो कंपनी का है ना कि आपका। यहीं पर नॉमिनी डायरेक्टर्स नॉमिनी शेयरहोल्डिंग अग्रीमेंट के तहत उसकी ओर से शेयर अपने पास रखते हैं जिसका खुलासा बैंकों के सामने नहीं करना पड़ता है।’

काला धन छिपाने के जिन अन्य रास्तों का सहारा लिया जाता है, उनमें इंश्योरेंस भी शामिल हैं। ऐसे ट्रस्टों की तरह ही लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी ली जाती है जिन्हें आसानी से बनाया और खत्म किया जा सकता है। इसकी प्रक्रिया भी बहुत आसान है। नॉमिनी या टेक्निकल ऑनर बीमा पॉलिसियों में निवेश करते हैं, लेकिन फायदा वास्तविक मालिक को होता है। असली मालिक तय अवधि के बाद रकम प्राप्त कर लेता है या मृत्यु अथवा अप्रत्याशित परिस्थितियों की आशंका में उसके परिवार को इसका फायदा मिलता है।’

सीनियर चार्टर्ड अकाउंटैंट दिलीप लखानी कहते हैं, ‘परंपरागत रूप से भारतीय और प्रवासी भारतीय अपना काला धन छिपाने के लिए दुबई के रास्ते का इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन, अब बैंक ज्यादा मुस्तैद हो गए हैं और असली मालिक की जानकारी मांग रहे हैं। मुमकिन है कि इससे कई लोगों को कुछ नया रास्ते पर विचार करने को मजबूर होना पड़ेगा।’

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