Mission 2019 के लिए अपने कोर एजेंडे की ओर लौट रही है भाजपा

नई दिल्ली। Mission 2019 की चुनावी जंग नजदीक है। मात्र नौ महीने शेष बचे हैं। अमित शाह ने एक ओर जहां देश भर की यात्रा कर गठबंधन सहयोगियों से सीटों व चुनावी रणनीति पर बातचीत शुरू कर दी है, वहीं दूसरी ओर मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल के लिए अपने कोर एजेंडे वैचारिक पर लौटती दिख रही है। भाजपा को अपने पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक की अहमियत पता है, इसलिए वह न सिर्फ संघ बल्कि संघ के दूसरे अनुषांगिक संगठनों को भी अब नाराज नहीं करना चाहती है। संघ परिवार की सोच के करीब सरकार द्वारा लिये जाने वाले फैसलों से भी इसके संकेत भी मिल रहे हैं।

यह मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का रणनीतिक कौशल है और वे जानते हैं कि अपने मजबूत कदम दिखाये रखने के लिए जनता को भविष्य का एजेंडा बताते रहना जरूरी है। मोदी-शाह अटल बिहारी वाजपेयी की तरह संघ परिवार से असहमति के मुद्दे नहीं बनने देते और परिवार से पूरा समन्वय बनाकर अपना काम आगे बढ़ाते हैं। उनका यह कौशल आर्थिक एजेंडे में भी दिखते हैं।

एयर इंडिया के विनिवेश का सवाल?

सरकार जिस एयर इंडिया का विनिवेश जिस जोर-शोर से करना चाहती थी, उसका विनिवेश पिछले दिनों फिलहाल टल गया। यह वाकया संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान के कुछ दिनों के बाद का है, जिसमें उन्होंने एयर इंडिया के विनिवेश पर सवाल उठाया और कहा कि उसे अच्छे से चलाया जाना चाहिए। यह अलग बात है कि नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने विनिवेश पर बाद में सफाई दी।

पश्चिम के अर्थशास्त्री बनाम देसी अर्थशास्त्री

मोदी सरकार जब सत्ता में आयी थी तो उसने पश्चिमी देशों में काम कर चुके कई अर्थशास्त्रियों पर भरोसा किया था। रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे रघुराम राजन अमेरिका व आइएमएफ ने काम किया था। उन्होंने वहीं से उच्च शिक्षा हासिल की थी। उनके जाने के बाद डिप्टी गवर्नर रहे उर्जित पटेल को रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया गया। उर्जित पटेल को देश के अंदर बैंकिंग सेक्टर में काम करने का लंबा अनुभव रहा है. राजन हमेशा भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के निशाने पर रहे।

इसी तरह नीति आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में सरकार ने अरविंद पनगढ़िया की तैनाती की थी। उनका भी पश्चिमी बैक ग्राउंड था और गोविंदाचार्य जैसे स्वदेशी विचारकों सहित सहयोगी संगठनों के निशाने पर रहे। उनके जाने के बाद देश व एशियन डेवलपमेंट बैंक में काम करने का अनुभव रखने वाले राजीव कुमार को नीति आयोग की कमान सौंपी गयी।

इसी तरह अब वित्त मंत्रालय छोड़कर मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन जाने वाले हैं। उन्हें भी पश्चिम में काम करने अनुभव है. ये अर्थशास्त्री उदारीकरण व भूमंडलीकरण वाली आर्थिक नीति के पैरोकार माने जाते रहे हैं। सुब्रमण्यन के विकल्प के नाम पर अभी तक फैसला नहीं हुआ है, लेकिन संभव है कि सरकार रिजर्व बैंक व नीति आयोग के प्रमुख चुनने की राह पर ही फिर चले। अरविंद सुब्रमण्यन भी हमेशा स्वदेशी विचारकों के निशाने पर रहे हैं हालांकि अरुण जेटली ने उनके प्रति भरपूर विश्वास का प्रदर्शन किया।

कहां होता है नीति निर्माण?

रायटर्स की एक खबर के अनुसार, कई ब्यूरोक्रेट, बीजेपी के सदस्यों व नीति निर्माताओं ने बातचीत में यह माना कि नीति निर्माण का काम मुख्य रूप से प्रधानमंत्री के कार्यालय में और राइट विंग अर्थशास्त्रियों के एक समूह द्वारा किया जाता है। रायटर्स ने सुब्रमण्यन के साथ काम कर चुके एक अफसर के नाम का उल्लेख किये बिना लिखा है कि वे अरुण जेटली का विश्वास हासिल होने के बावजूद अफसरों द्वारा वित्त मंत्रालय में अलथ-थलग कर दिये गये थे। जेटली अस्वस्थ होने के कारण कुछ महीनों से वित्त मंत्रालय नहीं आ रहे हैं और पीयूष गोयल वित्त मंत्रालय का कामकाज संभाल रहे हैं। बताया जाता है कि सुब्रमण्यन नोट बदलने की प्रक्रिया में भी लूप से बाहर थे और उनके कुछ सरकारी बैंकों के निजीकरण के सुझाव को भी सरकार ने खारिज कर दिया था।

स्वदेशी जागरण मंच का हस्तक्षेप

आरएसएस के अनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच के प्रमुख अश्विनी महाजन का कहना है कि हमें उम्मीद है कि अरविंद सुब्रमण्यन के विकल्प के रूप में मोदी सरकार किसी देसी एक्सपर्ट को लायेगी। महाजन आर्थिक मुद्दों पर मुखर रहते हैं और उनकी बातें संघ परिवार में और इकोनॉमिक रिपोर्टिंग में खासा अहमियत रखती है।

स्वदेशी जागरण मंच एयर इंडिया के विनिवेश व फ्लिपकार्ट के जरिये वालमार्ट जैसे बड़े विदेशी प्लेयर के भारत में प्रवेश का विरोधी है। फ्लिपकार्ट व वालमार्ट सौदे को नियामक की अंतिम मंजूरी का अभी इंतजार है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत देशी उद्योगों के संरक्षण की नीति पर बढ़ चुका है? इस नीति पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बढ़ चुके हैं, जिसे संरक्षणवाद कहते हैं। इसके तहत देसी उद्योगों के लिए सहज व संरक्षण का माहौल बनाना, इंपोट टैक्स बढ़ाना और विदेश कंपनियों के लिए अधिक बंदिशें लगाना शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने आधा कार्यकाल गुजर जाने के बाद 2022 के भारत के नारे को बहुत मजबूती से बुलंद किया और इसके शोर में Mission 2019 तक उनकी मौजूदा सरकार का टाइम लाइन गायब हो गया। -एजेंसी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »