गुजरात निकाय चुनाव में बीजेपी ने फिर लहराया जीत का परचम

अहमदाबाद। एक महीने के अंदर देश के तीसरे राज्य में निकाय चुनाव के नतीजे आए हैं। पहले हरियाणा, फिर पंजाब और अब गुजरात। किसान आंदोलनों की आंच के बीच हरियाणा और पंजाब में बीजेपी को जनता का गुस्सा झेलना पड़ा लेकिन अपने गढ़ गुजरात में बीजेपी ने फिर कामयाबी हासिल की है।
गुजरात बीजेपी का गढ़ है और रहेगा!
बीजेपी ने जिन छह नगर निगमों में चुनाव हुए थे, उन पर अपनी पकड़ बरकरार रखी है। अहमदाबाद, सूरत, भावनगर, जामनगर, राजकोट और वडोदरा में उसका मेयर तय है। इस चुनाव से सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगा है। चुनाव के नतीजों से एक बात पत्थर की लकीर की तरह साफ है कि गुजरात बीजेपी का गढ़ है और फिलहाल इस गढ़ में सेंध लगाने वाला दूर-दूर तक कोई दिख नहीं रहा। हालांकि यह चुनाव स्थानीय मुद्दे पर होते हैं लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के गृहराज्य की वजह से हर चुनाव पर सबकी नजर रहती है। नतीजों से साफ है कि गुजरात में बीजेपी का तिलिस्म तोड़ पाना फिलहाल किसी विपक्षी दल के बूते की बात नहीं है।
हार्दिक फैक्टर बेअसर
पिछले साल जुलाई में हार्दिक पटेल को गुजरात कांग्रेस कमेटी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से चर्चित हुए हार्दिक ने पूरे गुजरात में निकाय चुनाव के लिए जमकर प्रचार अभियान चलाया लेकिन नतीजों में इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। अहमदाबाद में हार्दिक ने पूरी ताकत झोंकी। तमाम वॉर्डों में रैलियां भी कीं। इसके बावजूद यहां कांग्रेस को करारी शिकस्त मिल रही है। सूरत जैसे पाटीदार समुदाय के गढ़ में भी कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। यहां भी बीजेपी ने कांग्रेस को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
आम आदमी पार्टी की एंट्री
इस चुनाव के नतीजे एक और संदेश दे रहे हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने सूरत में अच्छा प्रदर्शन किया है। रुझानों और नतीजों के अपडेट पर नजर डालें तो यहां फिलहाल कांग्रेस से मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा आम आदमी पार्टी ने छीन लिया है। यहां की 79 सीटों के रुझान में से बीजेपी के बाद केजरीवाल की पार्टी दूसरे नंबर पर है। उसके उम्मीदवार 13 सीटों पर आगे चल रहे हैं। राज्य में अगले साल के आखिर तक विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी के पास अपने आधार को बढ़ाने के लिए पर्याप्त समय है।
ओवैसी नहीं कर पाए कमाल
गुजरात में इस बार के निकाय चुनाव इसलिए भी अहम थे, क्योंकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने भी हाथ आजमाया था। हालांकि अहमदाबाद को छोड़कर बाकी जगह ओवैसी की पार्टी को नाकामी हाथ लगी है। इक्का-दुक्का सीटों पर ही एआईएमआईएम के उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं। पार्टी को मुस्लिम बहुल इलाकों में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी लेकिन नतीजे कुछ और ही इबारत लिख रहे हैं।
-एजेंसियां

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