कड़वा सच: अंगूठा छाप और माफिया चला रहे हैं स्‍कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी…मिस्‍त्रियों के हाथ में है ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूट की कमान

जी हां! बहुत से लोगों को यकीन नहीं होगा और बहुत से लोग यह जानकर आश्‍चर्यचकित रह जाएंगे कि कृष्‍ण की नगरी में एक ओर जहां अंगूठा छाप लोग और माफिया स्‍कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी चला रहे हैं वहीं दूसरी ओर मिस्‍त्रियों के हाथ में ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूट की कमान है।
आज हर किस्‍म की शिक्षा का हब कहलाने वाले इस धार्मिक जनपद में वर्ष 1997 से पहले न तो कोई इंजीनियरिंग कॉलेज था और न अन्‍य किसी किस्‍म का तकनीकी शिक्षण संस्‍थान।
1997 में अग्रवाल शिक्षा मंडल ने बीएसए इंजीनियरिंग कॉलेज की स्‍थापना की, हालांकि आज अग्रवाल शिक्षा मंडल बड़े विवादों से घिरा हुआ है और उसके प्रबंधतंत्र में शामिल रहने वाले लोग लगातार उसकी जड़ खोद रहे हैं।
बीएसए इंजीनियरिंग कॉलेज की स्‍थापना के बाद मथुरा ने शिक्षा के क्षेत्र में जो करवट ली, उसी का परिणाम है कि आज यह धार्मिक जनपद न केवल हर किस्‍म की शिक्षा का हब कहलाने लगा है बल्‍कि प्रदेश ही नहीं, देशभर में अलग पहचान रखता है।
स्‍याह पहलू
दरअसल, व्‍यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में पैर फैलाने तथा शिक्षा जगत का पूरी तरह निजीकरण हो जाने पर इसमें ऐसे-ऐसे तत्‍वों ने प्रवेश करना शुरू कर दिया जिनकी गिनती इससे पहले माफियाओं में होती थी और जिनका शिक्षा से दूर-दूर तक कभी वास्‍ता नहीं रहा।
यही वो दौर भी था जब तकनीकी शिक्षा में प्रवेश पाने के लिए फीस के अलावा कैपिटेशन फीस अथवा डोनेशन के नाम पर भारी-भरकम रकम देनी होती थी। डोनेशन के इस खेल ने शिक्षा के कारोबार में उतरे बेपढ़े-लिखे लोगों तथा माफियाओं को वो स्‍थायित्‍व प्रदान किया, जिसके परिणाम स्‍वरूप एक के बाद एक इंजीनियरिंग कॉलेज और इंस्‍टीट्यूट की लाइन लग गई।
जो मथुरा कभी सिर्फ कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली, यमुना के तीर्थ विश्रामघाट एवं द्वारिकाधीश, बिहारीजी और गिर्राज जी के कारण पहचाना जाता था, वह तकनीकी शिक्षा के लिए भी पहचाना जाने लगा।
इज्‍ज़त, दौलत और शौहरत एकसाथ
एकसाथ इज्‍ज़त, दौलत और शौहरत दिलवाने वाले इस कारोबार ने सर्वाधिक आकर्षित ऐसे तत्‍वों को किया जिन्‍होंने विभिन्‍न माध्‍यम से पैसा तो बहुत कमा लिया था किंतु प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त नहीं थी।
जाहिर है कि इन तत्‍वों को चोला बदलने का इससे अधिक सुनहरा अवसर नहीं मिलने वाला था अत: इन्‍होंने भारी-भरकम निवेश करके बड़े-बड़े शिक्षण संस्‍थान खोल लिए।
आज मथुरा जनपद में चारों ओर विभिन्‍न शिक्षण संस्‍थाओं की जो श्रृंखला दिखाई देती है, उनका संचालन अधिकांशत: ऐसे ही तत्‍व कर रहे हैं।
किसी समय देश को हिला देने वाले स्‍टांप घोटाले के आरोपी अब्दुल करीम तेलगी से जुड़े व्‍यक्‍ति ही नहीं, वो लोग भी आज मथुरा में शिक्षण संस्‍थान संचालित कर रहे हैं जिनके परिजनों की शिनाख्‍त ही कभी नाम के साथ ‘तस्‍कर’ लगाकर कराई जाती थी।
कहते हैं बहती गंगा में हाथ धोना किसी को बुरा नहीं लगता। शिक्षा जगत में आए इस बूम का लाभ उन तत्‍वों ने भी उठाया जिन्‍हें मथुरा के तमाम लोगों ने एक अटैची में पेचकस, प्‍लास तथा कटर आदि लेकर चलते देखा था और जो ऑफिस-ऑफिस जाकर कम्‍प्‍यूटर की रिपेयरिंग या अधिक से अधिक उसके हार्डवेयर संबंधी दिक्‍कतें दूर किया करते थे।
माफिया की घुसपैठ कैसे और क्‍यों
शिक्षा माफिया, समाज कल्‍याण विभाग तथा बैंकों की मिलीभगत से आज ऐसे लोग ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूट के मालिक बने बैठे हैं। ये बात और है कि आज भी इनमें से कई को अपना चेक साइन करने में तीस सेकंड से भी अधिक का समय लग जाता है तो कोई बमुश्‍किल कांपते हाथों से हस्‍ताक्षर कर पाता है।
सरकार द्वारा पिछले कुछ वर्षों में कैपिटेशन फीस अथवा डोनेशन की वसूली पर लगाम लगाने तथा अवैध तरीकों से छात्रों का आर्थिक शोषण करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्यवाही का प्रावधान किए जाने के कारण नि:संदेह शिक्षा व्‍यवसाय की आमदनी के स्‍त्रोत कुछ घटे हैं परंतु छात्रवृत्ति तथा प्रतिपूर्ति के नाम पर करोड़ों रुपए हड़पने का खेल अब भी लगातार जारी है।
छात्रवृत्ति घोटाला
शिक्षण संस्‍थाओं द्वारा छात्रवृत्ति के नाम पर प्रतिवर्ष सरकार को अरबों रुपए का चूना लगा देने का मामला कई बार विधानसभाओं और यहां तक कि संसद में भी उठ चुका है लेकिन राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त होने के कारण इस खेल पर रोक नहीं लग पा रही है।
समाज कल्‍याण विभाग के जरिए किए जाने वाले इस घपले में शिक्षण संस्‍थानों के संचालकों की ही नहीं, बैंक प्रबंधकों की भी बड़ी भूमिका रहती है क्‍योंकि उनकी मिलीभगत के बिना न तो छात्रों के फर्जी खाते खुल पाना संभव है और न उनके नाम पर पैसा निकल पाना।
यूं तो सरकार से छात्रवृत्ति मिलने का दायरा बहुत बड़ा है और उसमें हर वर्ग के छात्रों को लाभान्‍वित किया जाता है किंतु आईटीआई, पॉलीटेक्‍निक, बीएड व अन्‍य टीचर्स ट्रेनिंग के लिए सरकार काफी पैसा देती है और यही पैसा हर साल शिक्षा माफिया की जेबें भरता है।
बताया जाता है कि यदि सरकार इस क्षेत्र में शिक्षा देने वाले संस्‍थानों के सिर्फ छात्रों की गणना ही करवा ले तो अरबों रुपए के घोटाले का पर्दाफाश हो जाएगा क्‍योंकि इनके द्वारा दर्शायी गई छात्रों की संख्‍या और वास्‍तविक छात्रों की संख्‍या में भारी अंतर रहता है।
ऐसा नहीं है कि यह खेल केवल इसी दायरे में सिमटा हो, इसका दायरा बहुत बड़ा है और इसीलिए इसमें कॉलेज एवं इंस्‍टीट्यूट ही नहीं यूनिवर्सिटी के संचालक भी लिप्‍त हैं।
एक ही कैंपस में तीन-तीन पैथी के कॉलेज
मथुरा की एक यूनिवर्सिटी तो नियमों के विपरीत एक ही कैंपस से तीन-तीन पैथी के कॉलेज संचालित कर रही है लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला, क्‍योंकि मालिकों को राजनीतिक पार्टी का संरक्षण प्राप्‍त है। वैसे कोई बड़ा शिक्षण संस्‍थान ऐसा नहीं है जिसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त न हो, जिसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त नहीं है वो मीडिया से संरक्षण प्राप्‍त कर लेता है इसलिए सभी के काले कारनामे दबे रह जाते हैं।
राजनेता भी लिप्‍त
इसके अलावा कुछ शिक्षण संस्‍थाओं के संचालक तो बाकायदा राजनीति के क्षेत्र में हैं और चुनाव भी लड़ते हैं इसलिए उनका कुछ नहीं बिगड़ता।
यदि बात करें इनके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में योगदान की, तो उसका भी आंकलन आसानी से किया जा सकता है।
खुद को शिक्षाविद कहने वाले इन लोगों द्वारा शिक्षा जगत को दिलाई गई उपलब्‍धि मात्र इतनी है कि नंबर ऑफ शिक्षण संस्‍थाओं के मामले में मथुरा काफी आगे निकल चुका है। इससे अधिक उपलब्‍धि की बात करें तो वो उनकी निजी है, शिक्षा जगत के लिए नहीं।
कैंपस प्लेसमेंट में धोखाधड़ी
कैंपस प्लेसमेंट के नाम पर छात्रों को धोखा देना तथा उनके भविष्‍य से खिलवाड़ करना तो काफी आम है, और यही कारण है कि छात्र डिप्रेशन के शिकार होकर आत्‍मघाती कदम उठाने से नहीं डरते।
फैकल्‍टी के नाम पर
इसी प्रकार योग्‍य फैकल्टी का अभाव या अस्‍थाई फैकल्‍टी से काम चलाना भी छात्रों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बना हुआ है लेकिन उसका कोई इंतजाम नहीं किया जाता। शिकायत करने वाले छात्रों को प्रबंधतंत्र के कोप का शिकार बनना पड़ता है और मौजूदा फैकल्‍टी भी उसे फिर प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा जगत की यह दुर्दशा केवल मथुरा तक सीमित नहीं है और न अंगूठा छाप और माफिया का शिक्षा जगत पर कब्‍जा कोई नई बात रह गई है परंतु यह जरूर कह सकते हैं कि मथुरा में ऐसे तत्‍वों की संख्‍या दूसरे जनपदों से काफी आगे है क्‍योंकि यहां शिक्षा व्‍यवसाय का ग्राफ मात्र दो दशक में इतना ऊपर चढ़ा है जितना दूसरा कोई व्‍यवसाय नहीं चढ़ पाया।
माना कि किसी दूसरे व्‍यवसाय की तरह अनपढ़ एवं जाहिल लोगों का शिक्षा जगत में उतरना एक व्‍यवस्‍थागत दोष है और उसे उचित व्‍यवस्‍था करके ही दूर किया जा सकता है लेकिन अभिभावक चाहें तो अपने स्‍तर से इस पर काफी हद तक लगाम लगा सकते हैं।
भव्‍य कैंपस और आकर्षक प्रचार
वो चाहें तो किसी शिक्षण संस्‍थान को उसके भव्‍य कैंपस एवं आकर्षक प्रचार से न आंककर उसकी वास्‍तविक स्‍थिति से आंक लेने के बाद एडमिशन का निर्णय ले सकते हैं क्‍योंकि यही वह तरीका है जिससे बच्‍चों का भविष्‍य अंधकारमय होने से बचाया जा सकता है तथा शिक्षा व्‍यवसाइयों को भी आइना दिखाया जा सकता है अन्‍यथा न तो छात्रों द्वारा आत्‍महत्‍या के मामलों में कमी आएगी और न उनकी संदिग्‍ध मौतों में।
छात्रों की अकाल मौत
छात्रों को अकाल मौत से बचाना है तो स्‍थिति की गंभीरता को समझना होगा, और उन परिस्‍थितियों को भी जिनके दायरे में रहकर छात्र ऐसे लोगों के हाथों खेलने पर मजबूर हैं जिन्‍हें छात्रों की मन: स्‍थिति से या उनके अभिभावकों की मानसिकता से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्‍हें लेना-देना होता है तो सिर्फ और सिर्फ अपने निवेश को लाभ में बदलने से, नतीजतन पहले जहां शिक्षण संस्‍थान खोलना समाजसेवियों का शगल होता था वहीं आज वह नवधनाड्यों के लिए उनके सारे कारनामे छिपाने तथा इज्‍ज़त, दौलत व शौहरत एकसाथ हासिल कर लेने का ज़रिया बन गए हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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