जन्‍मदिन: ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ विजेता तेलुगु कवि नारायण रेड्डी

‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित तेलुगु भाषा के प्रख्यात कवि सी. नारायण रेड्डी का आज जन्‍मदिन है।
29 जुलाई 1931 को तत्‍कालीन आंध्र प्रदेश और आज के तेलंगाना में जन्‍मे सिंगिरेड्डी नारायण रेड्डी की मृत्‍यु 12 जून 2017 के दिन हुई थी।
अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक जाने-माने कवियों में से एक सी. नारायण रेड्डी पांच दशकों से भी अधिक समय तक काव्य रचना में लगे रहे। उनकी 40 से भी अधिक कृतियां प्रकाशित हुई हैं जिनमें कविता, गीत, संगीत, नाटक, नृत्य-नाट्य, निबंध, यात्रा संस्मरण, साहित्यालोचन तथा ग़ज़लें (मौलिक तथा अनूदित) सम्मिलित हैं।
1997 में सी. नारायन रेड्डी को राज्य सभा के लिए भी नामित किया गया था।
सी. नारायन रेड्डी की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई। उन्होंने ओसमानिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। किशोर अवस्था में उन पर लोकगीतों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित हरि-कथा, विथि-भागवत आदि लोकशैलियों की गहरी छाप पड़ी। वे संगीत-प्रेमी और सुमधुर कंठ के स्वामी थे, जिसका यह अपने काव्य पाठों में पूरा लाभ उठाते थे।
कॉलेज के दौरान सी. नारायन रेड्डी अपनी कविताओं की वजह से आकर्षण का केंद्र रहते थे। उन्‍होंने सुशीला रेड्डी से विवाह किया, जिनसे उनकी चार बेटियां हैं। वे अपनी पत्नी से इतने ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने उनके नाम से एक अवॉर्ड की शुरुआत कर दी, जो महिला लेखिकाओं को दिया जाता है।
रचनाएँ
सी. नारायन रेड्डी के काव्य के रूमानी दौर की सर्वाधिक प्रतिनिधि काव्य रचना 26 वर्ष की आयु में रचित “कपूर वसंतरायलु” (1956) है। इसने उन्हें उग्रणी कवियों में प्रतिष्ठित कर दिया। वर्तमान समाज में बेहद कठिन स्थितियों के बीच चिथड़े-चिथड़े होते मनुष्य की दुर्दशा कवि को यातना देती है। वह ऐसे लोगों से दो-चार होते हैं, जिसके हाथों में सत्ता है चाहे वह धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक, ये लोग उत्तरदायित्व की किसी विवेकशील भावना या मानवीय सरोकार के बिना सत्ता का उपभोग करते हैं।
सी. नारायन रेड्डी की 1977 में प्रकाशित रचना ‘भूमिका’ मानवतावादी चरण की सर्वाधिक उल्लेखनीय रचना है। उनका काव्य मूलत: जीवन की पुष्टि का काव्य है और इन्हें उसे, उसके संपूर्ण बहुमुखी गौरव तथा उसके समस्त कोलाहल सहित चित्रित करने में हर्षानुभूमि होती है। यह रचना अगली रचना “विश्वंभरा (1980)” की भूमिका का काम करती है, यह सी. नारायण रेड्डी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृति है, प्रस्तुत काव्य की कहानी आदि काल से लेकर आज तक की गई मानव यात्रा के माध्यम से प्रतीकात्मक भाषा में परत-दर-परत खुलती है। जीवन और सृष्टि का स्वभाव समझने की दिशा में मनुष्य का अन्वेषण इस यात्रा की एक प्रमुख विशेषता है।
प्रमुख कृतियां
कविता – स्वप्नभंगम् (1954), नागार्जुन सागरम् (1955), कर्पूण वसंतरायलु (1957), दिव्वेल मुव्वलु (1959), विश्वंभरा (1980), अक्षराल गवाक्षालु (1966), भूमिका (1977), मृत्युवु नुंचि (1979), रेक्कलु (1982)
नाटक – अजंता सुंदरी 1954
प्रदीर्घ गीत – विश्वगीति (1954)
गद्य – मा ऊरु माट्लाडिंदि (1980), व्यासवाहिनी (1965)
समीक्षा – मंदारमकरंदालु (1972)
सम्मान व पुरस्कार
सी. नारायन रेड्डी ‘तेलंगाना सारस्वत परिषद’ के अध्यक्ष थे। उन्हें 1988 में ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिला था। इसके अतिरिक्त उन्हें 1977 में ‘पद्म श्री’, 1992 में ‘पद्म भूषण’ और 1988 में ‘राज-लक्ष्मी अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया था। उनकी रचनाओं को एक नई परंपरा की शुरुआत करने वाली रचनाओं के रूप में देखा जाता है। आधुनिक तेलुगू कविता पर परंपरा और प्रभाव का आंकलन करने के लिए उन्होंने शोध किया था।
-एजेंसियां

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