जन्मदिन विशेष: उर्दू अदब के इंकलाबी शायर जोश मलीहाबादी

उर्दू अदब के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी का आज जन्मदिन है। वो 5 दिसंबर 1888 को मलीहाबाद में पैदा हुए थे। इनके पूर्वज मुहम्मद बुलंद खां नवाबों के शासनकाल में काबुल से भारत आए थे। जोश मलीहाबादी एक ऐसे शायर हुए जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों को खिलाफ अपनी कलम उठाई। उन्होंने ऐसे शेर कहने शुरू किए जो उस वक्त आम आदमी के नारे बन गए इसलिए उन्हें इंकलाबी शायर कहा गया।
सच कहें तो मिर्जा गालिब के बाद देश, काल, वातावरण को खासा प्रभावित करने वाले शायरों में जोश मलीहाबादी का नाम भी शामिल है।
जोश का असली नाम शबीर हसन खान था। वह गज़लें और नज्में तखल्लुस ‘जोश’ के नाम से लिखते थे, साथ ही उन्होंने अपने जन्म स्थान का नाम भी अपने तखल्लुस में जोड़ दिया मलिहाबादी। उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई। घर पर ही उन्होंने उर्दू-फारसी की तालीम हासील की। फिर अंग्रेजी तालीम हासिल करने के लिए वे लखनऊ गए। इसके बाद जोश आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज गए। बताया जाता है कि वह तालीम हासिल करने के लिए अलीगढ़ भी गए थे लेकिन उनकी पढ़ाई मुकम्मल नही हो सकी लेकिन जोश में शायरी की लग्न थी।
23-24 की उम्र में ही जोश, उमर खय्याम और हाफिज की शायरी को करीब से परखने लगे। आपको बता दें कि दोनों ऐसे शायर थे जिनकी शायरी में विद्रोही की बात झलकती थी। इन्ही बगावती तेवरों को हथियार बनाकर जोश ने इंकलाबी शेर कहने शुरू किए ।
जोश मलीहाबादी के बारे में एक बात बड़ी मशहूर थी कि उर्दू लफ्जों का गलत उच्चारण करने पर वह बड़े-बड़ों को कहने में हिचकते नही थे।
एक दफा जब पंडित नेहरू को उन्होंने अपनी एक किताब दी तो जवाब में पंडित नेहरू ने उन्हें कहा, “मैं आपका मशकूर (जिसका शुक्रिया अदा किया जाए) हूं।”
उन्होंने ने इस लफ्ज को ठीक करते हुए पंडित नेहरु से कहा कि आपको कहना चाहिए, मैं आपका शाकिर (शुक्रगुजार) हूं।
देश का जब बंटवारा हुआ तो वह पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 1982 में उन्होंने आखिरी सांस ली। बताया जाता है कि पाकिस्तान जाने के बाद वह दो-तीन बार भारत आए थे। आइए जोश मलीहाबादी के कुश शेरों पर नजर डालते हैं…………….
तुझको इन नींद की तरसी हुई आंखों की कसम
अपनी रातों को मेरी हिज्र में बरबाद न कर।

अब तक न ख़बर थी मुझे उजड़े हुए घर की
वो आए तो घर बे-सर-ओ-सामाँ नज़र आया।

आप से हम को रंज ही कैसा
मुस्कुरा दीजिए सफ़ाई से।

अब तक न ख़बर थी मुझे उजड़े हुए घर की
वो आए तो घर बे-सर-ओ-सामां नज़र आया।

किसी का अहद-ए-जवानी में पारसा होना
क़सम ख़ुदा की ये तौहीन है जवानी की।

कोई आया तिरी झलक देखी
कोई बोला सुनी तिरी आवाज़।

सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का
जब उस ने वादा किया हम ने ए’तिबार किया।

हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी
और उन की तरफ़ ख़ुदाई है।

मेरे रोने का जिस में क़िस्सा है
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है।

दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया।

एक दिन कह लीजिए जो कुछ है दिल में आप के
एक दिन सुन लीजिए जो कुछ हमारे दिल में है।

इस दिल में तिरे हुस्न की वो जल्वागरी है
जो देखे है कहता है कि शीशे में परी है।

मुझ को तो होश नहीं तुम को ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुम ने मुझे बर्बाद किया।

कश्ती-ए-मय को हुक्म-ए-रवानी भी भेज दो
जब आग भेज दी है तो पानी भी भेज दो।
-एजेंसियां

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