भीमा कोरेगांव केस: नवलखा और तेलतुंबड़े गिरफ्तार, तेलतुंबड़े NIA के सुपुर्द

नई दिल्‍ली। भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े को मंगलवार दोपहर को NIA ने गिरफ्तार कर कोर्ट के सामने पेश किया.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक आनंद तेलतुंबड़े को अदालत ने 18 अप्रैल तक नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी की कस्टडी में भेज दिया है.
जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली बैंच ने अपने आदेश में ये स्पष्ट कर दिया था कि आत्मसमर्पण करने की समय सीमा को और आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.
अदालत ने ये भी साफ़ कहा था कि इन अभियुक्तों को दी गई राहत दूसरे मामलों पर लागू नहीं होगी और न ही इसे नई मिसाल माना जाएगा.
हालांकि नवलखा और तेलतुंबड़े के वकीलों ने अदालत में कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात की दलील दी थी लेकिन महाधिवक्ता तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि मौजूदा हालात में जेल ही सबसे सुरक्षित जगह होगी.
फ़रवरी में मुंबई हाई कोर्ट से ज़मानत याचिका रद्द होने के बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.
कौन हैं आनंद तेलतुंबड़े
आनंद तेलतुंबड़े गोवा के एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढ़ाते हैं. तेलतुंबड़े यवतमाल ज़िले के राजुर गांव में पैदा हुए थे. उन्होंने नागपुर के विश्वैस्वरा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से पढ़ाई की है.
वो भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन के एक्ज़ीक्यूटिव प्रेसिडेंट और पेट्रोनेट इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं. फिलहाल गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेज़मेंट में पढ़ा रहे हैं.
तेलतुंबड़े ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इंकार के बाद उन्होंने अग्रिम ज़मानत के लिए याचिका दायर की थी. ये याचिका भी बीते सप्ताह रद्द हो गई थी.
इससे पहले पुणे की कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी थी जिसके बाद पुणे पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत पर सुनवाई पूरी होने तक उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था.
गौतम नवलखा
गौतम नवलखा एक एक्टिविस्ट हैं. वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के पद पर भी रहे हैं.
नवलखा ने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल पीपल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस इन कश्मीर के संयोजक के तौर पर भी काम किया है.
उन्होंने कश्मीर और छत्तीसगढ़ में ‘फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग मिशन’ पर काम किया है.
वो कश्मीर मुद्दे पर जनमत संग्रह का भी समर्थन कर चुके हैं जिसकी वजह से उन्हें मई 2011 में श्रीनगर में दाख़िल नहीं होने दिया गया था.
भीमा कोरेगांव में क्या हुआ था?
पुणे के नज़दीक भीमा कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को हिंसा भड़क गई थी. हर साल इस दिन हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं.
इस हिंसा का असर पूरे देश में देखा गया.
पुणे पुलिस ने एक शिकायत के आधार पर जांच शुरू की जिसमें कहा गया था कि हिंसा से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को यलगार कॉन्फ़्रेंस में ऐसे भाषण दिए गए जिससे हिंसा भड़की.
इस कॉन्फ़्रेंस के पीछे संदिग्ध माओवादिओं का हाथ बताया गया और पुणे पुलिस ने कई वामपंथी कार्यकर्ताओं को माओवादियों से संबंध के आरोप में देश के कई हिस्सों से गिरफ़्तार किया था.
-एजेंसियां

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