भारतेन्दु की कलम ने प्रेम माधुरी भी लिखी और उर्दू का स्‍यापा भी

आज भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र के जन्‍म दिन पर विशेष

आज आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह, प्रसिद्ध कथाकार और कवि व व्‍यंग्‍यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्‍म दिन है, उनका जन्‍म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में हुआ था। भारतेन्दु जी हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम ‘हरिश्चन्द्र’ था, ‘भारतेन्दु’ उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल दो युगों की सन्धि पर खड़ा है जिसमें उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति को छोड़कर नवीनता के बीज बोए।

देखिए उनकी रचना प्रेम माधुरी-

कूकै लगीं कोइलैं कदंबन पै
जिय पै जु होइ अधिकार तो बिचार कीजै
यह संग में लागियै डोलैं सदा
पहिले बहु भाँति भरोसो दयो
ऊधो जू सूधो गहो वह मारग
सखि आयो बसंत रितून को कंत
इन दुखियन को न चैन सपनेहुं मिल्यौ।

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है।

भारतेन्दु के नाटक लिखने की शुरुआत बंगला के विद्यासुन्दर (१८६७) नाटक के अनुवाद से होती है अर्थात् नियमित रूप से खड़ीबोली में अनेक नाटक लिखकर भारतेन्दु ने ही हिंदी नाटक की नींव को सुदृढ़ बनाया। उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’, ‘कविवचन सुधा’ और ‘बाला बोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे। भारतेन्दु जी ने मात्र चौंतीस वर्ष की अल्पायु में ही विशाल साहित्य की रचना की। उन्होंने मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से इतना लिखा और इतनी दिशाओं में काम किया कि उनका समूचा रचनाकर्म पथदर्शक बन गया।

बचपन के कवि भारतेंदु

उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी। उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया-

लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान॥

ऊर्दू की गति पर उनका व्‍यंग्‍य काफी चर्चित रहा

१८६८ ई में ‘उर्दू का स्यापा’ नाम से उन्होंने एक व्यंग्य कविता लिखी-

है है उर्दू हाय हाय । कहाँ सिधारी हाय हाय ।
मेरी प्यारी हाय हाय । मुंशी मुल्ला हाय हाय ।
बल्ला बिल्ला हाय हाय । रोये पीटें हाय हाय ।
टाँग घसीटैं हाय हाय । सब छिन सोचैं हाय हाय ।
डाढ़ी नोचैं हाय हाय । दुनिया उल्टी हाय हाय ।
रोजी बिल्टी हाय हाय । सब मुखतारी हाय हाय ।
किसने मारी हाय हाय । खबर नवीसी हाय हाय ।
दाँत पीसी हाय हाय । एडिटर पोसी हाय हाय ।
बात फरोशी हाय हाय । वह लस्सानी हाय हाय ।
चरब-जुबानी हाय हाय । शोख बयानि हाय हाय ।
फिर नहीं आनी हाय हाय ।

वहीं उनके शेर भी हर जुबां पर चढ़े रहे जैसे कि-

उठाके नाज़ से दामन भला किधर को चले
इधर तो देखिए बहर-ए-खदा किधर को चले।

…और इस तरह हिंदी की विपुल सेवा करते हुए महान साहित्‍यकार भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की 35 वर्ष का अल्‍पायु में ही निधन हो गया।

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