अमृता और साहिर के बीच था एक कोरे काग़ज़ का रिश्ता

अमृता और साहिर के बीच एक कोरे काग़ज़ का रिश्ता था। मसलन एक बार जब प्रेस रिपोर्टर अमृता की तस्वीर ले रहे थे, तब वह काग़ज़ पर कुछ लिख रहीं थीं। काग़ज़ उठाकर देखा तो वह बार-बार साहिर लिख रहीं थीं। उन्हें लगा कि अगले दिन इस काग़ज़ की तस्वीर अख़बार में छपेगी लेकिन वह काग़ज़ तस्वीर में कोरा दिखाई दे रहा था।
साहित्य की दुनिया में अमृता और साहिर का नाम साथ लिया जाना कई मायनों में ख़ास है। अमृता की किताब ‘रसीदी टिकट’ इसे साफ़गोई से बयान करती है।
उसी तरह एक बार…
उसी तरह एक बार साहिर ने अपनी किताब की भूमिका लिखने के लिए अमृता से कहा था, मगर वह उसे लिख न सकीं। अमृता लिखती हैं कि, “न जाने कोरे काग़ज़ की ये कैसी ज़िद थी कि ‘तल्ख़ियां’ का दीबाचा नहीं लिख पाई।”
जब साहिर नहीं रहे और ‘तल्खियां’ का नया एडिशन आया तब अमृता ने इसकी भूमिका लिखी, तब साहिर इस दुनिया से चले गए थे।
अमृता ने लिखा है कि, “मुझ पर साहिर का कर्ज़ था। उस दिन से जब उसने अपने मज्मूअ-ए-कलाम पर दीबाचा लिखने को कहा और मुझसे लिखा नहीं गया, आज वही क़र्ज़ उतार रही हूं। उसके जाने के बाद देर हो गई, खुदाया बहुत देर हो गई।
मुझे याद है…
मुझे याद है, एक मुशायरे में कुछ लोग साहिर का ऑटोग्राफ़ ले रहे थे, जब लोग चले गए और मैं अकेली उसके पास खड़ी रह गई तो हंसते हुए मैंने अपनी हथेली उसके सामने बढ़ा दी, कोरे काग़ज़ की तरह और उसने मेरी हथेली पर अपना नाम लिख दिया और कहा, “ये ब्लेंक चैक पर मेरे दस्तख़त हैं, जो रक़म चाहो लिख लेना और जब चाहो कैश करवा लेना।”
चाहे वो काग़ज़ मांस की हथेली थी, लेकिन उसने कोरे काग़ज़ का नसीब पाया था, इसलिए कोई हर्फ़ उस पर नहीं लिखा जा सकता था।”
-एजेंसी

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