बर्नी सैंडर्स ने अपना चुनावी अभियान समाप्त किया, बाइडेन का रास्‍ता साफ

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी की दौड़ में शामिल डेमोक्रेटिक पार्टी के बर्नी सैंडर्स ने अपना चुनावी अभियान समाप्त कर दिया है. इसके साथ ही पूर्व उप-राष्ट्रपति जो बाइडेन के डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने का रास्ता भी साफ़ हो गया है.
78 साल के सैंडर्स ने अपने समर्थकों से कहा कि नामांकन जीतने के लिए जितने पर्याप्त वोट चाहिए, उसका कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है.
सैंडर्स को शुरुआत में ज़रूर सफलता मिली लेकिन बीते हफ़्ते वो बाइडेन से पिछड़ गए. उन्होंने स्वास्थ्य और आय की असमानताओं को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था.
इस साल के चुनावी चक्र में वामपंथ की ओर सबसे अधिक झुकाव रखने वाले उम्मीदवारों में से सैंडर्स खुद को डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट बताते रहे. उनका कैंपेन मुख्य तौर पर हेल्थ केयर पॉलीसीज़ को लेकर मुफ़्त पब्लिक कॉलेज, अमीरों के लिए टैक्स बढ़ाने और न्यूनतम मज़दूरी बढ़ाने सहित दूसरी नीतियों पर केंद्रित रहा.
साल 2016 के चुनाव में सैंडर्स ने हिलेरी क्लिंटन को चुनौती दी थी. लेकिन बाद में वो पीछे रह गए थे. अपने दोनों ही चुनावों के दौरान उन्हें युवा मतदाताओं का भरपूर सहयोग मिला.
एक ओर जहां सैंडस को युवा मतदाताओं का समर्थन मिला वहीं 2020 के डेमोक्रेटिक प्राइमरी चुनावों में वो दक्षिणी राज्यों में प्रमुख अफ्रीकी अमरीकी मतदाताओं को लुभाने में विफल रहे.
हाल के हफ़्तों में कोविड 19 के फैले प्रकोप की वजह से उन्होंने लाइव स्ट्रीम के माध्यम से ही कैंपेन को संबोधित किया. अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि बाइडेन ही डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार होंगे. ऐसे में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उनका मुकाबला मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप से होगा.
सैंडर्स ने क्या कहा?
सैंडर्स ने अपने समर्थकों को लाइव स्ट्रीम के ज़रीए बताया कि अभियान ख़त्म करने का फ़ैसला उनके लिए काफी मुश्किल और तक़लीफ़देह था. उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि उनके कुछ समर्थकों ने उनसे कहा था कि अंतिम राज्य के चुनावों तक वो लड़ें. उन्होंने कहा, “अगर मुझे लगता कि हमारे पास नाांकन के लिए संभावना है तो मैं निश्चित तौर पर इसे जारी रखता.”
सैंडर्स ने अपने संबोधन में कहा कि इस कैंपेन ने अमरीका के लोगों को यह चेतना दी कि वे किस तरह का राष्ट्र बन सकते हैं. उन्होंने कहा कि इस कैंपेन के साथ ही देश ने आर्थिक न्याय, समाजिक न्याय, नस्लीय न्याय, पर्यावरणीय न्याय के लिए कभी ख़त्म ना होने वाला एक बड़ा क़दम उठाया है.
अपने संबोधन में उन्होंने बाइडेन का भी ज़िक्र किया और उन्हें बधाई दी. सैंडर्स ने कहा कि वो उनके साथ मिलकर प्रगतिशील विचारों को आगे बढ़ाने का काम करेंगे.
भारत के चेहरे पर क्‍यों लौटी मुस्‍कान
नई दिल्‍ली। बर्नी सैंडर्स को भारत विरोधी माना जाता है जबकि पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के शासन काल में उप राष्‍टपति रहे जो बाइडन उन्‍हीं के स्‍वभाव के हैं।
डेमोक्रैट्स का मानना है कि थोड़ा वामपंथी मध्‍यममार्गी रुझान वाली जो बाइडन की नीतियां डोनाल्‍ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों को टक्‍कर देने के सबसे अच्‍छी हैं।
भारत सरकार पहले बर्नी को लेकर चिंतित थी लेकिन बाइडन के आने के बाद अब भारतीय राजनयिकों ने थोड़ी राहत की सांस ली है।
ओबामा की नीतियों को आगे भी जारी रख सकते हैं बाइडन
माना जा रहा है कि बाइडन भी बराक ओबामा की नीतियों को आगे भी जारी रख सकते हैं या उनमें कुछ बदलाव कर सकते हैं। वर्ष 2015 में उपराष्‍ट्रपति रहने के दौरान बाइडन ने यूएस-इंडिया बिजनस काउंसिल समिट कहा था कि अमेरिका चाहता है कि कैसे भारत उनका ‘सबसे अच्‍छा मित्र’ बने। हालांकि ओबामा के शासनकाल के दौरान ट्रंप की तरह से भारत और अमेरिका के संबंधों में उतना ‘उल्‍लास’ नहीं था।
विश्‍लेषकों के मुताबिक जो बाइडन अब अगर अमेरिका के राष्‍ट्रपति बनते हैं तो ओबामा के दिनों की तरह से फिर से दोनों के बीच संबंध और आगे बढ़ेंगे। इससे भारत को फायदा होगा। ओबामा के कार्यकाल के दौरान ही भारत को अमेरिका ने रणनीतिक वैश्विक साझीदार का दर्जा दिया था। माना जा रहा है कि बाइडन के कार्यकाल में भी यह जारी रह सकता है। कोरोना संकट के बाद भी ट्रंप की लोकप्रियता बनी हुई है और उनकी दोबारा वापसी के पूरे चांस बरकरार हैं। हालांकि भारत अगर सत्‍ता में बदलाव भी होता है तो उसके लिए तैयार है।
-एजेंसियां

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