जॉन अब्राहम की एक्टिंग से सजी बेस्ट फिल्म Batla House

नई द‍िल्ली। 15 अगस्त के दिन सिनेमाघरों में अक्षय कुमार की मिशन मंगल और जॉन अब्राहम की Batla House का क्लैश हो  रहा है। Batla House में जॉन अब्राहम पुलिस अफसर की भूमिका में हैं। जॉन के अपोजिट मृणाल ठाकुर हैं. सोशल मीडिया पर फिल्म को अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है।

बाटला हाउस को फिल्म क्रिटिक्स अच्छी रेटिंग दे रहे हैं। मूवी के प्लॉट, नैरेशन और किरदारों की अदाकारी को पसंद किया जा रहा है। यूजर्स बाटला हाउस को परफेक्ट एक्शन थ्रिलर, परफेक्ट एंटेरटेनर फिल्म का टैग दे रहे हैं। एक यूजर ने लिखा- बाटला हाउस अनोखी मजेदार फिल्म है। ये जॉन अब्राहम के करियर की बेस्ट फिल्म है।

जॉन अब्राहम इस फिल्म से अपने करियर के शीर्ष पर पहुंचते दिख रहे हैं। उनके सीने में सुलगती आग और आंखों से रिसता दर्द हर उस भारतीय की कहानी है जिसे हालात के झूठ के सामने अपना सच साबित करने के लिए हर घड़ी भिड़ना होता है।

सीरियल बम धमाकों की जांच कर रही टीम को सूचना मिलती है कि दिल्ली के ‘बाटला हाउस’ इलाके में कुछ आतंकवादी छुपे हैं। पुलिस की टीम छापा मारती है। दो आतंकवादी मारे जाते हैं। एक भाग जाता है। दिल्ली पुलिस का एक अफसर शहीद हो जाता है, दूसरा गंभीर रूप से घायल होता है। शुरू हो जाता है तुष्टिकरण की राजनीति का एक ऐसा सिलसिला, जिसमें खाकी की पूजा करने वाले एक अफसर का जीते जी ही पोस्टमार्टम होने लगता है। अफसर की बीवी पत्रकार है। वह सच के साथ रहने की कोशिश में अपने ही पति के खिलाफ जाते दिखती तो है लेकिन उसके भीतर की इंसानियत उसे वह सच भी दिखाती है।

जॉन अब्राहम देशभक्ति से ओतप्रोत एक ऐसे सिनेमा के वाहक बन चुके हैं जिसमें मुद्दों की बात होती है। वह एक पहले से खींची लकीर को ही गाढ़ा नहीं करते रहते हैं बल्क‍ि हर बार एक नई लकीर खींचते हैं और उसे अपनी पहले की खिंची लकीर से लंबा करने की कोशिश करते हैं।

अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम की अदाकारी का यही बड़ा फर्क है। अक्षय जहां दर्शकों के मन में पहले से बसी देशभक्ति को ही दुलराते हैं, जॉन का सिनेमा दर्शकों के दिलों के किसी कोने में दबी पड़ी एक ऐसी जिजीविषा को जगाते हैं, जिसे कुरेदने से दर्द बहुत होता है।

अभिनय के मामले पूरी फिल्म में वैसे तो जॉन अब्राहम ही अपने करियर के एक बेहतरीन रोल में दिखाई देते हैं। उनके चेहरे के भाव उनके किरदार के पेशे के अनुरूप ही हैं। इसरो के वैज्ञानिकों की गरिमा भले मिशन मंगल में धूमिल होती दिखती हो, जॉन ने दिल्ली पुलिस की वर्दी पर आंच नहीं आने देने की पहले सीन से ठान रखी है। हालांकि, वह कुछ चुटीले तंज भी इस दौरान कसते हैं, ‘आतंकवादियों से भिड़ने के जितने पैसे हमें मिलते हैं, उतने पैसे तो ट्रैफिक का सिपाही एक दिन में कमाता है।’

निर्देशक के तौर पर निखिल आडवाणी ने अपने करियर में नया रास्ता चुना है। वह लीक से इतर सिनेमा बजाने की बजाय अब मुख्यधारा के उस सिनेमा की धार में बह चले हैं, जिसमें दर्शकों की उम्मीदों को हर संवाद, हर अतिरेक से परवान चढ़ाना होता है। फिल्म का संतुलन बनाए रखने में निखिल को सबसे ज्यादा मदद मिली है मृणाल ठाकुर से। मृणाल ने अभिनय का रास्ता वहां से पकड़ा है, जिस मुकाम पर कभी हिंदी सिनेमा ने शबाना आजमी, नंदिता दास या फिर दीप्ति नवल जैसी अभिनेत्रियों का काम देखा है।

– एजेंसी

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