अयोध्या विवाद: वैद्यनाथन ने कहा, आर्कियोलॉजिकल साक्ष्य हमारी आस्था को सपोर्ट करते हैं

नई दिल्‍ली। अयोध्या मामले में गुरुवार को 36वें दिन की सुनवाई हुई जिसमें राम लला विराजमान के वकील ने कहा कि मस्जिद के नीचे जो स्ट्रक्चर था उसमें कमल, परनाला और वृत्ताकार श्राइन के साक्ष्य मिले हैं। उन्होंने इससे निष्कर्ष निकलता है कि वह मंदिर था। सदियों से लोग वहां पूजा करते रहे हैं। वहीं ढांचे के नीचे मंदिर का स्ट्रक्चर पाया गया है। वकील ने कहा आर्कियोलॉजिकल साक्ष्य हमारी आस्था को सपोर्ट करते हैं। वहीं हिंदूपक्षकारों की ओर से यह भी दलील दी गई कि स्कंद पुराण कहता है कि जन्मस्थान पर जाने भर से मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए भी राम जन्मस्थान हिंदुओं के लिए महत्वपूर्ण है। आइए जानते हैं सुनवाई के के दौरान किसने क्या कहा…
राम लला विराजमान के वकील सीएस वैद्यनाथन: मस्जिद के नीचे जो खुदाई हुई उसमें विशाल स्ट्रक्चर मिला है और उसमें परनाला दिखा है जो मंदिर का हिस्सा है। इस तरह के अवशेष दीवारों में मिले हैं जो 10वीं और 11वीं सदी के हैं। जो चित्र हैं उनसे साबित होता है कि विवादित ढांचा पिलर पर बनाया गया था। पिलर ढांचे के नीचे था। उसी के ऊपर पिलर बेस पर विवादित ढांचा बना था। इससे साबित होता है कि विवादित ढांचे के नीचे स्ट्क्चर था।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़: आप कैसे साबित करेंगे कि जो भी पिलर था, वह एक स्ट्रक्चर में ही था?
वैद्यनाथन: एक लेवल पर 36 पिलर थे और दूसरे लेवल पर चार पिलर थे। मुस्लिम पक्षकार पहले तो कहते थे कि वहां नीचे कोई स्ट्रक्चर था ही नहीं, लेकिन बाद में कहा कि वह ईदगाह था।
मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन: लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह पता चले कि पुराने स्ट्रक्चर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।
वैद्यनाथन: कैसे एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) ने निष्कर्ष निकाला कि जो विवादित ढांचे के नीचे स्ट्रक्चर था वह मंदिर था?
दरअसल, जो स्ट्रक्चर था उसमें कमल का रुपांकन, वृत्ताकार श्राइन, परनाला आदि था जो उत्तर भारतीय मंदिरों में मौजूद होता है।
दूसरे पक्षकार यह बात स्वीकार कर रहे हैं कि अयोध्या में राम का जन्म हुआ था लेकिन विवाद जन्मस्थान को लेकर कर रहे हैं। यह हमारी दलील है कि विवादित ढांचे के नीचे विशाल स्ट्रक्चर है और हिंदू वहां सदियों से पूजा करते आ रहे हैं तो इस बात में कोई विवाद नहीं होना चाहिए कि वह स्ट्रक्चर हिंदुओं का था।
जस्टिस चंद्रचूड़: लेकिन जो फीचर हैं, वे बौद्ध धर्म में भी पाए जाते हैं लेकिन आपको साबित करना है कि यह मंदिर का ही था। क्या साक्ष्य है कि ये मंदिर 8 शताब्दी पुराना है? आस्था और विश्वास पर कोई सवाल नहीं है, यहां हम साक्ष्य की बात कर रहे हैं।
वैद्यनाथन: हिंदुओं के लिए यह जगह महत्वपूर्ण है।
जस्टिस चंद्रचूड़: आस्था और विश्वास एक अलग तरह की दलील है। निश्चित तौर पर उसके लिए साक्ष्य की जरूरत नहीं हो सकती है लेकिन यहां मूल बात साक्ष्य को लेकर है।
वैद्यनाथन: हम कही सुनी आस्था की बात को खारिज नहीं कर सकते। यहां तक कि कुरान भी इसी तरह की बात को मानता है।
राजीव धवन: यहां कुरान को चुनौती वाली बात नहीं है। किसी भी धर्म ग्रंथ पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। हमारी दलील है कि गवाहों के बयान से यह साबित नहीं हो रहा है कि 1934 से पहले वहां लगातार पूजा हो रही थी।
वैद्यनाथन: जन्मभूमि अपने आप में स्वतंत्र रूप से न्यायिक व्यक्ति है।
हिंदू पक्षकार के वकील पीएस नरसिंम्हा: आस्था और विश्वास एक तथ्य है और उसे साबित करना हमारा काम है। दूसरे पक्षकार का कहना है कि हमारा पूजा का अधिकार विश्वास और आस्था पर आधारित है। 1961 का फैसला है कि पूजा का अधिकार सिविल राइट्स है। आस्था और विश्वास धार्मिक नीति के हिसाब से साबित होना चाहिए। हम स्कंद पुराण के हिसाब से चलते हैं। स्कंद पुराण कहता है कि मोक्ष जरूरी है। ऐसे में हिंदुओं के लिए जन्मस्थान पर जाना जरूरी है।
उन्होंने कहा, श्लोक कहता है कि राम जन्मस्थान पर जाने भर से मोक्ष की प्राप्ति होती है। राम के जन्मस्थान से ही सब-कुछ शुरू होता है। इसी कारण जन्मस्थान पर जाना हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कभी भी मस्जिद के वजूद को अकेले नहीं बताया गया बल्कि हमेशा कहा गया कि वहां हिंदू पूजा करते थे। इसके लिए आर्कियोलॉजिकल साक्ष्य भी मौजूद हैं। हमारी आस्था सदियों से है कि वह जन्मस्थान है। स्कंद पुराण में राम जन्मभूमि की बात है जिससे साफ होता है कि वह सदियों से है। आर्कियोलॉजिकल साक्ष्य हमारी आस्था को सपोर्ट करते हैं।
(सुनवाई के दौरान जब दो हिंदू पक्षकार के वकील ने 20 मिनट में दलील पूरी कर ली तो चीफ जस्टिस ने निर्मोही अखाड़े के वकील सुशील कुमार जैन से कहा कि आपके पास अब डेढ़ घंटा है।)
एडवोकेट जैन: अब मैं टी-20 में आ रहा हूं।
चीफ जस्टिस: (नाराजगी जताते हुए) हमने आपको 4-5 दिन लगातार सुना आप इसे टी- 20 मैंच से तुलना कर रहे हैं? मैं इस तरह की टिप्पणी पसंद नहीं करता।
एडवोकेट जैन: हमें अपनी टिप्पणी पर खेद है।
निर्मोही अखाड़ा के वकील एस के जैन: हमें टाइटल साबित नहीं करना है।
जस्टिस चंद्रचूड़: आपको शेबियत राइट को साबित करना है।
जस्टिस अशोक भूषण: आप अपनी दलील को दोहराएं नहीं बल्कि मुस्लिम पक्षकार की दलील पर जवाब दें।
एडवोकेट जैन: हमने आंतरिक और बाहरी आंगन को अलग करके कभी नहीं देखा क्योंकि विवाद तो अंदर के आंगन को लेकर ही है। अखाड़ा के पास बाहरी आंगन का पजेशन पहले से था, जब अंदर के आंगन के लिए सूट दाखिल किया गया था।
सुशील जैन: राम चबूतरा पर हमारा पजेशन था। दूसरे पक्ष को साबित करना होगा कि उनका मालिकाना हक है। सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा अंदर के आंगन पर है लेकिन पूरा स्ट्रक्चर ही एक समग्र इलाका है जो न्यायिक व्यक्ति है।
जन्मस्थान पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा: स्कंद पुराण में रामसेतु है।
राजीव धवन: यहां कोई नई दलील नहीं हो सकती।
चीफ जस्टिस: आप नई दलील नहीं दे सकते आपको मुख्य दलील पर ही फोकस करना होगा।
जस्टिस चंद्रचूड़: आप यहां रामसेतु के बारे में दलील नहीं दे सकते हैं। आप बताएं कि स्कंद पुराण में कहां लिखा है कि भगवान राम का जन्मस्थान कहां है?
राजीव धवन: स्कंद पुराण में जन्मस्थान के बारे में नहीं लिखा है।
चीफ जस्टिस: (पीएन मिश्रा से) हम आपकी नई दलील इस स्टेज पर नहीं ले सकते। यहां कौन से संवैधानिक सवाल तय करना है? बेंच पांच जजों की है इसलिए यह संवैधानिक बेंच है। इस तरह का मामला दो जज भी सुन सकते हैं। लेकिन पांच जज की संवैधानिक बेंच इसलिए सुन रही है क्योंकि यह मामला बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है।
-एजेंसियां

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