महामारी के इस दौर में मृत्यु को शत्रु के रूप में देखने से बचें

हमें मृत्यु को ऐसे शत्रु के रूप में देखना सिखाया जाता है जिससे हमें बचना चाहिये। हम मृत्यु को जीवन के विपरीत समझते हैं और इसी कारण से यह गलत या बुरे के रूप में, अप्राकृतिक व बदसूरत के रूप में तथा सबसे भयानक के रूप में देखते हैं। कुछ नयी पीढ़ी के विचारक मृत्यु के विचार को एक प्रकार की व्यक्तिगत विफलता की तरह प्रचार करते हैं। विशेषतः यदि यह दुर्घटना या लाइलाज़ बीमारी के द्वारा हुई हो। लेकिन महामारी के इस दौर में सभी को यह समझना जरूरी है कि मृत्यु को शत्रु के रूप में देखने से बचें।

इन विचारकों के लिये अचानक मृ‍त्यु होना या बीमार पड़ना दर्शाता है कि आप आत्म-घृणा या निम्न विकासवादी चेतना के दोषी हैं। मृ‍त्यु को एक सजा के रूप में देखा जाता है। ऐसा कुछ जिसके खिलाफ से अवाज उठानी चाहिये व पूरी ताकत से लड़ना चाहिये। हम मृ‍त्यु के आस-पास संकुचित होते हैं क्योंकि इस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं है। यह एक बहुत बड़े अज्ञात डर का अनिवार्य व भयानक प्रवेश द्वार है जिससे हम सब डरते हैं। मृत्यु का एक अनजान भय हमारी प्रत्येक तंत्रिका, प्रत्येक इच्छा या प्रत्येक लगाव के पीछे होता है। चाहे यह डर परित्याग, अस्वीकृति या किसी प्रकार के खतरे का हो, सभी के पीछे डर का मूल कारण मृत्यु होता है।

यह हम सब पर शासन करता है, हममे से कई लोगों को यह पता तक भी नहीं है। जीवन के पहले आधे हिस्से में इंसान इस तरह से जीता है कि जैसे मृत्यु कुछ ऐसी चीज़ है जो केवल ”वहां” उन लोगों की होती है, ”मुझे” नहीं। युवा के रूप में, अपनी व्यक्तिगत अमरता में विश्‍वास करते हैं। अक्सर हम मूर्खतापूर्ण खतरों का जोखिम उठाते हैं जो हमारी सीमाओं को धकेलती है। हम ”धुरी पर जीवन जीते हैं” और अपने शरीर से इस तरह से व्यहवार करते हैं जैसे कि वह अविनाशी ताकतों से बना है, जो नष्ट नहीं होगा। तब अधेड़ उम्र के आस-पास, यह सब बदल जाता है। अचानक हम ”भागते समय” के प्रति जागरूक हो जाते हैं।

हमारा शरीर जीर्ण होने के लक्षण दिखाने शुरू कर देता है। अब आगे हमारी अपराजित प्रतिद्वंदी मृत्यु के खिलाफ स्पर्धा शुरू हो जाती है। हम जानते हैं अंत में कौन जीतेगा, परंतु हम मन ही मन यह आशा करते हैं कि किसी तरह हम यहाँ से बाहर जिंदा ही बच निकलेंगे। सांत्वना के लिये कई ”अनन्त जीवन” के धार्मिक वादे करते हैं, कुछ के लिये इनका अर्थ है की शरीर जीवित रहेगा या नहीं तो कम से कम प्रलय के बाद उन्हें लौटा दिया जायेगा। इस तरह, धर्म मृत्यु के लिये एक दवा या उपचार बन जाते हैं। यही एकमात्र उपचार है अन्यथा यह लाइलाज है।

कई बार सृष्टिकर्ता के साथ सही रिश्ते बनाने पर जोर देने के बजाय धार्मिक सिद्धांत लोगों के मृत्यु के भय के साथ खेलता है और वादा करता है कि इस डर के खिलाफ केवल इस सिद्धांत का होना निश्चित है। इस प्रकार के कारणों से ही हम मृत्यु को बुराई से जोड़ना सीखते हैं। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि हम इतने भयभीत हैं। हमे ऐसा सोचने की शिक्षा दी गयी है कि मृत्यु सभी बुराइयों के अधिकार-क्षेत्र में आती है और जीवन के विरुद्ध है। ऐसी बहुत सी संस्कृतियाँ हैं जो मृत्यु के लिये अलग दृष्टि-कोण रखती हैं। वे मृत्यु को जन्म की तरह ही जीवन चक्र की स्वाभाविक अंग की तरह ही देखती हैं।

वे समझती हैं कि किसी के जन्म से पहले हमेशा किसी का अंत निश्‍चित है। जन्म व मृत्यु को जीवन के सबसे जटिल पहलुओं के रूप में पहचाना जाता है। मृत्यु के बिना जीवन नहीं हो सकता। नयी चीज के अस्तित्व में आने से पहले वहां एक प्रकार का त्याग या समाशोधन होना होता है। किसी चीज का समर्पण भी होना होता है। यहाँ समर्पण मृत्यु का एक पर्याय है। मृत्यु व जीवन इतनी बारीकी से जुड़े हैं कि मृत्यु जैविक जन्म कि प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है। स्टॅनिस्लॉव ग्रोफ (स्वयं की खोज के साहस) द्वारा शुरू किया गया चेतना अनुसंधान ने पता लगाया है कि भ्रूण वास्तव में जन्म के समय एक मृत्यु अवस्था से गुजरता है।

ग्रोफ ने जन्म प्रक्रिया को चार चरणों में निर्धारित किया है। जन्म का दूसरा चरण तब होता है जब माँ के संकुचन भ्रूण को जबरदस्ती नीचे धकेलते हैं परन्तु गर्भाश्य ग्रीवा उसे निकलने देने के लिये पर्याप्त रूप से फैली नहीं है। कभी-कभी घंटों, भ्रूण अपने अन्त को देखता है। वहां बाहर कोई रास्ता नहीं है। सर्वभौमिक अनुभवों से, हम सभी ने मृ‍त्यु को एक ऐसी शक्ति के रूप में माना है जो बार-बार घटती है। जिन्होंने सीज़ेरियन से जन्म दिया ताकि वे जन्म-नलिका द्वारा होने वाले संघर्ष से बच सके, उन लोगों में भी अनुवांशिकता के चारों चरण पाये जाते हैं।

जन्म-मृ‍त्यु चक्र हमारे डीएनए का हिस्सा है। मृ‍त्यु से जीतने के बजाय सभ्यता के साथ आत्म-समर्पण करना सीखना हमारे लिये चुनौती बन जाता है। कार्लोस कस्टेनेडा ने अपने लेखन में ”मेक्सिको में यक़ुई जनजातियों के योद्धा” का वर्णन किया किया है। ये यक़ुई योद्धा मृत्यु के साथ एक अंतरंग सम्बंध विकसित करके, अपने निधन की संभावनाओं के लिये सदैव तत्पर रह कर पूरी तरह से जीवन में प्रवेश करना सीखता है। घबराहट से प्रेरित अति-सतर्कता के द्वारा होने वाली, दुखी व चिंतित स्थिति के साथ अथवा लगातार पीछे की तरफ देखते हुए नहीं बल्कि उद्देश्य की स्थिरता के साथ जो कि प्रत्येक क्षण को इस तरह से जीता था जैसे कि यही अंतिम क्षण था

इस तरह से किया गया प्रत्येक कार्य को डॉन जुअन (कैस्टनेडा की किताबों के पुरानें जादूगर) “त्रुटिहीनता” कहते हैं। यह समझते हुए कि जीवन कोई गारंटी प्रदान नहीं करता, यह क्षण किसी का भी अंतिम क्षण हो सकता है, तब हर कार्य चेतना से प्रभावित हो जाता है। जैसा की डॉन जुअन कहते यदि हम स्वयं को जागरुक होने के अनुमति देते हैं तो मृत्यु हर क्षण हम पर अपना अधिकार दिखाने के लिये तैयार खड़ी रहती है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे जीवन में कितने कम अफसोस होंगे यदि हम इस प्रकार के विचारहीन शब्दों या कार्यों को छोड़ देंगें? सुकरात अपने आस-पास के लोगों को यह याद दिलाने के लिये जाने जाते थे कि प्रत्येक को हमेशा ”मरने के अभ्यास में व्यस्त होना चाहिये।”

जीवन को पूरी तरह से जीने का कोई रास्ता नहीं है जब तक हमें यह ना पता हो कि मरते कैसे हैं। यह सत्य है कि मृ‍त्यु मुक्ति कि विषय-वस्तु है। जीवन संकुचन और विस्तार की एक श्रृंखला से बना है। हमारे द्वारा ली गई व छोड़ी गयी प्रत्येक सांस हमारे जन्म-मृ‍त्यु के चक्र को दर्शाती है। प्रत्येक सांस लेने पर व छोड़ने पर आप प्राण (आत्मा या जीवन) को आप ”भरते हैं” या ‘खाली” करते हैं। हम मृत्यु से लड़ते हैं क्योंकि हम मृत्यु से डरते हैं। हम चाहते हैं कि सभी चीजें जैसी हैं वैसी ही रहें लेकिन यह चीजों के अस्तित्व के खिलाफ जाता है। जो चीजे जीवित हैं, बार-बार आगे बढ़ती हैं व बदलती रहती हैं। पुरानी चीजें समाप्त होकर कुछ नया बन जाती हैं।

जब कोई परिवर्तन को रोक देता है तो वह निष्क्रिय हो जाता है और अनिवार्य रूप से मर जाता है। परिवर्तन जन्म-मृत्यु की प्रक्रिया है। एक समय आता है जब आपकी शारीरिक खोल, जिससे आप सबसे ज्यादा जुड़े हैं, का भी त्याग कर देना चाहिये। रहस्यवादी हमें याद दिलाते हैं कि यह संभव कि एक पुराने जूते कि तरह शरीर को भी छोड़ा जा सकता है तब एक निश्‍चित समय पर हम मृत्यु का स्वागत एक मुक्ति-दाता के रूप में करते हैं बजाय शत्रु के रूप में देखने के। तब मृत्यु, बेसब्री से इंतजार किया गया एक मित्र बन जाती है। रजनीश कहते हैं,”यदि आप अगर आप मरना रोक देते हैं तो आप जी भी नहीं सकते।” यह मृ‍त्यु ही है जो अजन्मे के लिये उत्सुक प्रतीक्षा लाती है।

-एजेंसियां

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