पड़ोसी मुल्‍क के पाव-पाव सेर वाले एटम बम और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्‍ठ पत्रकार, है कोई समानता ?

जैसे पड़ोसी मुल्‍क में पाव-पाव भर तथा आधा-आधा सेर के ‘परमाणु बम’ हैं, उसी प्रकार हमारे यहां ढाई-ढाई सौ ग्राम और आधा-आधा किलो के ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ हैं।
आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि इन वरिष्‍ठ पत्रकारों की तुलना पड़ोसी मुल्‍क के परमाणु बमों से क्‍यों ?
तो इसका जवाब यह है कि जितने खतरनाक पड़ोसी मुल्‍क के ‘चवन्‍नी छाप’ परमाणु बम हैं, उससे ज्‍यादा नहीं तो कम खतरनाक ढाई-ढाई सौ ग्राम वाले हमारे ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ भी नहीं हैं।
दरअसल इन वरिष्‍ठ ‘युवा’ पत्रकारों में इतनी एनर्जी है, इतने विस्‍फोटक तत्‍व भरे हुए हैं कि पता नहीं ये कब, कहां और कैसे फट पड़ें।
अब जाहिर है कि फटेंगे तो किसी न किसी का नुकसान जरूर होगा।
मैं यहां पहले यह क्‍लीयर और कर दूं कि स्‍वतंत्र भारत में अब कोई ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकार शायद ही शेष हो। आप मान सकते हैं कि इस किस्‍म की नस्‍ल विलुप्‍त न सही, विलुप्‍त प्राय तो हो ही चुकी है।
ऐसी धारणा बनाने का एक ठोस आधार यह है कि तीन दशक की सक्रिय पत्रकारिता में मुझे कहीं कोई ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकार ढूंढे नहीं मिला।
18-20 का कोई एक हो या 20-20 के दो रहे हों, सबके सब वरिष्‍ठ पत्रकार ही पाए गए लिहाजा इस शोध से यह भी ज्ञात हुआ कि इस वरिष्‍ठता से उम्र का कोई नाता दूर-दूर तक नहीं है।
उदाहरण के लिए एक 55-60 साला पत्रकार यदि ऐसी ‘छोटी सोच’ रखता हो कि पत्रकारिता में हर वक्‍त कुछ न कुछ सीखने की गुंजाइश है, तो वह कभी ‘वरिष्‍ठ’ नहीं हो सकता।
ठीक इसके उलट जीवन के मात्र 35 वसंत देखने वाला कोई पत्रकार अगर यह ठान बैठे कि उसे किसी नई जानकारी की आवश्‍यकता नहीं है, उसके पास पत्रकारिता का ज्ञान बघारने को पर्याप्‍त मसाला एकत्र हो चुका है तो उसका ‘स्‍वयंभू’ वरिष्‍ठ हो जाना बनता है।
इसे समझने के लिए मैं खुद को पेश करता हूं। मुझे 01 सितंबर (जिस दिन से देश में नया व्‍हीकल एक्‍ट लागू हुआ) से पहले तक कतई पता नहीं था कि ‘गेयर वाला’ कोई ‘दुपहिया वाहन’ चप्‍पलें पहनकर, लुंगी या तहमद बांधकर… और यहां तक कि ‘निक्‍कर’ आदि पहनकर चलाने पर भी चालान कट सकता है।
चंद्रयान-2 की आंशिक असफलता से पूर्व मैंने नहीं पढ़ा था कि ‘लैंडर’ की भूमिका क्‍या होती है और क्‍यों उसका टेढ़ा-तिरछा होना पूरे देश पर भारी पड़ सकता है।
अर्थशास्‍त्र का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने कभी देश की अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर ‘अर्थशास्‍त्रियों’ को चुनौती नहीं दी, कभी जीडीपी को लेकर निरर्थक बहस नहीं की। ‘रेपो रेट’ में बाल की खाल निकालना जरूरी नहीं समझा।
अब आप ही बताइए कि मैं कैसे वरिष्‍ठ हो सकता हूं जबकि मुझसे काफी छोटे पत्रकार सीधे-सीधे दिन रात चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कहते हैं… देश को मंदी के गर्त में ले जानी वाली सरकार बताए कि उसने समय रहते इसे रोकने के उपाय क्‍यों नहीं किए। वित्तमंत्री को मंदी का पता तब क्‍यों चला, जब मीडिया ने उसे बताया कि मंदी की मार से आमलोग बेहाल हो रहे हैं।
वो बेखौफ होकर ये भी बताते हैं कि ऑटो इंडस्ट्री की इतनी खस्‍ता हालत कैसे बनी, ‘कारें’ क्‍यों नहीं बिक रहीं। ‘लिपिस्‍टिक’ ज्‍यादा बिकने से क्‍या संदेश मिलता है।
औरतें मंदी की मार को ठेंगा दिखाने के लिए कार की बजाय लिपिस्‍टिक, नेल कलर या हेयर बैंड खरीदने लगती हैं।
ये पत्रकार अर्थशास्‍त्रियों को बताते हैं कि औरतों का अचानक कारों पर से ध्‍यान हटाकर सीधे लिपिस्‍टिक, नेल कलर या हेयर बैंड पर फोकस करना इस बात का पुख्‍ता सबूत है कि आर्थिक मंदी घर कर चुकी है।
दुनियाभर के अर्थशास्‍त्री एक तरफ और वरिष्‍ठ पत्रकार दूसरी तरफ।
अर्थशास्‍त्री उनकी दृष्‍टि से घिसी-पिटी दलीलें देकर देश के साथ अनर्थ कर रहे हैं जबकि देश गर्त में जाने की ओर तेजी के साथ बढ़ रहा है।
कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों के पास तो इस बात के पुख्‍ता सबूत भी हैं कि देश गर्त में जा चुका है, बस घोषणा होना बाकी है।
इन वरिष्‍ठ पत्रकारों की मानें तो देश उसी प्रकार बेढंगे तरीके से पृथ्‍वी पर खुद की मौजूदगी का अहसास जबरन कराने में जुटा है, जिस प्रकार के. सिवन विक्रम लैंडर के चंद्रमा पर तिरछा जा पड़ने का अहसास करा रहे हैं।
कुछ ने तो के. सिवन को चुनौती देने के लिए इस आशय का खुला पत्र लिखकर तैयार रखा है कि जब आज तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी ने अपना यान उतारने की कोशिश नहीं की तो आपने ये हिमाकत क्‍यों की।
क्‍यों देश का सेंकड़ों करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया। इतने रुपयों से कितने वर्ष का मिड डे मील आ सकता था। किसानों के गन्‍ने का बकाया भुगतान किया जा सकता था। उनका कर्ज माफ किया जा सकता था। बीएसएनएल के कर्मचारियों का रुका हुआ वेतन दिया जा सकता था। ऐसा ही बहुत कुछ किया जा सकता था जो आपकी जिद की भेंट चढ़ गया।
एक वरिष्‍ठ पत्रकार तो यहां तक कह रहे थे कि हम आरटीआई के जरिए ISRO चीफ से ये जानकारी मांगेंगे कि क्‍या वो खुद कभी अंतरिक्ष की सैर पर निकले थे, और नहीं निकले तो उन्‍होंने एक अनजान व अज्ञात सफर पर देश का चंद्रयान-2 कैसे भेज दिया।
कल को कोई वरिष्‍ठ पत्रकार किसी ‘खास वकील’ के माध्‍यम से कोर्ट में ISRO चीफ के खिलाफ याचिका लेकर पहुंच जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए।
इन हालातों में मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपनी तीन दशक की पत्रकारिता को ओढूं या बिछाऊं।
क्‍या के. सिवन को यहीं ISRO में छोड़कर चंद्रमा तक जाकर पता लगाऊं कि ऑर्बिटर के बारे में भी वो जो कुछ बता रहे हैं, वो सही है या नहीं।
या मैं भी आरटीआई भेजकर सरकार से पूछूं कि पाकिस्‍तान के पाव-पाव भर वाले एटम बमों और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्‍ठ पत्रकारों में कोई समानता है। है तो उसकी विस्‍तृत जानकारी उपलब्‍ध कराएं।
मुझे लगता है कि मैं मूढ़ था, मूढ़ हूं और ताजिंदगी मूढ़ ही रहूंगा। किसी ने मेरे जैसे ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकारों के लिए उचित ही कहा है-
सबसे भले हैं मूढ़, जिन्‍हें न प्‍यापै जगत गति
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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