इस समय टीम इंडिया पर खरी उतर रही है यह कहावत…’घर के शेर, बाहर ढेर’

35 ओवर में 107 रन और 47 ओवर में 130 रन. ये किसी ख़राब वनडे पिच पर लड़खड़ाती किसी कमज़ोर टीम का स्कोर नहीं, बल्कि क्रिकेट की दुनिया के ताक़तवर टीमों में गिनी जाने वाली भारतीय क्रिकेट टीम का टेस्ट मैच में दो पारियों का स्कोर है.
हार-जीत तो खेल का हिस्सा है और खेलने वाले दो में से किसी एक को हारना ही है लेकिन क्रिकेट के मक्का में जिस तरह टीम कोहली ने घुटने टेके, भारतीय क्रिकेट का वो दौर याद आ गया, जब इंडियन टीम के उड़ान भरने से लेकर लौटने तक मैच नहीं देखे जाते थे.
अगर कोई टीवी खोलता तो सिर्फ़ सचिन तेंदुलकर की बेखौफ़ बल्लेबाज़ी और कलाइयों की कारीगरी देखने के लिए और उनके आउट होते ही टीवी बंद कर लोग अपने-अपने काम-धंधे में लग जाया करते थे.
‘घर के शेर, बाहर ढेर’ वाली कहावत अक्सर भारतीय क्रिकेट टीम का बुरे ख़्वाब जैसे पीछा किया करती थी.
लेकिन चाहने वालों के सामने हमेशा निराशा का दौर नहीं रहा. एक वक़्त वो आया, जब तेंदुलकर के सामने वाले छोर पर भी बल्ला थामे ऐसे शख़्स खड़े दिखे, जो उनकी तरह आक्रामक हो सकते थे और वक़्त पड़ने पर बिना रन बनाए दिन काट दिया करते थे.
फिर आए भारतीय क्रिकेट के फ़ैब फ़ाइव
जानकार इसे भारतीय बल्लेबाज़ी का स्वर्णिम दौर कहते हैं. वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली. वो पांच पांडव, जो न घर बल्कि बाहर की महाभारत में भिड़ जाते थे.
ऐसा नहीं कि उन दिनों भारतीय टीम विदेश में सारे टेस्ट मैच और सिरीज़ जीता करती थी. टीम तब भी हारती थी लेकिन खेल में जीवटता दिखती थी. टीम हारती तो लड़कर हारती और ऑस्ट्रेलिया से लेकर इंग्लैंड तक टेस्ट क्रिकेट की ऐतिहासिक जीत भी इन्हीं पांचों के रहते मिलीं.
सहवाग कभी-कभी लंबी पारी खेलते लेकिन कम समय के लिए भी पिच पर टिकते तो शॉट खेलने से नहीं डरते. पारी की शुरुआत में नई गेंद को उधेड़कर पुराना बनाया करते थे ताकि बाद में उतरने वाले सचिन, राहुल, लक्ष्मण को खेलने में आसानी हो.
पारी की हार या मैच में हार का संकट गहराता तो राहुल और लक्ष्मण दीवार बनकर समय काटते और शर्मनाक हार से बचाते लेकिन ये सब अब यादों में रह गया है.
जिन काले बादलों के नीचे अंग्रेज़ पिचों पर ‘मज़बूत’ भारतीय बल्लेबाज़ी ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है. वहीं, इसी टीम के पुराने बल्लेबाज़ों ने बॉलरों को रुलाया भी है.
अंग्रेज़ पिचों पर भारतीय बल्लेबाज़ी
राहुल द्रविड़ ने इंग्लैंड में 13 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने 68.80 की धमाकेदार औसत से 1376 रन बनाए. द वॉल अंग्रेज़ पिचों पर छह शतक लगा चुके हैं और सर्वश्रेष्ठ पारी रही 217 रनों की.
वीवीएस लक्ष्मण ने उनके सामने कुछ फीके दिखते हैं लेकिन आज के भारतीय बल्लेबाज़ उनसे काफ़ी सीख सकते हैं. लक्ष्मण ने इंग्लैंड में खेले 11 मैचों में 34.47 की औसत से 586 रन बनाए हैं. लक्ष्मण को इंग्लैंड से ज़्यादा ऑस्ट्रेलिया पसंद आता था जहां उन्होंने 15 मैचों में 44.14 की औसत से 1236 रन बनाए.
पहले कप्तान, फिर बल्लेबाज़ के रूप में ज़िम्मा संभालने वाले सौरव गांगुली को भी इंग्लैंड काफ़ी पसंद आता था. यहीं से उनका नाम चमका था. अंग्रेज़ सरज़मीं पर गांगुली ने नौ टेस्ट खेले और 65.35 की औसत से 915 रन बनाए जिनमें तीन शतक शामिल हैं.
आज भले टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज़ों के पैर स्विंग के आगे कांप रहे हों लेकिन सहवाग के सामने ऐसी दिक्कत नहीं थी. नजफ़गढ़ के नवाब ने इंग्लैंड में छह मैचों में 27.80 की औसत से 278 रन बनाए हैं.
फिर तेंदुलकर की बात. मास्टर ब्लास्टर और उनके बल्ले को भी इंग्लैंड काफ़ी भाया करता था. उन्होंने वहां खेले 17 मैचों में 54.31 की औसत से 1575 रन बनाए हैं, जिनमें चार शतक शामिल हैं.
अब क्या दिक़्क़त है?
लेकिन अब इन बल्लेबाज़ों की विरासत संभाल रहे ऐसे नौजवान दिख रहे हैं, जिनकी बॉडी लैंग्वेज मैदान में उतरते ही पवेलियन लौटने और हारने की तरफ़ इशारा करती है.
ना पैरों में कोई मूवमेंट है, न बाहर जाती गेंदों को छोड़ने का संयम, आयाराम-गयाराम वाले हालात हैं और स्कोरबोर्ड टीम इंडिया की बदहाली की कहानी कह रहा है.
लॉर्ड्स में भारतीय टीम दोनों पारियों में मिलाकर भी 90 ओवर नहीं खेल सकी. 1974 में बर्मिंघम और 2002 में हैमिल्टन के बाद ये तीसरा मौका है जब टेस्ट मैच का पहला पूरा दिन बारिश में धुल जाने के बाद भी भारतीय टीम हार गई.
और ऐसा नहीं कि हालात इंग्लैंड में ही ख़राब हैं. दक्षिण अफ़्रीका में भी भारत को तीन में से भले एक टेस्ट में जीत मिली हो लेकिन वो गेंदबाज़ों ने दिलाई, बल्ले ने नहीं.
क्रिकेट आंकड़ों के जानकार मोहनदास मेनन के मुताबिक़, साल 2018 में दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड में विराट कोहली ने नौ पारियों में 56.55 की औसत से 509 रन बनाए हैं. उनके बाद तलाशने से भी बल्लेबाज़ नहीं दिखते.
कोहली के अलावा बाहर सब फ़ेल?
दूसरे पायदान पर 183 रनों के साथ हार्दिक पंड्या हैं और तीसरे पर 142 रनों के साथ रविचंद्रन अश्विन. बाकी 17 खिलाड़ियों ने कुल 90 पारियों में महज़ 1155 रन बनाए हैं. औसत हुआ 12.83.
लॉर्डस से पहले बर्मिंघम में कप्तान कोहली ने दोनों पारियों में 200 रन बनाए थे लेकिन उनके बाद कोई भी बल्लेबाज़ अपनी दो पारियों का योग सैकड़े के पार नहीं ले जा पाया.
शिखर धवन ने पहले टेस्ट की दोनों पारियों में 39 रन बनाए. दूसरे में उन्हें बाहर बैठाया गया लेकिन जिन्हें दूसरे में मौका मिला, उन्होंने भी कुछ करके नहीं दिखाया बल्कि और निराश किया.
भारतीय पिचों पर बेहद आक्रामकता और मज़बूत तकनीक दिखाने वाले मुरली विजय की चार पारियों का जोड़ है 26 रन और ये भी पहले मैच के हैं क्योंकि दूसरे मैचों की दोनों पारियों में उनके नाम के आगे शून्य लिखा है.
केएल राहुल ने दोनों मैचों की चारों पारियों में कुल 35 रन बनाए हैं. अजिंक्य रहाणे ने चार बार बैटिंग की, कुल स्कोर है 48 रन.
विशेषज्ञ भी ढेर हुए
टेस्ट क्रिकेट में मज़बूत टेक्नीक, डिफ़ेंसिव खेल के लिए विख्यात, काउंटी क्रिकेट में एक्सपोज़र लेने वाले और अगले द्रविड़ कहे जा रहे चेतेश्वर पुजारा को पहले मैच में बाहर बैठाया गया तो कोहली की कप्तानी पर सवाल उठे. दूसरे में उन्हें खिलाया गया तो स्कोर रहा 18. हालांकि, पहली पारी में वो रनआउट हुए.
क्या इंग्लैंड की पिचें अचानक इतनी ख़तरनाक हो गई हैं, क्या वहां मौसम अचानक बदल गया है, क्या गेंद वहां पहली बार इतनी स्विंग कर रही है?
इन सवालों के जवाब में वरिष्ठ खेल पत्रकार धर्मेंद्र पंत ने कहा, ”इंग्लैंड का मौसम तब भी ऐसा था, स्विंग पहले भी होती थी. एंड्रयू फ़्लिंटॉफ़, जेम्स एंडरसन, स्टुअर्ट ब्रॉड और साइमन जोंस जैसे स्विंग कराने वाले गेंदबाज़ अंग्रेज़ टीम में पहले भी थे.”
”टीम इंडिया की बल्लेबाज़ी को भले मज़बूत बतया जा रहा है, लेकिन असलियत ये है कि सलामी बल्लेबाज़ी को जो शुरुआत देनी चाहिए, वो नहीं मिल रही.”
भारतीय टीम के पांच दिग्गज बल्लेबाज़ों के दौर को याद करते हुए पंत ने कहा, ”भारतीय टीम जब ऑस्ट्रेलिया में जीती या इंग्लैंड में क़िला फ़तह किया तो इसकी नींव सलामी बल्लेबाज़ी से ही पड़ी थी.”
गेंद की चमक कौन उतारेगा?
”एक तरफ़ से वीरेंद्र सहवाग गेंदों को धुना करते थे और दूसरी तरफ़ खड़ा बल्लेबाज़ विकेट बचाकर खेलता था. टेस्ट मैच में गेंद की चमक उतारना बहुत ज़रूरी होता है और ये काम ओपनर का होता है.”
”मिडल ऑर्डर का बल्लेबाज़ नई गेंद को खेलने का आदी नहीं होता. इस क्रम का बल्लेबाज़ पांच ओवर के भीतर पिच पर उतर रहा है और घूमती गेंद नहीं संभाल पा रहा.”
पंत का कहना है कि इस बार रहाणे और पुजारा का नाकाम होना भी भारतीय टीम पर भारी पड़ रहा है. उन्होंने कहा, ”पुजारा काउंटी क्रिकेट में फ्लॉप रहे हैं और पिछली बार शतक लगाकर इंग्लैंड में टेस्ट जीत की नींव रखने वाले रहाणे भी रंग में नहीं हैं. कोहली ने पहले टेस्ट में बढ़िया स्कोर किया, लेकिन उन्हें कई जीवनदान भी मिले थे.”
स्विंग करती गेंदों के सामने जूझने के अलावा कोहली की कप्तानी और टीम प्रबंधन के फ़ैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं. पंत ने कहा, ”पहले टेस्ट में जब टीम को चेतेश्वर पुजारा की ज़रूरत थी, उन्हें बाहर बैठाया गया. दूसरे टेस्ट में जब टीम को चौथा सीमर चाहिए था तो दो स्पिनर खिलाए गए.”
”दो दिन बारिश हो रही थी, पवेलियन में बैठकर सब देखा जा रहा था लेकिन इसके बावजूद कंडिशन को देखकर फ़ैसला करने के बजाय पहले से जो मन बनाए बैठे थे, वही टीम कंपोजिशन खिला लिया जाता है, ये सही नहीं है.”
टीम बार-बार क्यों बदल रहे हैं कोहली?
बार-बार टेस्ट टीम में बदलाव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. मोहनदास मेनन के मुताबिक़, आख़िरी बार जब टीम इंडिया बिना किसी बदलाव के मैदान में उतरी थी तो वो जुलाई 2014 में लॉर्डस में खेला गया मैच था जो उसने 95 रनों से जीता था.
यही 11 खिलाड़ी ट्रेंट ब्रिज में हुए मैच में खेले थे और उस समय कप्तानी का भार महेंद्र सिंह धोनी संभाल रहे थे. तब से अब तक भारतीय टीम 44 टेस्ट मैच खेल चुकी है और किन्हीं भी लगातार दो टेस्ट मैच में वही टीम नहीं खेली है.
पंत का कहना है कि कोहली की कप्तानी का असली इम्तिहान इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में होना है और नतीजे उनके पक्ष में जाते नहीं दिख रहे. उन्होंने कहा, ”कोहली वनडे टीम के बढ़िया कप्तान हैं लेकिन 37 टेस्ट खेलने के बावजूद कोहली ने एक सी टीम नहीं खिलाई है, जो इशारा करती है कि कहीं न कहीं कोई ग़फ़लत में है.”
”एक-दो मैच में समझ आता है लेकिन 37 टेस्ट मैच खेले जाएं और सभी में कोई न कोई बदलाव हों ये थोड़ा अजीब है. टेस्ट मैच में कप्तान के तौर पर जीत का रिकॉर्ड भारतीय उप-महाद्वीप में खेलकर सुधारा जा सकता है, लेकिन सिर्फ़ इससे बात नहीं बनती.”
-BBC

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