भारत के निर्माण में सरदार के किरदार का आकलन आसान नहीं

अहमदाबाद। आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को जुलाई 1947 में भारतीय पक्ष की ओर से राज्य मंत्रालय का सदस्य बनाया गया था। इस दौरान उन्हें देश की 550 रियासतों को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य सौंपा गया था। जनवरी 1948 के आखिर तक, सिर्फ हैदराबाद और जूनागढ़ ही बातचीत के लिए बचे हुए थे। यहां तक कि अक्टूबर 1947 में कश्मीर में भी इसका हिस्सा बन चुका था।
भारत के लौहपुरुष के रूप में प्रसिद्ध पटेल ने राज्यों को एक साथ लाने के इस मिशन को जिस तेजी से संपन्न किया, उसकी काफी तारीफ हुई लेकिन यह इतना भी आसान नहीं था। उन्हें काफी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। सरदार पटेल ने एक के बाद एक राज्य को एक साथ लाने के लिए अपनी सारी बुद्धि और अनुभव का इस्तेमाल किया।
उनकी बेटी और हमराज मणिबेन पटेल ने जीएम नांदुर्कर के साथ मिलकर ‘सरदार पटेल- इन ट्यून विद द मिलियंस’ किताब में पूरी बारीकी से इसे लिपिबद्ध किया है। उन्होंने लिखा कि महात्मा गांधी ने एकजुट भारत का एक सपना देखा था जिसे सरदार पटेल ने पूरा किया था। वह महात्मा गांधी के उस सपने को पूरा करने के यंत्र की तरह थे।
राज्य मंत्रालय के गठन के बाद सरदार ने अपने एक भाषण में कहा था, ‘मुझे आशा है कि भारतीय राज्य इस बात को ध्यान में रखेंगे कि सामान्य हित में सहयोग ही एकमात्र विकल्प है और अगर वे साथ आने में असमर्थ हो जाते हैं तो अराजकता और अव्यवस्था की स्थिति बन जाएगी।’
सरदार पटेल ने सौराष्ट्र के एकीकरण को महात्मा गांधी का सपना बताया था। साथ ही इसे महाराणा प्रताप की इच्छा बताकर राजपूत शासकों के भावनात्मक पहलुओं को भी छू लिया था। उन्होंने नागरिकों से यह भी आग्रह किया कि पूर्ववर्ती शासकों को कमजोर न समझें और सभी शासकों का सम्मान बनाए रखें जो नए राष्ट्र का हिस्सा बनने के लिए आगे आए।
बीजे इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग ऐंड रिसर्च के डायरेक्टर प्रोफेसर रामजी सवालिया ने कहा कि भारत के निर्माण में सरदार के किरदार का आकलन आसान नहीं है। वह कहते हैं, ‘किसी को यह समझना चाहिए कि उन्हें आज के हिमाचल से दक्षिण में कोचीन त्रावणकोर की ‘पंजाब पहाड़ी राज्यों’ से कितनी विविधता का सामना करना पड़ा था। उन्होंने जूनागढ़ में लोगों की भागीदारी देखकर एकीकरण सुनिश्चित करने के लिए उन पर अधिक भरोसा किया था।’
-एजेंसियां

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