ASI द्वारा महाभारतकालीन लाक्षागृह की तलाश में बागपत के बरनावा में खोदाई शुरू

ASI द्वारा इंद्रप्रस्थ का पता लगाने के लिए 2014 में खोदाई हुई थी,

कई इतिहासकार और पुरातत्ववेत्‍ता सालों से खोदाई करवाने की मांग कर रहे थे

नई दिल्ली। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध लाक्षागृह की तलाश मे बागपत जिले के बरनावा में बुधवार से खोदाई शुरू करवा दी। इस खोदाई में लाक्षागृह के साक्ष्य जुटाए जाएंगे। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर लाक्षागृह था, मगर एएसआइ के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है। सुबूत एकत्रित करने के लिए यह खोदाई शुरू की गई है।

इंद्रप्रस्थ का पता लगाने के लिए 2014 में खोदाई हुई थी
कई इतिहासकार और पुरातत्ववेत्‍ता सालों से खोदाई करवाने की मांग कर रहे थे। उनकी इस मांग पर ASI ने कुछ माह पहले मंजूरी दी थी। एएसआइ की टीम बरनावा पहुंच चुकी है। इससे पहले 2014 में दिल्ली स्थित पुराना किला में भी पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ का पता लगाने के लिए खोदाई हुई थी, मगर यह कार्य पूरा नहीं हो सका।

खोदाई तीन माह चलेगी

खोदाई की इस योजना पर एएसआइ की दिल्ली स्थित उत्खनन शाखा और इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं। दोनों संस्थान संयुक्त रूप से खोदाई कर लाक्षागृह का पता लगाएंगे। अभी खोदाई तीन माह चलेगी। इसमें इंस्टीट्यूट के छात्र भी शामिल होंगे।

2005 में यहां खोदाई में काफी कंकाल और बर्तन मिले थे

एएसआइ की ओर से इस साइट का चुनाव करने का कारण यह है कि ये चंदायन और सिनौली के नजदीक है। सिनौली में उत्खनन के दौरान हड़प्पा के समय की कई महत्वपूर्ण चीजें मिली थीं। वर्ष 2005 में यहां काफी कंकाल और बर्तन मिले थे। इसी तरह वर्ष 2014 में चंदायन गांव में तांबे का रत्नजड़ित मुकुट मिला था।

ASI को खोेदाई में लाक्षागृह का प्रमाण मिलने की उम्मीद

एएसआइ की दिलचस्पी सबसे ज्यादा उस सुरंग को खोजने में है, जहां से पांडव महल से बचकर बाहर निकले थे।
एएसआइ के प्रवक्ता डीएन डिमरी का कहना है कि इस खोदाई से लाक्षागृह से संबंधित बहुत कुछ ऐसा मिलने की उम्मीद है, जिससे लाक्षागृह होने की बात के प्रमाण मिल सके।

इलाहाबाद व कौशांबी के पास भी ढूंढ़ा गया था लाक्षागृह

एएसआइ के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि इलाहाबाद और कौशांबी के पास भी वर्ष 1990 में लाक्षागृह को लेकर खोदाई की गई थी। वहां भी लाक्षागृह के होने का दावा किया गया था, मगर खोदाई के बाद ऐसा कुछ सिद्ध नहीं हो सका। हालांकि, बताया जाता है कि महाराजा परीक्षित की सत्रहवी पीढ़ी का ताल्लुक इस स्थान से था।

क्या है लाक्षागृह का इतिहास

पांच हजार साल पहले महाभारत में पांडवों को जान से मारने के लिए कौरवों ने लाख का महल बनवाया था। इसमें पांडवों को जिंदा जलाने की योजना थी, लेकिन पांडवों को विदुर के जरिये इसकी भनक लग गई और वे जलते हुए महल से सुरंग के रास्ते बचकर निकल गए। इसी लाख के महल के लाक्षागृह कहा जाता है।

शकुनि-दुर्योधन ने रचा था पांडवों की मारने षड़यंत्र

मानता के मुताबिक, धृतराष्ट्र, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की लोकप्रियता से दुर्योधन चिढ़ने लगा था। यही वजह थी कि दुर्योधन पांडवों के निरंतर बढ़ते बल कौशल को देखकर चिंतित रहने लगा था। आखिरकार दुर्योधन और शकुनि ने मिलकर पांचों पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारने की योजना बनाई। लेकिन नीति में चतुर विदुर शकुनि के इस षड़यंत्र को भांप गए थे और उन्होंने ही पांडवों को समय रहते लाक्षागृह से निकलवा दिया।

कई इतिहासकार और पुरातत्ववेत्‍ता सालों से खोदाई करवाने की मांग कर रहे थे। उनकी इस मांग पर ASI ने कुछ माह पहले मंजूरी दी थी।

-Legend News