ABVP की शिकायत पर अरुंधति की किताब को सिलेबस से हटाया

नई दिल्‍ली। आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ABVP की शिकायत के बाद तिरुनेलवेली (तमिलनाडु) की मनोनमनियम सुंदरनर यूनिवर्सिटी ( Manonmaniam Sundaranar University ) के सिलेबस से अरुंधति रॉय की किताब को हटा दिया गया है.
अरुंधति रॉय की किताब ‘वॉकिंग विद द कॉमरेड्स’  (Walking with the comrades)   एम.ए. अंग्रेज़ी के सिलेबस में साल 2017 से शामिल थी. यह किताब अरुंधति की माओवादियों से उनके ठिकानों पर हुई मुलाक़ात पर आधारित थी.
बीते हफ़्ते एबीवीपी के सदस्यों ने यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉक्टर के. पिचुमणि से मुलाक़ात की थी और सिलेबस से किताब को हटाने की मांग की थी.
राष्ट्र-विरोधी किताब बताया गया
कुलपति को दिए गए पत्र में एबवीपी ने कहा था, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसको बीते तीन सालों से सिलेबस में शामिल किया हुआ है. इसके परिणाम स्वरूप नक्सल और माओवादी विचारधारा को सीधे छात्रों पर थोपा जा रहा है. एबीवीपी सिलेबस में इस राष्ट्र-विरोधी किताब को शामिल करने की ज़ोरदार निंदा करता है. विश्वविद्यालय प्रशासन इसके लिए माफ़ी मांगे और इसे तुरंत सिलेबस से हटाए.”
इस किताब की जगह अब सिलेबस में एम. कृष्णन की किताब ‘माइ नेटिव लैंड: एसेज़ ऑन नेचर’ को शामिल किया गया है.
एबीवीपी के दक्षिण तमिलनाडु के संयुक्त सचिव सी. विग्नेश ने कहा, “हमें नहीं पता था कि यह किताब तीन साल से सिलेबस में है. हमारे संगठन का एक छात्र अब जो एम. ए. की पढ़ाई कर रहा है, उसने हमारा ध्यान सिलेबस की इस किताब की ओर दिलाया. इसके बाद हमने किताब हटाने का निवेदन किया.”
बीजेपी ने सिलेबस से इस किताब को हटाने का स्वागत किया है जबकि डीएमके और सीपीएम ने इसका विरोध किया है.
विश्वविद्यालय के कुलपति का कहना है कि यह फ़ैसला छात्रों के कल्याण के लिए लिया गया है.
एबीवीपी का कहना है कि तमिलनाडु के कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने यह फ़ैसला लिया है कि वे भी अपने सिलेबस को देखेंगे कि कहीं उसमें इस प्रकार की किताबें तो शामिल नहीं हैं.
‘वॉकिंग विद द कॉमरेड्स’ कैसी किताब है
अरुंधति रॉय ने 2010 में माओवाद प्रभावित मध्य भारत के इलाक़ों का दौरा किया था. इसके बाद उन्होंने ‘वॉकिंग विद द कॉमरेड्स’ नामक किताब लिखी. इस किताब में उन्होंने माओवादियों के अनुभवों को साझा किया था और ऐसे बिंदुओं का उल्‍लेख किया था जिनके कारण माओवादियों को हथियार उठाने पड़े. 2011 में यह किताब पहली बार प्रकाशित हुई थी.
-BBC

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