डा. अमिता परशुराम का गज़ल संग्रह ‘इश्क़ लम्हे’ का लोकार्पण

नई दिल्ली। कोरोना महामारी के कारण जिस तरह से देशभर में भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा सतर्कता बरती जा रही है। इसी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन समूह ने कवियित्री अमिता परशुराम का नज़्म तथा गज़लों का संग्रह  ‘इश्क़ लम्हे’ का ऑनलाइन लोकार्पण अपने सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर किया गया। इस ऑनलाइन आयोजन में संगीत क्षेत्र से भजन सम्राट अनूप जलोटा, गजल सम्राट गायक पंकज उधास, मशहूर गायक और संगीतकार हरिहरन जैसे दिग्गजों के अलावा वाणी प्रकाशन ग्रुप के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी भी इसमें उपस्थित थे।

अमिता परशुराम की ‘इश्क लम्हे’ नज्म तथा गजलों का संग्रह दास्ताँ कहते-कहते श्रृंखला में वाणी प्रकाशन की पहली किताब है, जिसमें पहली बार किसी शायरा को प्रकाशित किया गया है। इससे पहले इस श्रृंखला में देश विदेश के 50 से आधिक शायर प्रकाशित हो चुके हैं। यह पहली बार है जब किसी शायरा का संग्रह प्रकाशित हुआ है और आगे भी वाणी प्रकाशन दास्ताँ कहते-कहते श्रृंखला में कई अन्य शायराओं की नज्मों और गजलों को प्रकाशित करने जा रहा है ।

कवियत्री डा. अमिता परशुराम इस मौके पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया जो कि पाठकों के हित में था कि उर्दू की शायरी तथा ग़ज़लों की लोकप्रियता जन जन में है। सभी तबके के लोग उसे सुनना एवं पढ़ना पसन्द करते हैं परन्तु उसकी उपलब्धता हिंदी देवनागरी में ना होने के कारण, लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ा, इसके बारे में उन्होंने गीतकारों तथा प्रकाशक के रूप में अरुण माहेश्वरी से कुछ टिप्पणियाँ जाननी चाही।

गजल गायक पंकज उधास इस सम्बन्ध में बताते हैं कि यह मसला शुरू से ही रहा परन्तु साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारी दी कि कैसे 1982-83 में इस समस्या पर काम किया गया तथा पुस्तकों में उर्दू के साथ साथ हिंदी देवनागरी में भी गज़लों का छपना शुरू हुआ।

गज़लों तथा वाणी प्रकाशन का पुराना रिश्ता रहा है। इस यात्रा पर बात करते हुए अरुण माहेश्वरी बताते हैं कि कैसे कैफ़ी आज़मी, जॉन एलिया, निदा फ़ाज़ली और गुलज़ार जैसे प्रतिष्ठित शायरों की पुस्तकों को हिंदी देवनागरी में छाप कर वाणी प्रकाशन ने कितना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

गज़लों के साथ साथ मौसिकी की अहमियत पर भी बात की गई, गज़ल गाने वालों को अनूप जलोटा, खूबसूरत रथ का घोड़ा बताते हैं। चर्चा के दौरान महसूस किया गया कि गायिकी में नित नए परिवर्तनों के साथ शायर के अल्फाज़ोंं को महफूज़ रखना कितना आवश्यक है। वहीं हरिहरन ने अपने नए शैली के गीतों के माध्यम से कुछ गज़लें गायीं और समां बाँध दिया। वहीं आजकल की फिल्मों में लुप्त होती गज़लों की गायिकी की कमी पर भी चर्चा की गई। अंत में सभी ने डा. अमिता परशुराम को उनकी पुस्तक के लिए बधाई दी।

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