ब्रज में धर्म के साथ साथ साहित्य व संस्कृति के तीर्थ की भी स्थापना हो

मथुरा। ब्रज राधा-कृष्ण की जन्मभूमि है, लीला भूमि है। राधा-कृष्ण की लीलाओं का महाकवि सूरदास तथा अष्‍टछाप के कवि कुंभनदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास आदि के अतिरिक्त मीरा, चन्दसखी, भारतेन्दु हरिष्चन्द्र, रसखान, नजीर आदि के अतिरिक्त गुजरात के नरसी मेहता, दक्षिण भारत के स्वांति तिरुनाल सहित अन्य प्रदेशों के ही नहीं अंग्रेजी के फ्रेंक पिन्काट आदि के अतिरिक्त अनेक कवि, साहित्यकारों, महान सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास आदि संगीतकारों, बहुसंख्य साहित्यकारों एवं इतिहासकार एफ एस ग्राउस, वासुदेव शरण अग्रवाल, कृष्णदत्त वाजपेयी, प्रभुदयाल मीतल आदि ने काव्य, साहित्य, इतिहास के माध्यम से जो माधुर्यमय वर्णन किए हैं उनके कारण ब्रज और राधा – कृष्ण की आज अन्तर्राष्‍ट्रीय स्तर पर भक्ति भावना, प्रतिष्‍ठा व ख्याति है।

पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने इस सन्दर्भ में कहा है कि आज की पीढ़ी इनके योगदान से अनभिज्ञ है। उन्होंने सुझाव दिया है कि इनके ऐतिहासिक योगदान को आगे आने वाली पीढ़ियों से भी परिचित कराने के लिए एक विशाल सभागार के विभिन्न खण्डों में इनके चित्र, परिचय – पुस्तिका, प्रकाश‍ित साहित्य को प्रदर्श‍ित किया जाये जिससे क‍ि ब्रज के धार्मिक व आध्यात्मिक तीर्थ के समान ही ब्रज के साहित्य व संस्कृति तीर्थ सम्पूर्ण विश्‍व को प्रेरणा प्रदान कर सकें।

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