अखाड़ा परिषद के पहले दलित महामंडलेश्वर बने कन्हैया प्रभुनंद गिरि

प्रयागराज। अखाड़ा परिषद ने संत कन्हैया प्रभुनंद को कुंभ में पहले दलित महामंडलेश्वर की उपाधि दी। पिछले साल ही उन्हें परंपरा के तहत जूना अखाड़े में शामिल किया गया था।
संत कन्हैया प्रभुनंद गिरि को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने पहले दलित महामंडलेश्वर (पहले एससी संत, जो अखाड़े के प्रमुखों में से एक हैं) की उपाधि दी है। कन्हैया प्रभु ने कुंभ के पहले दिन शाही स्नान के दौरान संगम में डुबकी लगाई। इस दौरान उन्होंने ऐसे दलित, एसटी और ओबीसी व्यक्तियों से घर वापसी की इच्छा जताई जिन्होंने शोषण के डर से सनातन धर्म छोड़कर बौद्ध, ईसाई या इस्लाम धर्म अपना लिया है। कन्हैया प्रभुनंद को पिछले साल परंपरा के अनुसार जूना अखाड़े में शामिल किया गया।
उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि मेरे समुदाय के वे सभी सदस्य जिन्होंने असमानता के चलते इस्लाम, ईसाई और बौद्ध धर्म अपना लिया था, वे वापस सनातन धर्म से जुड़ जाएं। मैं उन्हें दिखाना चाहता हूं कि कैसे जूना अखाड़े ने मुझे खुद में शामिल कर लिया है।’ कन्हैया प्रभुनंद ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में जो जातिगत अपमान और शोषण का सामना किया है वह उनके लिए एक गोली के दर्द से भी कहीं अधिक है। इसी वजह से एक बार उन्होंने हिंदू धर्म तक छोड़ने की ठान ली थी।
महामंडलेश्वर ने एक घटना को याद करते हुए बताया, ‘साल 1999 में मैं उस वक्त चंडीगढ़ में था जहां सिख गुरुओं का एक समागम हो रहा था। जब उन्हें मेरी जाति मालूम चली तो साधुओं मे मुझे एंट्रेस में ही खड़े रहने को कहा। मैं गुरुओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेना चाहता था लेकिन उन्होंने कहा कि एक शूद्र को ऐसा करने की अनुमति नहीं है। अब मैं ऐसे पद पर हूं जहां सभी जातियों के लोग मेरे आगे झुकते हैं। मैं एक धार्मिक नेता हूं और इस जातिगत मानसिकता के खिलाफ लड़ता रहूंगा।’
‘…मुझे संस्कृत नहीं पढ़ने दी गई’
उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए उस पल को बयां कर पाना मुश्किल है जब मुझे शाही स्नान के लिए रथ पर बिठाया गया था। मेरे आसपास सभी श्रद्धालु ढोल की धुन पर नाच रहे थे। मेरा समुदाय काफी समय तक ऐसे सम्मान से दूर रहा जबकि हमने संविधान लिखकर और मुगलों व अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करके खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से साबित भी किया।’ उन्होंने बताया कि दसवीं के बाद वह संस्कृत पढ़ना चाहते हैं लेकिन अनुसूचित जाति से होने की वजह से उन्हें इजाजत नहीं मिली। उन्होंने बताया, ‘तब मैं अपने गुरु जगद्गगुरू पंचनंदी महाराज की शरण में आया जिन्होंने मुझे शिक्षा दी और मंदिर का पुजारी बनाया लेकिन कुछ दिन बाद मेरे ऊपर कुछ गुंडों ने हमला किया। मेरे हाथ की एक उंगली टूट गई और मंदिर में भी तोड़फोड़ हुई। मुझ पर जातिगत टिप्पणियां की गईं।’
‘हम एकलव्य और कर्ण हैं’
उन्होंने कहा, ‘नेताओं और मीडिया को दलित शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हमें संविधान द्वारा दिए गए नाम एससी, एसटी या ओबीसी बुलाना चाहिए। हम एकलव्य और कर्ण हैं, अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य हैं। हमने खुद को साबित किया है लेकिन फिर भी बहिष्कृत माने जाते हैं। मैं इस मानसिकता को बदलना चाहता हूं।’
-एजेंसियां

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