राजनीतिक दलों के लिए एक औजार बन गई है कृषि ऋण माफी

नई दिल्ली। सत्ता हासिल करने लिए कृषि ऋण माफी राजनीतिक दलों के लिए एक औजार बन गई है। कुछ राज्यों में सत्ता में आई नई सरकारें कृषि ऋण माफी की घोषणा की तैयारी कर रही हैं, इस बात को जानते हुए कि पहले ऐसा कदम उठाने वाली सरकारों को इसे लागू करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
पिछले दिनों आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी साफ किया कि राजनीतिक पार्टियों को इस तरह के वादे करने से बाज आना होगा, क्योंकि अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव देखा जा रहा है।
राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में मुंह की खाने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले अपना खोया जनाधार पाने के लिए इससे जुड़ी एक नेशनल स्कीम पर विचार करने की बातें सामने आ रही हैं।
कृषि ऋण माफी जैसे लोक-लुभावन औजार के जरिये राजनीतिक दल आसानी से सत्ता पाने में कामयाब तो हो जाते हैं, लेकिन इसका खामियाजा पूरे सिस्टम को भुगतना पड़ता है। हम आपको कृषि ऋण माफी की हकीकत से रूबरू करा रहे हैं कि यह किसानों का संकट दूर करने में बिल्कुल भी कारगर साबित नहीं हुआ है, बल्कि इससे मुश्किलें और बढ़ी ही हैं।
1. कृषि ऋण माफी से अन्य राज्यों पर पड़ा दबाव
कृषि ऋण माफी की राज्य को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। हर विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की यह जैसे आदत सी बनती जा रही है कि कृषि ऋण माफी उनके चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा होना ही होना है। हर विधानसभा चुनाव में ऋण माफी की घोषणा की जा रही है। इसे इस ग्राफ से समझते हैं।
2. खेती से मुश्किल हो रहा जीवन-यापन
राजनीतिक दलों द्वारा कृषि ऋण माफी से कृषि संकट के मूल कारणों का समाधान नहीं होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसान खेती से पर्याप्त कमाई नहीं कर पा रहे हैं। इसे ग्राफ से समझते हैं।
3. हर किसी को समान फायदा नहीं
सबसे बड़ी बात यह है कि कृषि ऋण माफी का हर किसान को फायदा नहीं मिलता। इसमें किसानों द्वारा बैंकों से लिया गया लोन तो माफ हो जाता है, लेकिन जो किसान अनौपचारिक क्षेत्र से ऋण लेते हैं, वे जस के तस रहते हैं। इसे इस ग्राफ से आसानी से समझा जा सकता है।
4. अमीर किसानों को सर्वाधिक फायदा
कृषि ऋण माफी का सर्वाधिक फायदा अमीर किसानों को मिलता है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं।
1. उन्हें बैंकों से आसानी से ऋण मिल जाता है।
2. सिस्टम तक उनकी पहुंच बेहतर होती है।
3. उनमें वित्तीय साक्षरता और जागरूकता अधिक होती है।
5. ऋण माफी से क्रेडिट कल्चर पर असर और नैतिक खतरा
इससे सबसे बड़ा खतरा यह है कि इससे वैसे किसान जो ऋण का भुगतान करने में सक्षम हैं, वे भी ऋण भुगतान से पीछे हट सकते हैं। वित्त वर्ष 2015-16 में कृषि क्षेत्र का एनपीए 5.44 फीसदी, वित्त वर्ष 2016-17 में 5.61 फीसदी, जबकि वित्त वर्ष 2017-18 में यह 7.18 फीसदी रहा। हम एक ग्राफ से इसे दर्शा रहे हैं।
6. किसानों के लिए बैंकों से लोन लेना हुआ मुश्किल
चूंकि बैंक समझ गया है कि उसके द्वारा किसानों को दिया गया ऋण चुनाव में माफ कर दिया जाएगा और इस तरह उसका कर्ज डूब जाएगा। इसलिए बैंक भी अब किसानों को कर्ज देने से ऐहतियात बरतने लगे हैं। ग्राफ से इस हाल को आसानी से समझा जा सकता है।
7. विकास को झटका
कृषि ऋण माफी से विकास को गहरा आघात पहुंचता है, क्योंकि सरकार को हर क्षेत्र में खर्च में कटौती करनी पड़ती है। इससे सिंचाई और इंफ्रास्ट्रक्चर की योजनाओं पर खर्च में कमी लानी पड़ती है। कृषि ऋण माफी (जीएसडीपी का प्रतिशत) का राजकोषीय घाटे में योगदान सर्वाधिक उत्तर प्रदेश में रहा है। हम इसे एक ग्राफ के जरिये समझते हैं।
-एजेंसियां

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