क्रिकेट की दुनिया में फिर लौटा कलाइयों से स्‍पिन कराने वालों का दौर

एक दौर वह भी था जब 1990 से लेकर 2000 के शुरुआती दौर में कलाइयों के स्पिनर्स ने अपना जादू दुनिया भर में बिखेरा था। कलाइयों के दम पर गेंद को घुमाने वाले ये गेंदबाज बल्लेबाजों को ललचाते थे और फिर अपनी विविधताओं से उन्हें चकमा देकर सीधे पवेलियन की राह दिखाते थे।
शेन वॉर्न, मुथैया मुरलीधरन, अनिल कुंबले, मुश्ताक अहमद, दानिश कनेरिया, पॉल एडम्स, ब्रैड हॉग, उपुल चंदना, पॉल स्ट्रैंग ये सब अपने कलाइयों के दम इतने प्रसिद्ध हो गए कि घर-घर में इनको पहचाना जाने लगा लेकिन एकाएक कलाइयों की स्पिन बॉलिंग पर ब्रेक लग गए और क्रिकेट जगत पर फिंगर स्पिनर हावी होने लगे।
2015 से एक बार फिर कलाइयों की स्पिन का दौर लौटने लगा। 2015 वर्ल्ड कप के बाद कई टीमों ने अपनी स्पिन रणनीति में समय की मांग के हिसाब से बदलाव लाना शुरू किया। अब कलाइयों के स्पिनर्स की संख्या प्लेइंग XI में एक बार फिर बढ़ती दिखने लगी। कप्तानों की इन गेंदबाजों से बस इतनी ही अपेक्षा होती है कि वे टीम को विकेट उपलब्ध कराएं।
2015 के ऑस्ट्रेलिया वर्ल्ड कप में इंग्लैंड ग्रुप स्टेज से बाहर हुआ तो उसने सबसे पहले सीमित ओवरों (T20 और 50 ओवर) की अपनी रणनीति में बदलाव शुरू किया। वे अपनी टीम में आदिर रशीद को ले आए, जो उनके अहम विकेट टेकर गेंदबाज बनकर उभरे। पिछले वर्ल्ड कप के बाद से आंकड़े देखें तो वनडे फॉर्मेट में रशीद सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं। 2015 वर्ल्ड कप के बाद अगर 5 सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों की बात करें तो इस फेहरिस्त में रशीद के बाद 2 और ऐसे गेंदबाज हैं, जो कलाइयों के ही स्पिनर हैं।
इन स्पिन गेंदबाजों में अफगानिस्तान के युवा खिलाड़ी राशिद खान का नाम दूसरे स्थान पर आता है और साउथ अफ्रीका के इमरान ताहिर 5वीं पोजिशन पर हैं। भारत के उभरते हुए स्पिनर कुलदीप यादव भी यहां छठे पायदान पर पहुंच चुके हैं। इन चारों स्पिनरों में आदिल रशीद (127 विकेट), राशिद खान (123 विकेट), इमरान ताहिर (92) और कुलदीप यादव (97) शामिल हैं।
इससे पहले जैसे-जैसे ने शेन वॉर्न, मुरली, कुबंले और मुश्ताक जैसे दिग्गज स्पिनरों ने अपने करियर को अलविदा कहना शुरू किया वैसे-वैसे इंटरनेशनल क्रिकेट में कलाइयों की स्पिन दिखनी कम होती चली गई। इसके बाद उंगलियों के स्पिनरों ने अपनी धाक जमानी शुरू की। 2007 वर्ल्ड कप से लेकर चैंपियन्स ट्रोफी 2017 तक उंगलियों द्वारा कराई जाने वाली स्पिन बोलिंग परवान चढ़ने लगी। सीमित ओवरों की क्रिकेट में हर टीम के पास उंगलियों वाले विशेषज्ञ स्पिनर थे।
इस दौर में ज्यादातर कप्तानों का फोकस यही था कि वह विरोधी टीम के बल्लेबाजों को मिडल ओवरों में बांध कर रखें- उन्हें आसानी से बनाने का मौका न दें, चीजों को कड़ी कर मैच पर अपना नियंत्रण बनाने रखें और इस प्लान के साथ ही अगल उन्हें विकेट भी मिल जाए, तो फिर यह सोने पर सुहागा है। उंगलियों से स्पिन कराने वाले बॉलर्स ने चाहे वे लेफ्ट आर्म हो या फिर राइट आर्म, उन्होंने फ्लाइट, चकमा और डिसेप्शन को अपना हथियार बनाया और मोर्चे पर सफल होने लगे।
उंगलियों के इन स्पिनर्स ने खेल पर अपना मजबूत नियंत्रण बना लिया और ज्यादातर कप्तान उन पर भरोसा जताने लगे। इसके चलते फास्ट बॉलर्स की पिटाई का प्रचलन भी बढ़ने लगा। लेकिन समय के साथ-साथ बल्लेबाजों ने फिंगर स्पिनर्स को आराम से खेलना सीख लिया। अब उन्होंने इन स्पिनर्स के सभी हथियारों की काट ढूंढ ली थी तो बॉलर्स ने भी फास्टर वन का इस्तेमाल शुरू कर दिया। यह रणनीति भी ज्यादा कारगर होती नहीं दिखी। बॉलर जितनी तेज बॉल फेंकते थे, बल्लेबाज बॉल की लाइन-लेंग्थ के अनुरूप उतना ही जोरदार प्रहार कर गेंद को सही दिशा में भेजने लगे।
यहां से फिंगर स्पिनर्स की जगह कलाइयों के स्पिनरों को अपना दबदबा कायम करने का फिर मौका मिला। अब इस बात पर गौर करें कि बीते 4 सालों में ऐसा क्या हो गया कि दुनिया भर में कलाइयों के स्पिनर्स की तूती बोलने लगी है, तो इसके पीछ असली वजह है कप्तानों का पहले से और अधिक आक्रामक होना। अब कोई भी कप्तान रक्षात्मक अप्रोच के साथ खेलना पसंद नहीं करता। वे जानते हैं कि बल्लेबाजों को स्लॉग ओवर्स तक बांधे रखा तो अंतिम ओवरों में उनके लिए मुश्किलें बहुत बढ़ जाएंगी। ऐसे में वह मध्यम ओवरों में भी अटैक का सिलसिला जारी रखने में ज्यादा विश्वास रखते हैं।
ऑस्ट्रेलिया के स्पिन दिग्गज शेन वॉर्न कलाइयों की स्पिन बॉलिंग में आधुनिक दौर के महान खिलाड़ी हैं। हाल ही में उन्होंने खेल में आए इस बदलाव को लेकर कहा, ‘कलाइयों के स्पिन गेंदबाज को खेलते हुए बल्लेबाजों के मन में डर बना रहता है क्योंकि वह यह नहीं जान पा रहे हैं कि गेंद किस दिशा में घूम रही है। ज्यादातर बल्लेबाज इनकी बॉलिंग उनके हाथ से छूटने के दौरान नहीं पढ़ पा रहे हैं।’
भारत के दिग्गज स्पिन बॉलर और पूर्व कप्तान अनिल कुंबले आईपीएल 2019 के प्लेऑफ के दौरान एक टीवी शो में कहा, ‘कलाइयों के स्पिनर अपनी टीम विकल्प और विविधता दोनों दे रहे हैं। इन गेंदबाजों के पास ढेर सारी बॉल हैं, जिन्हें वे फेंकने में सक्षम है। चाहे गुगली या फिर टॉपी (टॉप स्पिन), फिलिप्पर हो या फिर साधारण लेग ब्रेक। बल्लेबाज इन्हें पहचान पाने में गलती कर ही जाते हैं।’
-एजेंसियां

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