आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्‍यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?

After all how logical about Yogi Adityanath's concerns Apprehensions of opposition and the media?
आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्‍यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?

महंत योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही न केवल विपक्ष बल्‍कि मीडिया भी तरह-तरह की आशंकाएं व्‍यक्‍त कर रहा है। विपक्ष जहां योगी आदित्‍यनाथ की ताजपोशी को आरएसएस का एजेंडा बता रहा है वहीं मीडिया कुछ ऐसा प्रचार-प्रसार कर रहा है जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।
योगी आदित्‍यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्‍मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्‍हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्‍हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्‍यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्‍योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्‍याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्‍ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्‍यनाथ के क्षेत्र से ताल्‍लुक रखने वाले मुस्‍लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्‍लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्‍सा है न कि वह उनके व्‍यक्‍तित्‍व का परिचय देता है।
इन मुस्‍लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्‍याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्‍या लेकर जाने वालों में मुस्‍लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्‍या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्‍थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्‍लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्‍लिम बाहुल्‍य क्षेत्र में स्‍थित है किंतु योगी के आचार-व्‍यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्‍लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्‍टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्‍थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्‍न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्‍लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्‍लिम प्रत्‍याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्‍लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्‍चिम बंगाल, दिल्‍ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्‍य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्‍साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्‍प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्‍लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्‍य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्‍यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्‍योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्‍त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्‍यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता की जिम्‍मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्‍पष्‍ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्‍मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्‍न में निरंकुश होने वालों से सख्‍ती के साथ निपटें। कानून-व्‍यवस्‍था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्‍थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्‍न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्‍दी एक्‍शन में आना यह बताता है कि उन्‍हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्‍छी तरह इल्‍म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्‍प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्‍होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्‍लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्‍न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्‍योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्‍मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्‍टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्‍मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्‍वस्‍थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्‍थिति से बच सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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